विशाल होने के बावजूद आपस में कोई आपसी संघ नहीं है, कुछ संघ है ,तो आपस में अनेक मतभेद है। हिंदू अथवा सनातन शब्दों में यह तो कहते हैं ,कि हम सभीं एक हैं, परंतु वास्तव में अनेक बनकर विचरण करते हैं।

इसका दुष्परिणाम पूर्व काल से होते रहा है। परदेसी मत वाले हमेशा से हीं इसका फायदा उठाते रहे हैं। सनातन विचारधारा कहता है   “पहले पात्र बनो उसके बाद हम उपदेश का विचार करेंगे। हम योग्यता के ऊपर इस निष्कर्ष पर पहुंचेंगे कि किसे कौन सा ज्ञान देना है।”

  सनातन धर्म में परदेसियों को हमने महत्व न देकर भी उनकों बहुत कुछ करने के लिए सुयोग स्थान प्रदान कर दिया

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