लेखक अपने विचार को प्रकट करता है और दार्शनिक तत्व को प्रकट करता है। मेरे लिए यह लेख बहुत ही महत्वपूर्ण है। आज जो कुछ भी मैं लिखता हूं, अथवा मेरे द्वारा विचारों में जो उत्तम शब्द है, उनमें बहुत इन्हीं महान संत तुल्य श्रीमान श्री सुदर्शन सिंह जी, निवास स्थान परशुरामपुर सारण का है। मेरे अपने गुरुजी से सशरीर दूसरा मुलाकात नहीं हुआ, परंतु उसके बावजूद भी मेरे गुरु स्वामी का निरंतर मुझे साथ तथा निर्देश मिलता है, यह मेरा उत्तम सौभाग्य है।

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मैं अपने दूसरे गुरुजी स्वामी श्री रामसुखदास जी महाराज का आजीवन आभारी हूं, जिनके कारण मुझे अपने गुरु जी का आशीर्वाद प्राप्त हुआ।

मैं अपने गुरुजी के बारे में विशेष नहीं जानता फिर भी उनके शब्दों को लेकर आगे एक लेख लिखने की कोशिश करूंगा। सभीं के लिए गुरु महान होते हैं और होने चाहिए। मेरे गुरुजी मेरे लिए साक्षात संपूर्ण ईश्वर स्वरूप हैं। यह कहने के पीछे भी एक कारण है, और वह यह की ईश्वर हीं ईश्वर के सदृश्य ज्ञान दे सकता है।

ईश्वर भेदभाव जाति-धर्म मान-अपमान इन सब से कहीं ऊपर है।

मेरे गुरु जी ने  स्वामी श्री रामसुखदास जी महाराज के संबंध में बताया था, और अपने माता के बाद के बाद जिनका मेरे जीवन के ऊपर  विशेष प्रभाव पड़ा , वे गृहस्थ में महान संत श्री सुदर्शन जी का जिक्र मैंने किया।

मेरे गुरु जी ने मेरे शब्दों में क्या पाया, यह तो वास्तविक वही व्यक्त कर सकते हैं, मूल शब्दों में उन्होंने कहा “और किसी की जरूरत नहीं है।”

मैंने उनसे साथ लेकर चलने का आने का आग्रह किया था , परंतु उन्होंने कहा “यह काम हमारा नहीं है, कोई किसी को साथ लेकर नहीं जाता। जीवन से लेकर मृत्यु तक अथवा उस ईश्वर तक का यात्रा स्वयं ही करना पड़ता है।” उन्होंने कोई नियम  नहीं बताएं, और न हीं अपने बारे में कुछ बताया। वे जीव और ईश्वर, तत्व दर्शन के बारे में बोलते रहे और मैं सुनता रहा, उस समय ऐसा लगा मानो सभीं सवाल शेष हो गए।

न चाह कर भी अपने मुख्य गुरु जी के बारे में बताना आवश्यक था।

एक शब्द का वास्तविक अर्थ समझने के लिए पूरे वाक्य को समझना होगा। एक वाक्य का वास्तविक अर्थ समझने के लिए, उस वाक्य के सृजन स्रोत को समझना पड़ेगा।

एक संत जिसका सरलता तथा सादगी उसके हर शब्द और जीवन से झलकता है।

मैंने अपने अनुभव में श्री सुदर्शन सिंह जी में यह विशेष पाया है। मुझे बेहद खुशी है ,मैंने अपने जीवन में इनका साथ भरपूर पाया है, और यह महान मूर्ति इस संसार में सशरीर विद्यमान है। मेरा सौभाग्य है कि मुझे तीन महामानव के रूप में गुरु मिलें। गुरुजी श्री सुदर्शन सिंह जी के बारे में कितना भी कहना कम होगा।

संत के बारे में एक संत चिंतक विशेष रूप से कह सकता है।

मुझे संतों का साथ करीब से मिला है। शायद इन महान गुरुओं का विशेष आशीर्वाद है कि मैं अपने शब्दों को आज प्रकट कर रहा हूं। महान तत्वदर्शी संतो के लिए मैंने अनेक चर्चा सुना है।

वास्तविक तत्वदर्शी महात्मा समाज के अंदर एक साधारण व्यक्तित्व लेकर जिया करते हैं।

ऐसे भी अनेक महात्मा मिलते हैं जो एक बार के लिए सामने नजर आते हैं और दूसरे बार गायब हो जाते हैं। ऐसे महान महात्मा अपने तत्व दर्शन को व्यक्त करने की कोशिश नहीं करते। अथवा यह अपना प्रचार-प्रसार करने की भी कोशिश नहीं करते।

इस बार जब मैं गुरु जी से मिला तो मैंने उनसे प्रार्थना किया, आपके पास जो विशेष है उसे दुनिया के सामने आना चाहिए। मेरे हठ को ध्यान में रखकर मेरे आग्रह को गुरु जी ने स्वीकार किया। जिसके बाद उनके शब्दों को प्रकट करने की कोशिश कर रहा हूं।

गुरु जी के जीवन के बारे में बात करें तो मैंने उनको क्रोधित होते हुए नहीं देखा।

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जब मैं गुरु का अर्थ नहीं समझता था ,तब से वह मिले एवं मेरे लिए प्रेरक रहे। जब कभी भी मैं अपने किसी विचार के निष्कर्ष पर पहुंचता , तो उसकी पुष्टि एवं दृढ़ता के लिए उन से चर्चा करता। मुझे सभीं प्रकार के उलझनों का उनसे समाधान प्राप्त होते रहा है।

उनकें शब्दों में मैंने खास पाया है और वह यह की वे अपने सिद्धांत अथवा विचार को थोपने की कोशिश नहीं करते है।

वे हमेशा सिक्के के दो पहलू को अलग-अलग विस्तार में व्यक्त करते हैं। सीधे तौर पर कहें तो वे अपने शब्दों के जरिए ईश्वरीय सिद्धांत का वास्तविक वर्णन करते हैं।

मेरे आग्रह के बाद अपने जीवन के बारे में उन्होंने विशेष नहीं बताया, इसलिए मैं उनके द्वारा प्रकट किए हुए शब्दों से आगे नहीं जाऊंगा। मेरे शब्द को वह किस प्रकार लेते हैं यह सोचना मेरे लिए आश्चर्य होगा। साधारण पुरुष का दृष्टि एक तरफ, दो तरफ अथवा तीन तरफ हो सकता है, परंतु एक महामानव का दृष्टि एक हीं दृश्य को लेकर अनगिनत हो सकता है।

गुरुजी आज प्रधानाध्यापक के पद से अवकाश प्राप्त हैं, उन्होंने अपना लगभग संपूर्ण जीवन शिक्षण ग्रहण करने तथा बच्चों को शिक्षण देने में लगाया।

वे कहते हैं अपने जीवन के बारे में ” मैं बाल्यकाल से ऐसा नहीं था। मैं एक समृद्ध परिवार से रहा, हमारे पिता किसान थे और मैं भी किसान हूं। मुझे शुरू से इस बात का गर्व रहा कि मेरे पिता ऐसे महान व्यक्तित्व के थे, जिनका महान संत भी सम्मान किया करते थे। पुत्र के मुख से पिता का महानता प्रेम हो सकता है, परंतु वास्तविकता किसी का मोहताज नहीं होता।”

गुरु जी कहते हैं”निश्चित तौर पर संस्कार मुझे विरासत में मिला है।

मैंने अपने पिता से सिर्फ भला करने के लिए चर्चा सुना। उनकें द्वारा संतों की सेवा देखी। कभी उनको संत के पीछे भागते हुए देखा ,तो कभी संत को उनके पीछे भागते हुए भी देखा।”

ईश्वर की असीम कृपा हुई मेरे अंदर आत्मबल जागृत हुआ। एक सामान्य पीछे बैठने वाला छात्र का अचानक मनोबल बढ़ा और मैं आगे बढ़ने के लिए प्रेरित हुआ।

मैंने अपने साथ के मित्र दोस्तों को अपने से आगे बढ़ते हुए देखा। जिस दिन से दृष्टि बदला, विचार बदला। देखते ही देखते मैं आगे हो गया।”

गुरुजी को मैंने साधारण से बातों पर बहस करते हुए कभी नहीं देखा।

वे किसी भी बात को सरलता से अपने अंदर समाहित कर लेते हैं। समाज के दृष्टि से वे एक साधारण पुरुष हैं, और मैंने यह पाया है कि वे अपनें आपको हमेशा साधारण हीं पेश करने की कोशिश करता है।

यदि आज समाज की बात करें तो सभीं को देने वाला देवता चाहिए, ईश्वर नहीं चाहिए।

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तत्व का उपदेश एक तत्व ज्ञानी हीं दे सकता। ब्रह्म का चर्चा एक ब्रह्म चिंतक कर सकता। उनका उपदेश का अभिप्राय तत्व विस्तार पर जाता है। उनका समस्त चर्चा ईश्वर को इंगित करता है।

गुरु जी ने बहुत पहले एक कथा का जिक्र किया था

“एक महात्मा रोज प्रवचन दिया करते थे। उनके अनुयाई और प्रशंसक अनगिनत की मात्रा में थे। एक दिन नित्य की भांति प्रवचन चल रहा था, उसी बीच एक भक्त खड़ा हुआ और महाराज से सवाल किया “महाराज! आप तो तत्वदर्शी हैं, आप मोह माया से निकले हुए व्यक्ति हैं। आपकी सब बातें अपनी जगह पर ठीक हैं। मैं तो संसारी व्यक्ति हूं, मैं चाहता हूं कि इस संसार से मेरा मोह भंग हो जाए, मेरा मोह- माया खत्म हो जाए। हे स्वामी महाराज! आप हमारे ऊपर कृपा करो, ऐसा कोई जतन करो ,कि हम भी मोह माया से आजाद होकर अमर हो जाए।”

प्रवचन देते हुए महाराज मुस्कुराए, प्रवचन सुन रहे सभीं श्रोताओं को महाराज ने मानों उन्होंने एक-एक करके सब को देखा।

किसी भी प्रकार कोई भी शोर नहीं था। सन्नाटा के साथ सब इस बात पर विचार कर रहे थे कि महाराज इसके लिए क्या उपाय बता रहे हैं। महाराज तो वाकई में महाराज थे। उन्होंने कुछ नहीं बोला! सामने एक पेड़ के तने को देखकर उसके तरफ चल पड़े। श्रोता कुछ समझ पाते महाराज मंच से उतरकर पेड़ के पास पहुंच गए। मंच से उठने के बाद महाराज ने न दाएं देखा, न बायं देखा,किसी को नहीं देखा। खामोश उठकर ऐसे गए जैसे उन्हें अपना कोई चीज खो गया हो और बाद में याद आया हो, कि फलाने जगह वह बहुमूल्य सामान छूट गया हो।

पेड़ के पास जाकर महाराज नें उस पेड़ के तने को पकड़ लिया और चिल्लाने लगे “बचाओ बचाओ, बचाओ, बचाओ, बचाओ……!”


आश्चर्य! महाराज के सेवक भी आश्चर्य में पड़ गए। सभीं श्रोता को लगा यह अचानक महाराज को क्या हो गया। महाराज के कुछ सेवक दौड़े-दौड़े महाराज के पास गए और महाराज को पकड़कर पेड़ से छुड़ाने लगे। सभीं का दृष्टि अपने दिमाग के अंदर अनेक दृश्य का निर्माण करने लगा। सभीं नें सोचा!कहीं महाराज पागल तो नहीं हो गए।

सेवक छुड़ाने की कोशिश कर रहे हैं और महाराज तने को पकड़कर “बचाओ ,बचाओ बचाओ, बचाओ”  चिल्लाए जा रहे हैं।

यह सिलसिला कुछ क्षण ऐसा ही चलता रहा। महाराज पेड़ के तने को छोड़ दिए और वापस आकर अपने जगह बैठ गए। महाराज! मंद- मंद मुस्कान के साथ ठहाके लगाने लगे। वापस खामोश होकर कहते हैं  “कुछ समझ में आया! हे मानव! तेरा यह भ्रम है, कि माया ने तुझे जकड़ रखा है, वास्तव में माया को तू ने जकड़ रखा है। स्वयं से ही माया को पकड़कर शोर मचा रहा है। दुनिया ने तुझे नहीं पकड़ा है दुनिया को तुम ने पकड़ा है।”

गुरु जी कहते हैं ” वास्तविक माया यही है। माया से हमने अपने आप को बांधकर रखा है, माया ने हमें नहीं बांधा है।”

“कर्म करने के लिए ईश्वर ने बल युक्त शरीर का निर्माण किया है। कर्म से भागा नहीं जा सकता।”

गुरु जी कहते हैं”अच्छे की आवश्यकता हर जगह है। जब कोई तत्व बेकार अथवा अच्छे गुणकारी नहीं होता तो ईश्वर अथवा प्रकृति स्वयं ही समय अनुसार उसे नष्ट कर देता है।

यह समाज भी बुरे तत्वों का त्याग करता है। अर्थात संक्षेप में कहें तो योग्य की हीं हर जगह आवश्यकता है। वास्तविक भक्त बनो, तुम्हें ईश्वर को खोजने की आवश्यकता नहीं है, वह ईश्वर स्वयं ही तुम्हें खोज लेगा।”

मेरे गुरु जी को प्रकृति से भी बहुत लगाव है। वे कहते हैं

“जिस प्रकार तुम्हें प्रकृति की आवश्यकता है, उसी प्रकार प्रकृति को भी तुम्हारा आवश्यकता है। इस ब्रह्मांड में जो कुछ भी है, सभीं अहम हैं।”

वह ईश्वर कुछ नहीं खाता है, रूप रंग अथवा फूल पत्ते दान से समाज को खुश किया जा सकता है ,परंतु ईश्वर को खुश नहीं किया जा सकता। क्योंकि ईश्वर तो विचारों में है न! अपने विचारों के शुद्धि के अलावा कोई उपाय नहीं है ईश्वर को खुश करने के लिए।

यदि तुम देवता के पास लेने के लिए जाओगे तो वह देगा! निश्चित देगा! वह वस्तु देगा, परंतु स्वयं को नहीं देगा।

ईश्वर की प्राप्ति करना है तो ईश्वर के पास ईश्वर के लिए जाओ। क्योंकि वास्तव में ईश्वर हीं तो सबका मालिक है न!”

गुरु जी के शब्दों में मैंने खास देखा है की उनके शब्दों में भेदभाव नहीं है। उनकें शब्द सांसारिकता से कहीं ऊपर है।

उनकें शब्दों में किसी के द्वारा थोपा गया शब्द नहीं है। वे उदाहरण तो अनेक शास्त्र और संत की दिया करते हैं, परंतु शब्दों के पीछे का अनुभव उनका अपना है। उनका सिद्धांत अपना विशेष है।



मुझे आज गुरु जी के शब्दों को लिखकर अनेक हर्ष प्राप्त हो रहा है। गुरुजी एक गुप्त महान संत हैं, तत्व ज्ञानी महामानव है, जो अपने आप में अतुल्य हैं।

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मेरे अनुसार से ऐसे महान महात्मा के शब्द का समाज के लिए विस्तार होना चाहिए।

मैं आगे गुरु जी के शब्दों का विस्तार देने की कोशिश करूंगा, भविष्य !:गुरु जी के शब्दों का चिंतन करेगा और उनके शब्द समाज के प्रत्येक व्यक्ति के लिए मार्गदर्शन का कार्य करेगा। मेरे सभीं शब्द गुरुजी के चरण कमलों में समर्पित है।

अपने गुरु जी के साथ समस्त पाठक मित्रों को ईश्वर स्वरूपांश नमन। ब्रह्म चिंतन के लिए धन्यवाद!

2 thoughts on “तत्वदर्शी दार्शनिक महात्मा। Sudarshan Singh parsurampur Saran.

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