मंत्र को लेकर समाज में अनेक प्रकार की भ्रांतियां मौजूद है। “जादू टोना के अचूक मंत्र, वशीकरण मंत्र, सिद्धि मंत्र।” ऐसे मंत्रों के अनेक किताब भी मौजूद है।

वास्तव में मंत्र क्या है? इस प्रकार के मंत्र कैसे काम करते हैं? मंत्र को कैसे समझें? समाज के अंदर ऐसे अनगिनत सवाल हैं।

सनातन साहित्य में ज्योतिष विद्वानों के अनुसार मूल बीज मंत्र “ॐ” होता है।

जिसके अनेंक भाग है- योग बीज, तेजो बीज, शांति बीज, रक्षा बीज।

ये सब बीज इस प्रकार जपे जाते हैं- ॐ, क्रीं, श्रीं, ह्रौं, ह्रीं, ऐं, गं, फ्रौं, दं, भ्रं, धूं,हलीं, त्रीं,क्ष्रौं, धं,हं,रां, यं, क्षं, तं।

यह बीज मंत्र जाप के समय इस ब्रह्मांड में एक ध्वनि उत्पन्न करते हैं। यह उत्पन्न ध्वनि हीं प्रभाव करता है। मंत्र के अनेक प्रभाव प्रचलन में बताए जाते हैं।

मृत्योर्मामृतं गमय। मंत्र का भ्रम कैसे दूर हो? Mantra ki Shakti.



बीज मंत्र हर प्रकार की बीमारी, भय, चिंता और हर तरह की मोह-माया से मुक्त करवाता हैं।

इन चमत्कारी मंत्रों का जाप करने से अनेक प्रकार के प्रभाव होते हैं जैसे- दीर्घायु, धन, परिवार का सुख। कुछ विपरीत प्रभाव शत्रु हानि ,शत्रु विनाश, वशीकरण इत्यादि।

वास्तव में यदि मंत्र के शक्ति की बात करें तो किसी भी मंत्र में अपना कोई शक्ति नहीं होता। शक्ति तो विशेष भावना द्वारा उच्चारित शब्द के स्वर में होता है। यदि कहीं मंत्र के पास अपना शक्ति है तो भी वह मंत्र भावना और शब्द के बिना शक्तिहीन है।

जैसा कि सत्य है जीव के अंदर अपना भावना हीं सबसे ज्यादा प्रभाव में रहता है। जीव अपने द्वारा रचित भावना द्वारा ही परवश हुआ अच्छे और बुरे कर्म करने को बाध्य रहता है और करता भी है। अपने भावना के अनुसार दूसरे का भावना अनुकूल पाता है तो व्यक्ति उसे अच्छा मानता है। उसी व्यक्ति को जब प्रतिकूल भावना मिलता है तो वह उसे गलत मानता है।

इस भावना को व्यक्ति का व्यक्तिगत सिद्धांत भी कह सकते हैं।

व्यक्ति का सिद्धांत कभी भी किसी दूसरे का गुलाम नहीं होता।

एक दूसरे के सिद्धांत आपस में मिल सकते हैं परंतु वास्तविक सिद्धांत बदल नहीं सकते। जिस सिद्धांत में दूसरे को देखकर बदलाव आए वह सिद्धांत नहीं हो सकता।

सभी विद्वान इस बात को समझते आए की अच्छा और बुरा दोनों एक साथ आया। दोनों का एक के बिना दूसरे का कोई अस्तित्व नहीं है।

दुनिया में बड़ी बहस! संसार में पहले कौन आया! मुर्गी या अंडा?

यह निश्चित तौर पर चिंतन और चर्चा का विषय है। इस पर बहस भी होना चाहिए। इसका समाधान एक लाइन में हो सकता है। मुर्गी और अंडा दोनों का एक दूसरे के बिना कोई अस्तित्व नहीं है। अंडे के अंदर मुर्गी मौजूद हैं और मुर्गी के अंदर अंडा मौजूद है। हम जिस किसी को भी पहले मान ले! दूसरा स्वत: अपने आप साथ में आ जाता है।

इसे कहते हैं भावनाओं का जाल। भावना रूपी जाल को कोई बाहरी व्यक्ति नहीं तोड़ सकता। अपने भावनाओं के जाल को स्वयं से ही स्वयं को तोड़ना होगा। क्योंकि यह भावना व्यक्ति के अंदर सबसे बड़ा हठीं है।

यह भावना शरीर के अंदर रहकर कितने प्रकार से खेल खेलता है यह सामान्य व्यक्ति समझ भी नहीं पाता।

जब कभी भी भावना के अनुकूल कुछ नहीं मिलता तो यह भावना अनेक प्रकार के क्रियाएं चालू कर देता है।

कान सुनता तो है परंतु शब्द को अंदर रिकॉर्ड नहीं होने देता। आंखे देखता तो है परंतु वह तस्वीर छपने नहीं देता। उंगलियां कुछ स्पर्श तो करता है परंतु भावना उस स्पर्श को दिल तक पहुंचने नहीं देता।

वह व्यक्ति पांच दोस्तों के बीच में आपस में गप्पे कर रहा होता है तो भी वह भावना के विपरीत शब्दों को हंसकर नजरअंदाज करते जाता है।

दुनिया के किसी भी धर्म के किसी भी मंत्र को लें। सभीं भावनाओं के द्वारा कार्य करते हैं।

वास्तव में जिसके भावना में जितने शक्ति है मंत्र उतना कारगर होता है। मंत्र क्रिया अथवा जाप में भावना सम्मिलित न हो तो उसका फल नहीं मिल सकता।

मंत्र भावना के अनुसार से कार्य करते हैं। मंत्र शुभ के लिए हो और भावना अशुभ के लिए हो , तो‌ उसी मंत्र का प्रभाव अशुभ में परिवर्तित हो जाएगा।

एक व्यक्ति का मस्तिष्क अपनी भावनाओं के जरिए दूसरे के मस्तिष्क को प्रभावित करता है। इस बात को एक प्रेमी, मां, एक दुश्मन के भावनाओं के जरिए समझा जा सकता है।

विज्ञान कहता है अंतरिक्ष के पास अपना कुछ नहीं है। न उसके पास अपना प्रकाश है और न ही उसके पास अंधेरा है। अर्थात यू कह सकते हैं कि प्रकाश और अंधकार अंतरिक्ष से अलग है।

इस दृष्टि से देखें तो अंधकार और प्रकाश दोनों ही एक दूसरे से जुड़े हुए। एक के बिना दूसरे का अपना कोई अस्तित्व नहीं है। यहां अंधकार पहले आया या प्रकाश इस पर बहस हो सकता है। परंतु दोनों का एक दूसरे के बिना कोई अस्तित्व नहीं है।

इसी प्रकार मंत्र है। अच्छा करने वाला मंत्र और बुरा करने वाला मंत्र। यदि कोई अच्छा करने वाला मंत्र है तो बुरा करने वाला भी मंत्र है। सभीं मंत्र भावनाओं के जरिए उत्पन्न हुआ है।

सरल भाषा में समझ सकते हैं की हिंदू धर्म के

मंत्र दूसरे धर्म के लोगों को प्रभावित नहीं करता। दूसरे धर्म के मंत्र हिंदू धर्म के लोगों को प्रभावित नहीं करता।

अथवा यो कह सकते हैं एक विशेष धर्म का मंत्र दूसरे धर्म के लोगों को प्रभावित नहीं करता। कारण मूल यही है की दूसरे धर्म में मंत्र के प्रति भावना नहीं होता।

जिसके अंदर भावना सम्मिलित हो चुका है उसके ऊपर वह मंत्र प्रभावित करेगा। यदि मंत्र भावना के अनुरूप है तो वह दूसरे किसी को प्रभावित करें अथवा न करें उस व्यक्ति को जरूर प्रभावित करेगा। क्योंकि अमुक मंत्र को व्यक्तियों के भावना ने स्वयं से ही स्वीकार कर लिया है।

निश्चित तौर पर हमारे पूर्व के महामानवों ने अपने अनुसार से अनेक महान शक्तिशाली मंत्र का सृजन किया। उन्होंने उस मंत्र के शक्ति को समझा और उसके प्रभाव से भी संसार को अवगत कराया।

संसार में यदि करोड़ों महामंत्र है तो उतने और मंत्र सृजन किए जा सकते हैं। बशर्ते की वैसे मंत्र की शुद्ध भावना मौजूद हो।

व्यक्ति के अंदर भावना का कोई सीमा नहीं होता, उसी प्रकार मंत्र के प्रयोग के बाद मंत्र के शक्ति का कोई सीमा नहीं होता। संसार में अनेकों प्रचलित मंत्र हैं और भावना के बिना व्यक्ति उन मंत्र को शक्ति विहीन मानता है। जबकि मैंने कहा शक्ति तो अपने भावना में है। संसार में अनेंक भ्रामक मंत्र मौजूद है, जिसके कारण विशाल मंत्र को भी साधारण समझा जाता है।

मुर्गी या अंडा पहले कौन? sanatansaty.com

सनातन के महामानवों ने मंत्रों का एक विशाल साम्राज्य रख छोड़ा है। व्यक्ति मंत्र को न समझते हुए उसके प्रभाव को न जानते हुए उससे दूर रहते हैं।

यदि संक्षेप में मंत्र के लिए बात कहें तो संसार में जो अदृश्य शक्ति है। जिसके लिए पूर्व काल से ही अनेंक प्रकार के कल्पनाएं, प्रयास होते रहे हैं। उस शक्ति के नाम पर जो कुछ भी कहा जाए सभीं मंत्र है।

किसी का बुरा करने के लिए एक व्यक्ति एक अशुद्ध मंत्र का जाप करता है।

वह बार-बार कहता है कि वह शक्ति अमुक व्यक्ति का विनाश कर दे।

मानो वह परम शक्ति! उस व्यक्ति का गुलाम हो। वह शक्ति तुरंत उसकी नौकरी पर लग जाएगा और उस व्यक्ति का विनाश कर देगा। वह शक्ति किसी के इशारे पर काम नहीं करता, उस शक्ति का यह संपूर्ण प्रकृति स्वयं ही गुलाम है।

ऐसे मंत्र का जाप करने वाला व्यक्ति दूसरे को मूर्ख नहीं बनाता वह स्वयं को मूर्ख बनाता है। तलवार दूसरे के साथ साथ अपने लिए भी घातक होता है। मंत्रों का गलत इस्तेमाल करने वाले व्यक्ति को उस मंत्र का भावना ही ! अंत में उसका नाश कर देता है।

सनातन में वेद मंत्र को ऐसे हीं महान नहीं कहा जाता। सनातन धर्म में वसुधैव कुटुंबकम ऐसे हीं महान नहीं है। सनातन धर्म में सर्वे भवंतु सुखिनः ऐसे हीं महान नहीं है।

क्योंकि इस प्रकार के मंत्र सिर्फ कल्याणकारी नहीं है। ऐसे मंत्र तो सर्व कल्याणकारी है। ऐसे मंत्र से जुड़े सभीं भावनाओं का सम्मान है। ऐसे मंत्र सभीं का सब प्रकार से कल्याण हीं करते हैं।

संसार में अनेक प्रकार से महामंत्र को छोटा करने के लिए उसके अनुरूप दूसरे मंत्र की रचना कर दी गई। इन सबके बावजूद महामंत्र तो महामंत्र हीं है।

इन मंत्रों की भ्रामक प्रचलन की वजह से परमेश्वर के लिए सत्य मंत्र का भी आकर्षण कम होता है।

वेदांत दर्शन में एक महामंत्र है।
।।ॐ असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मामृतं गमय।।

वेद कहता है- हे ईश्वर (हमको) असत्य से सत्य की ओर ले चलो। अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो। मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो।

अर्थात यह सत्य है- सत्य और असत्य दोनों मौजूद है। अंधकार और प्रकाश भी मौजूद है। मृत्यु है तो अमरता भी मौजूद है। वास्तव इन सभीं का एक दूसरे के बिना अपना कोई अस्तित्व नहीं है। इन सभीं से अलग ईश्वर है। यह सभीं उस ईश्वर के सदैव आधीन हैं।

सत्य के साथ असत्य, प्रकाश के साथ अंधकार और मृत्यु के साथ अमरता स्वत: ही साथ साथ चलता है। दोनों का ही अपना अस्तित्व है… भीं। दोनों ही व्यक्ति को अपनी तरफ खींचने का प्रयास करते हैं।

चुकी भावना के कारण व्यक्ति स्वतंत्र नहीं है इसलिए उसे अदृश्य परम शक्ति के नाम का सहारा लेना पड़ता है। अथवा उसे उस परम शक्ति का सहारा लेना चाहिए। उस शक्ति को आज तक किसी ने नहीं देखा। वह शक्ति संसार में है, यह भी सत्य है। हर व्यक्ति उस परम शक्ति का अपने भावना के अनुसार आवाहन कर सकता है। हर व्यक्ति अपने भावना के अनुसार उस परम शक्ति से आग्रह कर सकता है।

संसार का हर व्यक्ति उस परम शक्ति का प्रार्थना अपने भावना के अनुसार कर सकता है। यदि संसार में किसी का जीवन है तो उसका मृत्यु भी सत्य है। उस परमेश्वर से आग्रह करके वह व्यक्ति मृत्यु के भावना से पार पा सकता है। वह मृत्यु रूपी भावना को अमरता में परिवर्तित कर सकता है।

संसार में वेद शास्त्र ऐसे हीं महान नहीं है। यह शास्त्र कभी भी किसी दूसरे का अहित करना नहीं सिखाते।

यह शास्त्र दुर्भावना और क्रोध को दूर करने का दवा एवं रास्ता बताते हैं। यह शास्त्र तो बार-बार अपने शब्दों में कहता है।

हे ईश्वर (हमको) असत्य से सत्य की ओर ले चलो। अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो। मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो।

यह जीव का सबसे बड़ा प्रार्थना होना चाहिए। इस मंत्र में कहीं नहीं लिखा है कि यह हिंदू अथवा सनातन का मंत्र है। इस मंत्र का भावना यह सिखाता है कि वास्तव में एक जीव का भावना क्या होना चाहिए।

वेद परमेश्वर की वाणी है! ऐसे हीं नहीं कहा जाता। न समझने के कारण, अथवा भावनाओं के विपरीत होने के कारण इन महामंत्र का व्यक्ति प्रभाव नहीं जानते। मंत्र अच्छा है अथवा बुरा यह तो उस मंत्र से जो भावना उत्पन्न होता है वह बताएगा। किसी भी मंत्र को समझने के लिए उस मंत्र रचना का उद्देश्य समझना होगा।

संसार में एक कहावत है “नौ सौ चूहे खाकर बिल्ली गज को चली।”

क्या यह हो सकता है कि जिसने नौ सौ चूहों का भक्षण किया हो वह पाक साफ हो। और उसके द्वारा दिया गया मंत्र सर्व कल्याणकारी हो। इसका विचार तो पाठक प्रेमियों को ही करना होगा। मैं कभी भी अपने भावनाओं को किसी के ऊपर थोपने की कोशिश नहीं करता। सभीं भावनाओं के पीछे मेरा एक हीं सोच रहता है कि व्यक्ति स्वयं से स्वयं के भावनाओं को पढ़ने का प्रयास करें।

स्वयं को एक तुला के रूप में सृजन करें और अपने विचारों को उसके ऊपर रखें।

वास्तविकता किसी के समझाने से समझ में नहीं आता। वास्तविकता तो स्वयं से स्वयं का अनुभव ही समझा पाता है।

उत्तम विचार से लेख को पढ़ने के लिए पाठक प्रेमियों का हार्दिक शुभ अभार! धन्यवाद!

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