वेदांत दर्शन समुंद्र के जैसा विशाल है।  संस्कृत भारत दर्शन का प्राचीनतम भाषा है। संस्कृत आज समाज का मुख्य भाषा नहीं है, जिसके वजह से वेदों के शब्दों को आज की प्रचलित भाषा में प्रस्तुत किया जाना चाहिए।

समाज में सनातन समाज के कल्याण के लिए एवं बच्चों को सनातन संस्कृति से जोड़ने के लिए, आज वेदांत दर्शन को प्रचलित भाषा में प्रस्तुत करने की निरंतर आवश्यक है।

सनातन पद्धति को न समझ कर आज कुछ लोग निश्चित तौर पर सनातन की आलोचना करते हैं, और सनातन के बच्चे अपने सनातन के महत्व को न जानते हुए उन आलोचना को मुक दर्शक बनकर स्वीकार कर लेते हैं।

आश्चर्य की बात है आज भी लोग सनातन के ऊपर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं जिनके सिद्धांत से सर्व समाज का भला नहीं होने वाला है।

ॐ पूर्णमद: पूर्णमिदं। वेद मंत्र का महत्व क्यों। Vedant Darshan

जो सिर्फ हठ रूपी कुछ सिद्धांतों को समाज के ऊपर थोपना चाहते हैं। सनातन धर्म के अंदर जितने भी मूल धर्म ग्रंथ हैं वे सभीं सर्वजन हिताय और सर्वजन सुखाय के सिद्धांत पर आश्रित हैं।

सनातन धर्म यदि अपने आप को! धर्म का विश्व गुरु मानता है, तो उसके पीछे उसका सिद्धांत भी विश्व गुरु वाला है।

सनातन अपने ईश्वर को विश्वरूप के रूप में देखता है। अर्थात सनातन का मानना है कि इस धरती पर जितने भी ईश्वर के द्वारा रचना की हुई तत्व अथवा जीव है वे सभीं ईश्वर के सदृश्य हैं।

निश्चित तौर पर इतने प्राचीन धर्म में कुछ ऐसे भी हुए अथवा हैं, जो अपने ही सनातन धर्म में आडंबर फैलाते हैं।

जिसकी वजह से कहीं-कहीं सनातन धर्म का परिहास होता है।

इन सबके बावजूद सनातन धर्म वेदांत दर्शन के शब्द एवं शब्द के महत्व किसी भी परिस्थिति में बदलते नहीं और न हीं कम होते हैं। किसी के झूठ और मन ग्रंथ वाक्यों का विस्तार कर देने से वास्तविकता में बदलाव नहीं आता। किसी के कह देने से ईश्वर अपना रूप बनाता नहीं अथवा किसी के कहने से अपने रूप का परिवर्तन नहीं करता।

यहां एक बात विचारणीय है, ईश्वर के प्रति जीव का विचार बदलता है।

हम ईश्वर के प्रति अपनी सोच को बदल सकते हैं। परंतु ईश्वर हमारे सोच के अनुसार, अथवा ईश्वर इस धरती के समाज के अनुसार अपना विचार नहीं बदलता। वह ईश्वर सदैव अपने एक रस में रहता है।

ईश्वर को किस रूप में माने यह हमारा अपना विचार हो सकता। हमारे विचार के आधार पर ईश्वर अपना रूप नहीं बदलेगा।

इस धरती के प्रत्येक जीव में ईश्वर समान रूप से विद्यमान है और उस ईश्वर के ऊपर ब्रह्मांड के सभीं जीवों का समान रूप से अधिकार है।

कोई भी धर्म हो अथवा व्यक्ति हो यदि अपने स्वार्थ के अनुसार से ईश्वर के लिए कोई नियम कानून बनाता है, तो वह अपने आप को तथा समाज को भ्रम में डालता है।

सनातन धर्म में कहा गया है, वास्तविक गुरु के पास जाने पर सभीं प्रकार के भ्रम जाल का नाश हो जाता है।

भावनाओं का भ्रम जाल बिना प्रयास के खत्म नहीं होता, और सद्गुरु उस भावनाओं के जाल को तोड़ने में मदद करता है। कोई विशेष व्यक्ति यदि भावनाओं के जाल को और मजबूत करें तो वह सद्गुरु के श्रेणी में नहीं आ सकता।

प्रकृति के रुख को कोई मोड़ नहीं सकता, प्रकृति तो अपने आप रास्ता बनाने के लिए स्वतंत्र है।

इस प्रकृति को बनाने वाला ईश्वर स्वयं स्वतंत्र है। किसी के मानने से अथवा न मानने से ईश्वर के वास्तविकता में कोई फर्क नहीं पड़ता।
ईश्वर और प्रकृति की वास्तविकता वेद शास्त्र स्पष्ट रूप से प्रकट करते हैं।

वेद के विभाग चार है: ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद।

1.ऋग्वेद :
ऋक अर्थात् स्थिति और ज्ञान। ऋग्वेद सबसे पहला वेद है जो पद्यात्मक है। ऋग्वेद की ऋचाओं में देवताओं की प्रार्थना, स्तुतियां और देवलोक में उनकी स्थिति का वर्णन है। इसमें जल चिकित्सा, वायु चिकित्सा, सौर चिकित्सा, मानस चिकित्सा और हवन द्वारा चिकित्सा आदि की भी जानकारी मिलती है। ऋग्वेद
में औषधि सूक्त यानी दवाओं का जिक्र मिलता है। औषधि में सोम का विशेष वर्णन है। ऋग्वेद में च्यवनऋषि को पुनः युवा करने की कथा भी मिलता है।


2.यजुर्वेद :

ॐ पूर्णमद: पूर्णमिदं। वेद मंत्र का महत्व क्यों। Vedant Darshan

यजुर्वेद में यज्ञ की विधियां और यज्ञों में प्रयोग किए जाने वाले मंत्र हैं। यज्ञ के अलावा तत्वज्ञान का वर्णन है। तत्व ज्ञान अर्थात रहस्यमयी ज्ञान। ब्रह्म, आत्मा, ईश्वर और पदार्थ का ज्ञान। यह वेद गद्य मय है। इसमें यज्ञ की असल प्रक्रिया के लिए गद्य मंत्र हैं। इस वेद की दो शाखाएं हैं शुक्ल और कृष्ण।

3.सामवेद :

साम का अर्थ रूपांतरण और संगीत। इस वेद में ऋग्वेद की ऋचाओं का संगीतमय रूप है। सामवेद गीतात्मक यानी गीत के रूप में है। इस वेद को संगीत शास्त्र का मूल माना जाता है। इसमें सविता, अग्नि और इंद्र देवताओं के बारे में जिक्र मिलता है।

4.अथर्ववेद :

अथर्ववेद का अर्थ है कंपन और अथर्व का अर्थ अकंपन। ज्ञान से श्रेष्ठ कर्म करते हुए जो परमात्मा की उपासना में लीन रहता है वही अकंप बुद्धि को प्राप्त होकर मोक्ष धारण करता है। इस वेद में रहस्यमयी विद्याओं, जड़ी बूटियों, चमत्कार और आयुर्वेद आदि का जिक्र है।

सनातन धर्म में वेद का स्थान सर्वोपरि है।

इन चार वेदों को प्रकृति की रचना के लिए देवता का चार स्वरूप बतलाया गया है। वेद कभी भी किसी काम अनिष्ट करने का प्रेरणा नहीं देता।

संसार में जीवधारियों को तीन प्रकार से कष्ट होते हैं जिन्हें त्रिविध ताप कहा जाता है। दैहिक, भौतिक तथा दैविक ताप है।

शरीर को स्वतः अपने ही कारणों से जो कष्ट होता है उसे दैहिक ताप कहा जाता है। इसे आध्यात्मिक ताप भी कहते हैं क्योंकि इसमें आत्म या अपने को अविद्या, राग, द्वेष, मू्र्खता, बीमारी आदि से मन और शरीर को कष्ट होता है।
जो कष्ट भौतिक जगत के बाह्य कारणों से होता है उसे आधिभौतिक या भौतिक ताप कहा जाता है। शत्रु आदि स्वयं से परे वस्तुओं या जीवों के कारण ऐसा कष्ट उपस्थित होता है।

जो कष्ट दैवीय कारणों से उत्पन्न होता है उसे आधिदैविक या दैविक ताप कहा जाता है। अत्यधिक गर्मी, सूखा, भूकम्प, अतिवृष्टि आदि अनेक कारणों से होने वाले कष्ट को इस श्रेणी में रखा जाता है।

वेदांत दर्शन को अथाह समुंदर कहा गया है ,कारण वेदों में जो ज्ञान भरा है उसका पूर्ण थाह कोई नहीं लगा सकता।

जो जितना समझ पाते हैं वे उसे प्रकट करने की कोशिश करते हैं। संपूर्ण वेदों का सार श्रीमद्भागवत गीता जी को कहा गया है।

किसी का विचार और व्यक्तिगत विचार यदि दो है ,तो वह विचार पूर्ण रूप से दूषित है। बहुत ऐसे मामलों में देखा गया है कि समाज के सामने प्रकट करने वाला विचार अलग होता है, तथा उसका अपना विचार अलग होता है। अर्थात जिस विचार को पूर्ण रूप से समाज के सामने प्रकट न किया जा सके वह विचार व्यक्तिगत विचार हो सकता है। वैसा विचार कभी भी लोक कल्याणकारी नहीं होता।

वेद शास्त्र, सनातन साहित्य या संक्षेप में कहें तो वेदांत दर्शन कोई बात छुपकर नहीं कहता।

यदि वेदांत दर्शन का गहराई से अध्ययन हो तो पता चलता है कि संसार के उन्नत सभ्यता का कारण मूल रूप से वेद तथा सनातन साहित्य है। सनातन साहित्य अपने हर शब्द के जरिए एक जीव को पूर्ण रूप से मानव बनाने का मार्ग उपदेश करता है। सनातन साहित्य के बिना हम अपने पूर्ण मानव का कल्पना नहीं कर सकते। मानव का महत्व मानव बनने के उपरांत होता है।

वेदांत दर्शन में शांति पाठ के लिए निरंतर प्रयोग में लाने वाला एक महामंत्र है।

ॐ पूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात् , पूर्ण मुदच्यते,
पूर्णस्य पूर्णमादाय, पूर्ण मेवा वशिष्यते।
।।ॐ शांति: शांति: शांतिः।।    
 शांति मंत्र- ईशा उपनिषद

वह जो (ईश्वर) दिखाई नहीं देता है, वह अनंत और पूर्ण है। क्योंकि पूर्ण से पूर्ण की ही उत्पत्ति होती है। यह दृश्यमान जगत भी अनंत है। उस अनंत से विश्व बहिर्गत हुआ। यह अनंत विश्व उस अनंत से बहिर्गत होने पर भी अनंत ही रह गया।

वास्तव में देवता को ईश्वर ने अपने लिए नहीं बनाया मानव समाज के लिए बनाया।

क्योंकि समाज को कुछ देने वाला चाहिए था। वास्तव में ईश्वर तो सब कुछ दे चुका है, उसे अब और कुछ देने की आवश्यकता नहीं है। जिसे जो कुछ चाहिए, वह वैसा देने वाले देवता का खोज करता है।

वेदांत दर्शन यह अपने शब्दों में कहता है कि वह ईश्वर किसी को दिखाई नहीं देता।

वह अनंत है एवं अपने आप में पूर्ण हैं। देवताओं को पूजने से देवताओं को शक्ति प्राप्त होता है परंतु ईश्वर स्वयं ही शक्ति का निर्माता है। यह संसार अनंत है ,परंतु वह ईश्वर इस अनंत में भी अनंत है और इस अनंत से बाहर भी वह स्वयं अनंत है।

देने वाले का महत्व जिससे लेना है वह उसको देता है।

ईश्वर वास्तव में देने और लेने की प्रक्रिया से बहुत दूर है। उसनें तो देने वाला भी बना दिया और लेने वाला भी बना दिया। अब यह जीव के ऊपर है कि वह देने वाले के पास जाता है अथवा इस संसार के निर्माता के पास जाता है।

ऐसा नहीं है कि देवता में वह ईश्वर नहीं है, क्योंकि वास्तव में उस ईश्वर से अलग तो कुछ है हीं नहीं।

यदि यहां पर उस देवता को देने वाला न मानकर संसार का निर्माता मान लिया जाए तो वह ईश्वर उसी रूप में निर्माता बनकर खड़ा हो जाएगा। परंतु यह मानने की शक्ति भावनाओं के कैद में है, भावनाओं के कैद में हुए जीव को एक सहारे की आवश्यकता होता है। वह सहारा कभी स्थिति बनता है, कभी सद्गुरु बनते हैं, कभी ईश्वर रूपी नाम शब्द बनता है, कभी शब्द रूपी मंत्र बनता है।

अपने द्वारा इस प्रकार की दृष्टि के लिए? मैं अपने गुरु का आजीवन आभारी हूं। वेदांत दर्शन के सनातन साहित्य के सभीं चिंतक एवं विचारक पाठकगण का विशेष चिंतन के लिए मैं हार्दिक आभार प्रकट करता हूं। ईश्वर सभीं चिंतकों को अनुग्रहित करें।

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