मैं भारत हूं। अपने अतीत की बात सुनाता हूं। यहां के पूर्वज किसके थे? देश के पूर्वजों का कसूर क्या था?  क्यों हम उन्हें भूल गए।

मैं भारत हूं, मुझे दर्द है अपने अतीत का। आज कुछ लोग अपने पूर्वजों के वास्तविकता को भूल कर इतिहास को बदलने की कोशिश करते हैं।

मेरे ऊपर परदेसी आक्रमणकारियों द्वारा कितना अत्याचार किया गया ,उसके लिए मेरे पास शायद पर्याप्त शब्द नहीं होंगे।

पूर्वज किसके थे? सनातन भारत का दर्द। Sanatan Bharat ke purvaj. सनातन सत्य

उन पूर्वजों का क्या कसूर था ,जो अतिथि को देव मानते रहे।


उनका विचार ऐसा था।
“दरवाजे पर एक व्यक्ति आता है और पानी मांगता है। गृहस्वामी सम्मान से बिठाकर पानी के साथ जलपान भी कराता है। वह व्यक्ति लूटने के इरादे से एक दिन के लिए आसरा मांगता है। गृहस्वामी उसे आसरा देता है और उसी रात को सोए में वह व्यक्ति गृहस्वामी के साथ पूरे परिवार को मारकर घर को लूट लेता है।”

विचार करें- क्या कसूर उस गृहस्वामी का, उसका कसूर इतना ही रहता है ,कि वह अतिथि को देव समझना उसका सिद्धांत था।

सिर्फ पानी पिलाना उसे अच्छा नहीं लगता था, इसलिए साथ में जलपान भी कराया। उसे क्या पता था ‘ यह अतिथि देव एक हैवान है जो पूरे परिवार का मौत बनकर दरवाजे पर आया है।

कुछ इतिहासकार हमारे पूर्वजों को झूठलाने की कोशिश करते हैं। अपने झूठे सिद्धांत को सच दिखाने के लिए भ्रामक इतिहास की संरचना करते हैं।

ऐसे इतिहासकार आक्रमणकारी, बर्बरता और हैवानियत से युक्त परदेसियों को अच्छा एवं अपना आदर्श मानते हैं।

कदापि वे भूल गए हैं, कि ऐसा करके वे अपने पूर्वजों का अपमान कर रहे हैं। वे उन माताओं का अपमान कर रहे हैं ,जिन्हें नाना प्रकार के यातनाएं देकर, अनेक प्रकार से भोग किया गया और अंततः बच्चे पैदा करने की मशीन बनाकर छोड़ दी गई।

मैं भारत हूं। किसी इतिहास पर पर्दा डालने से वह इतिहास बदल नहीं जाता।

मैं वह प्राचीन भारत हूं ! जहां की जनता अपने आप में एक विश्वास के साथ रहा करती थी। सभीं एक दूसरे के साथ भाई चारे के साथ रहते थे।

आज कुछ लोग कहते हैं कि पुराने इतिहास में कुछ जाति के लोगों का विशेष ध्यान नहीं रखा गया। मैं कहूंगा वह इतिहास को झांके।

कोई एक श्रेष्ठ व्यक्ति एक जगह से दूसरी जगह ,जब बसने के लिए जाता था तो अपने साथ जाति के सभी समूहों को साथ लेकर जाता था।



यह निश्चित है कि उस समय भी कुछ अनैतिक कर्म करने वाले व्यक्ति मौजूद थे। ऐसा सदियों से होता रहा है। आज भी सबको पता है और असामाजिक तत्व आज भी मौजूद है। उनका काम सिर्फ और सिर्फ समाज के अंदर डर और भय का माहौल खड़ा करना है। वे वहीं हैं जो अपने विचारों को अपने स्वार्थ के लिए बेचने पर संकोच नहीं करेंगे।

कुछ इतिहासकार यह भ्रम पैदा करते हैं कि इस भूमि के पूर्वजों के साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ। उनका कहने का अर्थ होता है मानो किसी आक्रमणकारी ने कोई अत्याचार नहीं किया।

झूठ का दीवार बहुत समय तक नहीं टिकता। झूठ गढा़ जाता है और सत्य अपने आप में सत्य होता है।

सभीं जानते हैं कभी भी निर्धन के घर डाका नहीं पड़ता। जिस देश में खुद खाने के लिए अन्न न हो, उस देश को कोई लूट कर क्या करेगा।

उस समय भारत अपने आप में आधुनिक था। भौतिक सुख साधनों से समृद्ध था।

सनातन भारत में सुबह की शुरुआत मंदिर के घंटों से हुआ करता था।

वर्णाश्रम और जाति‌ था परंतु आज जो जातिवाद दिखाने का कोशिश करते हैं वह नहीं था।

उसका प्रमाण व्यक्ति अपने आप समझ सकता है। उस समय भारत में इस प्रकार से चोरी और डकैती नहीं हुआ करता था। यदि उस समय ऐसा होता तो “अतिथि देवो भव:।।”  नहीं होता।

आज कोई व्यक्ति जुर्म करता है तो अपने बचाव में दलील देता है ,कि उसे रोटी कपड़ा और मकान का अभाव था।

जो भी परदेसी भारत में आया , उसे मंदिरों में सोना दिखा ,धन दिखा। मंदिर में पड़े खजाने के साथ देव मूर्ति को भी लूट लिया।

जिस प्रकार शरीर का रोंम-रोंम अपना दर्द बयां करता है।

उसी प्रकार सनातन भारत के ऐतिहासिक स्थल चींख-चींख कर अपना दर्द बयां करते हैं।

देश को लूटा सो लूटा! यहां के संस्कृति को तहस-नहस कर दिया। यदि विचार करें तो उस समय उनके ऊपर हुए अत्याचार का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। वह वापस खड़ा होकर चढ़ाई न कर दें, इसलिए उन्होंने अपने अनुसार से पूरी तरह खत्म कर दिया।

क्रूर अत्याचारी शासकों द्वारा पहले तो सनातन संस्कृति को मिटाने की कोशिश किया। जब वह पूरी तरह नहीं मिटा पाए तो नाना प्रकार के भ्रमित साहित्य के द्वारा सनातन को भ्रमित किया। समाज के अंदर जातिवाद नामक भयानक जहर को घोल दीया।

यदि सनातन में सनातन को पेट नहीं भरता तो सनातन ही अपने में मारकर खा जाते।

धरती पर मानव ऐसा ही प्राणी है। यदि कुछ ना मिले खाने को तो एक मानव! मानव को ही मार कर खाएगा।

सनातन संस्कृति में अथवा सनातन भारत में इस प्रकार का वाक्य सुनने को भी नहीं मिलता । यह एक प्रमाण है, प्राचीन काल में भारत एक समृद्धशाली देश रहा।

यह हो सकता है, कुछ लोग कुछ रीति-रिवाजों को लेकर अपना भ्रम जाहिर कर सकते हैं।

पूर्वज किसके थे? सनातन भारत का दर्द। Sanatan Bharat ke purvaj . SanatanSatya

परंतु यदि विश्व के रीति रिवाज को करीब से देखें ,तो संसार में अनेक प्रकार के भ्रामक रीति रिवाज मौजूद है। सभीं अपने रीति रिवाज को उत्तम कह सकते हैं।

परंतु दूसरे के रीति रिवाज को बुरा-भला कहने का अधिकार किसी को नहीं है।

पूर्वज कोई अच्छा था अथवा बुरा ! उसके रहन सहन और चरित्र इस बात का प्रमाण दे सकते हैं। कोई व्यक्ति अत्याचारी और कुकर्मी रहता है उसके बाद भी उसे परोपकारी कौन से तर्क से कहा जा सकता है।

कोई इंसान यदि किसी के साथ बर्बरता करता है तो वह एक हैवान के समान है।

सभीं सनातनी को इस बात पर गर्व होना चाहिए कि उनके पूर्वजों ने अनेंक कष्ट सहकर अपने को बचाया, अपने धर्म को बचाया।

आज जो भी सनातनी हैं उनकें पूर्वज वास्तव में बहुत ही महान रहे।

क्योंकि वह बारंबार अत्याचार सहने के बावजूद भी अपने धर्म को नहीं छोड़ा। उन्होंने किसी परधर्मी का धर्म नहीं स्वीकार कर लिया।

मैं भारत हूं। यहां सब का सम्मान है। यह वह भारत है! जो अपमान कर गया उसका भी सम्मान है।

सनातन संस्कृति के पूर्वजों ने अनेक कष्ट और यातनाएं सहकर अपने संस्कृति को बचाया है।

हर एक सनातनी को अपने संस्कृति को समझना होगा। इतिहास को टटोलना होगा, अपने पूर्वजों को समझना होगा। अपने पूर्वजों तथा अतीत में हुए माताओं एवं बहनों पर हुए अत्याचार का चिंतन करना होगा।

कुछ चंद लोगों के भ्रामक तथ्यों से पूरा समूह गलत नहीं हो सकता। यह वही भारत है जो कभी इतना समृद्धशाली था‌, जो आया!  यहां से लूटकर ले गया।

भ्रम फैलाने वाले स्वयं ही भ्रम में जी रहे हैं, और वह भ्रम में ही जीते रहेंगे।

भारत में कितने हिंदू जानते हैं ,कि एक सनातन संस्कृति की महिलाएं गले में मंगलसूत्र क्यों धारण करती है? उस मंगलसूत्र के अंदर आखिर होता क्या है? यह रिवाज कब और कहां से आया?

सनातन भारत के रिवाज भी अपने आप में बहुत कुछ कहते हैं। सनातन संस्कृति की महिलाएं अपने पति के नाम के लिए मंगलसूत्र धारण करती है।

उस मंगलसूत्र में क्या रहता है। वास्तव में मंगलसूत्र के अंदर सनातन संस्कृति पर हुए अत्याचार का बहुत बड़ा सबूत सम्मिलित है।

मंगलसूत्र के बारे में भारत के सनातन से जुड़े श्रेष्ठ व्यक्ति समझते हैं। यह बात सभीं को जानना चाहिए। मंगलसूत्र परम पवित्र माना जाता है। सनातन संस्कृति में सुहागन स्त्री मंगलसूत्र को अपने जीवन के जैसे महत्व देती है।

मंगलसूत्र के अंदर सूअर के बाल ,नाखून अथवा हड्डी के अवशेष होते हैं। जो नहीं जानते! वह इस बात को आश्चर्य करेंगे। आखिर पूर्वजों ने क्या विचार करके ऐसे रिवाज को प्रचलन में लाया होगा। इसके पीछे वास्तविक घटना बहुत बड़ा है।

रीति-रिवाजों का मुख्य आधार विशेषकर किसी किताब में नहीं मिलता। जब मुस्लिम शासक का अत्याचार सनातन भारत पर चल रहा था।

जिस समय मुस्लिम शासकों के अत्याचार में, धर्म परिवर्तन के साथ-साथ सनातन संस्कृति की बहू-बेटियों पर अत्याचार किए जा रहे थे।

उस समय श्री स्वामी शंकराचार्य जी के निर्देश पर भारत में हर गांव में बलि देने का रिवाज चालू हुआ।

उस समय अपने धर्म को बचाने के लिए हर गांव के बाहर सूअर की बलि दिया जाने लगा।

चुकी मुस्लिम सूअर से नफरत करते हैं,और वे उस जगह नहीं जाते जिस जगह सूअर का अवशेष होता है।

देश के महात्माओं ने जुल्मी अत्याचारों से बचने का रास्ता खोज निकाला।

हर गांव में एक स्थान निश्चित कर ,सूअर की बलि दिया जाता था। जब कभी अत्याचारी गांव में आते थे, उस समय गांव के सभी लोग उस बलि के जगह पर चले जाते थे।

अत्याचारी क्रूर शासकों के डर से घर की बहू और बेटियों को बचाने के लिए विवाह के समय ,गले में सूअर के अवशेष को धारण करने का रिवाज बना दिया गया।

उस समय मुस्लिम शासक और उनके प्रतिनिधि सूअर के अवशेष से दूर भागते थे। इस प्रकार पवित्र मंगलसूत्र का रिवाज शुरू हुआ। निश्चित तौर पर आज मंगलसूत्र को लोग फैशन के जैसा पहनते हैं। परंतु शादी के समय जो वास्तविक मंगलसूत्र होता है उसके अंदर आज भी सूअर के अवशेष रखे जाते हैं।

एक सनातनी विचार करें वह युग कैसा रहा होगा।

हमारे पूर्वजों को इस प्रकार का रिवाज शुरू करना पड़ा इससे उनके दहशत में होने का पता चलता है।

आज कुछ इतिहासकार सब के ऊपर पर्दा डालने की कोशिश करते हैं।

सनातन संस्कृति वाले!  यह वह है जिन्होंने अत्याचार से लड़ा, अत्याचार को सहन किया और उसके बाद भी अपनी संस्कृति को जिंदा रखा। हर सनातनी को अपने धर्म और संस्कृति पर गर्व होना चाहिए। मैं भारत हूं।जुल्मों सितम एवं अतीत का दर्द सुनाता हूं।

5 thoughts on “पूर्वज किसके थे? सनातन भारत का दर्द। Sanatan Bharat ke purvaj

  1. सनातन भारत की दर्द को बेहतर तरीके से दर्शाने के लिए धन्यवाद। ✌️

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