मित्रता के बारे में समझने के लिए यह समझना आवश्यक है , मित्र कौन और मित्र किसका? मित्र के प्रकार अनेक है। जो हमारे लिए भला सोचे, आवश्यकतानुसार उत्तम साथ दें है, उसे मित्र कहेंगे। मित्र के लिए वेद में एक प्रचलित श्लोक हैं।

अपना वास्तविक मित्र!विद्या मित्रं प्रवासेषु। Mitra ki paribhasha.sanatansaty



।।विद्या मित्रं प्रवासेषु भार्या मित्रं गृहेषु च।
रुग्णस्य चौषधं मित्रं धर्मो मित्रं मृतस्य च।।

अर्थात : प्रवास की मित्र विद्या, घर की मित्र पत्नी, मरीजों की मित्र औषधि और मृत्योपरांत मित्र धर्म ही होता है।

वेद दर्शन मित्र के लिए अनेक भाव बताएं हैं।

प्रवास की मित्र
घर का मित्र
मरीज का मित्र
मरने के बाद का मित्र

प्रवास का मित्र कैसे समझें?

प्रवास की मित्र-

ज्ञान को प्रवास का मित्र बताया गया है। प्रवास अर्थात जब व्यक्ति अपने घर से दूर होता है। जहां उसके जानने वाले ना के बराबर होते हैं। जहां उसके शुभचिंतक बहुत ही कम मात्रा में होते हैं। जब व्यक्ति अपने मूल स्थान को छोड़कर किसी अन्य स्थान पर रहने के लिए जाता है ,उसे प्रवास कहा गया है।

जब व्यक्ति अपने मूल स्थान से दूर हो तो निश्चित तौर पर उसे मदद करने वाले कम होते हैं। ऐसी स्थिति में प्रवास में उसके अपने ज्ञान और बुद्धि के सिवा और कोई मित्र नहीं है।

वेद ज्ञान के भी शुद्धता की बात करता है। यदि व्यक्ति का ज्ञान शुद्ध हो तो वह उत्तम गति की ओर लेकर जाता है। यदि ज्ञान दूषित हो तो वह समाज के अंदर भी भटका देता है। व्यक्ति अपने ज्ञान और बुद्धि से पूरी तरह संयमित हो तो, वह बहुत हद तक भटकने से बचा रहता है।

वेद शास्त्र इसीलिए उत्तम ज्ञान ग्रहण करने की बात करता है। एक बच्चे के दूषित माहौल में रहने पर उसका ज्ञान भी दूषित हो जाता है। इसलिए सदैव दूषित माहौल से बचना चाहिए।

स्त्री घर का मित्र कैसे हो सकती है?

घर का मित्र-
घर के मित्र के लिए अपनी पत्नी को कहा गया। वेद दर्शन घर की पत्नी को परम मित्र कहता है। वास्तव में यह सत्य है क्योंकि स्त्री अधिक समय घर में व्यतीत करती है, इसलिए वह घर के संबंध में उत्तम सोच सकती है। पुरुष अनेक प्रकार से अनेक जगह सोचा करते हैं। पुरुष के विचार का क्षेत्र बहुत बड़ा होता है। घर की गृहिणी का विचार विशेषकर परिवार के बीच स्थित होता है।

यह भी सत्य है, पति पत्नी के बीच अहम को लेकर अनेक बार लड़ाईयां भी हो जाता है। कभी-कभी एक दूसरे का आदत भी लड़ाई का कारण होता है। परंतु यहां पर यह सत्य है कि घर के मामले में पत्नी से बड़ा मित्र कोई और नहीं हो नहीं सकता। इसलिए यहां वेद अपने शब्दों में कहता है की घर का मित्र पत्नी है। अर्थात यह निश्चित है कि अपनी स्त्री को घर में सबसे उत्तम मित्र समझना चाहिए।

इस स्वार्थ भरी दुनिया में यदि बात किया जाए तो व्यक्ति अपने घर के सिवा और किसी के बारे में सोचता हीं नहीं। आज स्वार्थ के चक्कर में व्यक्ति समाज को बेचने पर मजबूर हो जाता है। समाज‌‌ के लिए जो व्यक्ति गलत करता है, वह यह नहीं समझता कि उसका घर उसी समाज के अंदर है। समाज का कोई भी कुप्रभाव से घर नहीं बच सकता।

मरीज का मित्र कौन हो सकता है?

मरीज का मित्र-
एक मरीज का जो मित्र होता है वह औषधि है। बहुत बार ऐसा देखने में आया है की एक मरीज अपने स्वभाव के वस! दवा पर कम ध्यान देते हैं और न करने योग्य भोजन पर आकर्षित हो जाते हैं। दोनों ही एक दूसरे के विपरीत हैं। औषध मरीज को ठीक करता है और कु‌पथय भोजन‌ मरीज को और बीमार बनाता है। इसलिए वेद यहां मरीज का मित्र औषध को बताया है।

मरने के बाद का मित्र-

जीवित अवस्था में तो अनेक मित्र, अनेक प्रकार के हैं। परंतु मृत्यु के बाद जो मित्र रहने वाला है वह अपना धर्म है। अपना धर्म का यहां यह अर्थ नहीं है,कि कौन किस जाति धर्म का है। धर्म के ऊपर सनातन सत्य में अनेक लेख मौजूद है।

मां के लिए पुत्र का, पुत्र के लिए पिता का। पत्नी के लिए पति का, पति के लिए पत्नी का। प्रकृति के लिए जीव का‌ धर्म, प्रजा के लिए राजा का धर्म।
कलाकार के लिए कला के प्रति एक निश्चित धर्म होता है। इन धर्म का जाति धर्म विषयक तत्व से कोई लेना-देना नहीं। यह धर्म तो सबका अपना-अपना होता है।

यह धर्म समूह बनकर अपनाया नहीं जा सकता। यह धर्म तो स्थिति, समय एवं काल के अनुसार सबका अपना-अपना है। इस धर्म को किसी दूसरे के आधार पर नहीं तौला जा सकता। वास्तव में संसार में यदि धर्म नुकसान करता है, तो सिर्फ यही धर्म नुकसान करता है।

समाज ! आज जिस धर्म को धर्म मानता है वह धर्म तो पूरे समूह को नुकसान पहुंचाता है। परंतु अपने से अपना धर्म छोड़ने पर स्वयं का नुकसान होता है। अपना धर्म अर्थात उत्तम करने योग्य कर्म। जो व्यक्ति अपने धर्म का पालन नहीं करता, उसका अपना ही धर्म उसे खा जाता है।

व्यक्ति संसार में इस बात को न जानते हुए अपने धर्म को हीं दुश्मन बना लेता है। उसका नतीजा यह होता है की मृत्यु के बाद उसका खास मित्र! धर्म साथ छोड़ देता है।

कहते हैं मृत्यु के बाद कोई कुछ लेकर नहीं जाता। यदि कोई कुछ लेकर जाता है, तो वह उसका अपना नियत-धर्म होता। वह अपने विचारों की पोटली बांधकर साथ लेकर जाता है।

वास्तव में कहें तो मरने के समय देवदूत और यमदूत ,यह दोनों ही व्यक्ति के विचार से प्रकट होते हैं। व्यक्ति स्वयं हीं जानता है , मैंने अनेक पाप किए हैं तो दुनिया की रीत से उसे पता होता है कि उसको लेने के लिए यमदूत आएंगे। उसके पाप और पुण्य का हिसाब कोई दूसरा व्यक्ति नहीं रखता। व्यक्ति अपने पाप और पुण्य का हिसाब स्वयं ही रखता है।

वह स्वयं ही यह निश्चित किए रहता हैं, कि पाप और पुण्य क्या है। वह स्वयं से ही स्वयं को उस स्थान पर रखता है जिस स्थान का वह लायक है।

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