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श्रीमद्भागवत गीता क्या है? इसे समझने के लिए हमें इन के मुख्य स्थान महाभारत पर एक बार रोशनी डालनी पड़ेगी। महाभारत में कर्म की विशेष प्रधानता है। कोई व्यक्ति अपने से कुछ करना नहीं चाहता, सभी वह कर्म के निहित करते जाता है। पांडवों ने कहा हमने कर्म किया, दुर्योधन ने भी कर्म की ही बात करें। भीष्म पितामह ने भी कर्म किया और राजा धृतराष्ट्र ने भी कर्म का ही नाम लिया। कोई भी व्यक्ति अपने आप को दोष नहीं देता, ओ सही है या गलत भविष्य इसका निर्णय स्वयं ले लेगा। और आज के युग में सभी अपने अपने अनुसार से सही और गलत निश्चय करते आए हैं।


व्यास जी ने अपने अनुमान से सर्वोत्तम ग्रंथ महाभारत का निर्माण किया। यदि कर्तव्य कर्म को समझना है तो वास्तव में महाभारत से उत्तम दूसरा कोई ग्रंथ नहीं है। महाभारत को लोग सिर्फ युद्ध की तौर पर देखते हैं, महाभारत सिर्फ युद्ध का नाम नहीं है। महाभारत कर्तव्य कर्मों से किसी भी परिस्थिति में पीछे नहीं हटने का एक मार्ग देता। श्रीमद्भागवत गीता 1 तरीके से कहा जाए तो पूरे महाभारत के ज्ञान का सारांश है। जो सिर्फ कर्तव्य कर्मों की शिक्षा देता, वास्तविकता की शिक्षा देता है, सृष्टि के मूल सिद्धांत का शिक्षा देता है। कहते हैं वेदव्यास जी को महाभारत ग्रंथ के रचना के बाद उन्हें पूरी तरह से संतुष्ट नहीं हुई तो उन्होंने इसी के अंदर श्रीमद्भागवत गीता का विस्तार किया। जोकि महाभारत का मूल सिद्धांत के रूप में आज प्रचलित है, श्रीमद्भागवत गीता।
श्रीमद्भागवत गीता कहा जाए तो यह मात्र एक वेद ग्रंथ सारांश नहीं है। यह तो सृष्टि का संविधान है। एक ऐसा नियम जिसके आधार पर जीव अथवा प्रकृति अपने आप पर चलने के लिए बाध्य है। कोई कहे कि हम को यह नियम स्वीकार नहीं है कोई बात नहीं, इससे नियम को कोई फर्क नहीं पड़ेगा, इससे व्यक्ति को फर्क पड़ेगा। नियम तो जैसा कहा वैसा क्यों रहने वाला है। एक हमारे ना मानने से प्रकृति किसी प्रकार भी अपना नियम नहीं बदलती। क्योंकि वास्तव में हर प्रत्येक व्यक्ति यह बात भली-भांति जानता है कि हम सब प्रकृति के अधीन हैं, प्रकृति किसी प्रकार भी हमारे अधीन नहीं है। इसी प्रकार यह संपूर्ण जगत एक परमेश्वर की अधीन है, परमेश्वर किसी प्रकार भी अंश मात्र भी दूसरे किसी की अधीन नहीं है। धरती पर अनेकों ने अपने अनुसार से नियम बना दिए और बहुत उसका पालन भी करते हैं। परंतु हमारे अपनी नियम बनाने से वास्तविक नियम को कोई फर्क नहीं पड़ता।प्रकृति अपने द्वारा सृष्टि की रचना करती है और एक दिन प्रकृति ही अपने द्वारा सृष्टि का विनाश कर देती है यह सत्य और चित्र परिचित हैं।


श्रीमद्भागवत गीता को श्री कृष्ण ने कृष्ण बनकर नहीं कहा, नहीं उन्होंने विष्णु बनकर कहा, यह सभी उन्होंने एक अधिष्ठाता बनकर कहा, जो श्री कृष्ण और विष्णु से भी कहीं ऊपर।इसीलिए मैं कहता हूं कि श्रीमद्भागवत गीता विष्णु और श्री कृष्ण की वाणी नहीं है। श्रीमद्भागवत गीता उस परमेश्वर की बानी है, जो कहीं कृष्ण बनकर, कहीं शंकर बनकर, कहीं श्री गणेश बनकर, कहीं बुद्ध बनकर तू कहीं पीपल का पेड़ बनकर इस सृष्टि को नियमित संचालित कर रहा है। वही परमेश्वर देवता भी है, दानव भी है, मानव भी है, और स्वयं ही प्रकृति भी हैं।
लोग कहते हैं कि गीता श्री कृष्ण की वाणी है विष्णु की वाणी, इसलिए फिर आती है कि यह वैष्णव का है। गीता की रचना वेदव्यास जी के हाथों द्वारा हुआ तो श्रीमद्भागवत गीता को वेदव्यास जी की वाणी नहीं कहा जा सकता।

श्रीमद्भागवत गीता बिना किसी लाग लपेट प्रकृति का संविधान प्रस्तुत करता है। कहीं-कहीं सनातन धर्म में ही मतआंतर की बात आती है। जिसके आधार पर सनातन धर्म कहीं-कहीं परिहास का विषय बनता है। जबकि वास्तव में जितने भी वेद ग्रंथ है सभी हमारे वेदों पर ही आधारित है। शिव स्वरूप से नहीं है, शिव भक्तों के लिए स्वरूप से है। अनंत परमेश्वर भी स्वरूप से नहीं है, वह फिर भक्तों के लिए स्वरूप से है। शिव शंकर अपनी शक्ति के लिए पूजे जाते हैं। श्री राम और कृष्ण ने कभी नहीं कहा मेरी पूजा करो, उनके चरित्र को लेकर भक्तों ने, अथवा प्राचीन सनातनी ने, उन्हें अपना भगवान माना, और यह माना कि ऐसा कर्म, ऐसा चरित्र सिर्फ और सिर्फ भगवान ही कर सकते हैं और कोई दूसरा नहीं कर सकता।
वास्तव में परमेश्वरी एक ही है, यदि हम संक्षेप में कहें, तो शिव ही स्वरूप से विष्णु है कृष्ण है राम है। श्रीमद्भागवत गीता एक ऐसा सहयोग ग्रंथ है जिसे व्यक्ति बहुत कम समय में, इस ब्रह्मांड के रहस्य, परमेश्वर के रहस्य, भक्ति के रहस्य, कर्म के रहस्य, स्वरूप के रहस्य तथा अपने आप की स्थिति के रहस्य को व्यक्ति बहुत आसानी से समझ सकता है। किसको श्रीमद्भागवत गीता कहते हैं।