मेहेर बाल विद्या मंदिर(देहरादून का एक स्कूल) के संस्थापक श्री मीणा पंत। मेहेर बाबा आश्रम माजरी माफी देहरादून।मेहेर बाबा की अनन्य भक्तों में से एक यदि इन्हें मैं इन्हें संत कहूं तो आश्चर्य नहीं होगा। इनके पिता श्री शत्रुघ्न घिल्डियाल जो कि मेहेर बाबा के प्रिय भक्तों में से एक रहे। मैं इनके पिता के ऊपर मैं विशेष लेख के जरिए उनके जीवन का विस्तार लिखूंगा।

मीना पंत उम्र लगभग 70 वर्ष । मैंने उनसे उम्र नहीं पूछा। वे अपने बारे में विशेष बताने में संकोच कर रही थीं। उन्होंने पहले हीं कहा मुझे अपना प्रचार नहीं करना है। मैं अनेक समय से उन्हें जानते रहा हूं। जो उन्हें जानते हैं वह समझते हैं कि उनके परिचय की आवश्यकता नहीं है।

मीना पंत मेहेर बाल विद्या मंदिर।Meher bal Vidya Mandir doon school Dehradun



वे मेहेर बाबा के लिए अनंत चर्चा करने को तैयार हैं। उनके द्वारा संचालित मेहर बाल विद्या मंदिर स्कूल के लिए आज भी उनका जीवन पूरी तरह से समर्पित है।

कहते हैं सच्चा भगत कभी भी अपने आप को प्रदर्शित नहीं करता है। मीना पंथ मेहेर बाबा के उन भक्तों में से हैं, जो अपने भक्ति का शोर नहीं करते।



सरल शांत स्वभाव ! यदि वह किसी के समक्ष बैठे तो न बोल कर भी सामने वाला समझ सकता है। मैं उन्हें एक साधु स्वरूप कहता हूं। क्योंकि उनका समाज के प्रति उद्देश्य को समझा जा सकता है।

समाज में कहां जाता है “जिसका किसी से वैर न हो, जो दूसरे किसी के लाभ हानि से मतलब न रखें‌, जो सिर्फ अपने परलोक को सुधारने की दृष्टि से कर्म करता है वह भक्त की श्रेणी में आएगा।”

“कोई एक अपना लाभ और हानि छोड़कर अपने सामने वाले के फायदे के लिए काम करता है। जो अपना नुकसान करके भी दूसरे का भला कर देता है।

जिसने अपने जीवन में क्या पाया और क्या खोया इसका कभी आकलन भी नहीं किया।

जो किसी के कीमती से कीमती वस्तु की ओर ध्यान नहीं देता वह साधु पुरुष के समान है। उसे साधु हीं कहा जा सकता है।”

“कोई एक व्यक्ति है जो अपने तथा अपनों की चिंता छोड़ कर समस्त दुनिया का चिंतन करता है। जिसने अपना जीवन लोक कल्याण एवं समाज कल्याण में समर्पित कर दिया हो। जिसका विचार अपने लिए जरूरत तथा सुख सुविधाओं की वस्तुओं से शून्य हो गया हो।

जिसने अपने जिंदगी को करीब से पढा़ और इस नाशवान वस्तुओं को महत्व न दिया।

ऐसे विचार और दृष्टि वाले कर्ता सदैव ही संत समझे जाते हैं।”

श्री मीना पंत जी के द्वारा स्थापित मेहेर बाल विद्या मंदिर जिसे वह आज भीं एक तरीके से संचालित कर रही हैं। यह स्कूल समाज के अंदर अविश्वसनीय योगदान दे रहा है। स्कूल अनेक है परंतु स्कूल के सिद्धांत को समझना होगा।

मेहेर बाल विद्या मंदिर एक भक्त और स्वामी के विचारों से निकला हुआ भविष्य के लिए उत्तम फल है।

स्कूल रूपी उस फल का आज भी समाज के अंदर स्वाद चखा जा रहा है।

भारतवर्ष के अंदर अध्यात्म शब्द किसी से छुपा हुआ नहीं है। प्राचीन शिक्षण व्यवस्था में गुरुकुल हुआ करते थे। गिने चुने आज भी गुरुकुल मिल जाया करेंगे। गुरुकुल का अपना प्रभाव था।

आज एक बच्चे के लिए भटकने का स्थान बहुत है।

जिस प्रकार क्लास चल रहे बच्चों के सामने कोई एक मदारी आ पहुंचे तो मानो क्लासरूम का मोह भंग हो जाता है।

आज के दिन में अधिकांश मां बाप का शिकायत होता है कि बच्चे का पढ़ने में मन नहीं लगता। बच्चे का मन कैसे लगे, पुराने जमाने में बच्चों के सामने मदारी आया करते थे और वे अपने खेल का छाप बच्चों के ऊपर अनेक दिनों तक छोड़ जाया करते थे।

अभी वास्तव में बच्चे के अंदर इतने मदारी घूम रहे हैं कि कौन सा मदारी किधर लेकर जाएगा यह कहना मुश्किल है।

गुरुकुल व्यवस्था में बच्चे को शिक्षण के समय सिर्फ शिक्षा से संबंधित वस्तुओं से संयोग कराया जाता था। परंतु आज बच्चे को समय से पहले वैसे वस्तु का संयोग हो जाता है जो आज उसके लिए हानिकारक है।

मेहेर बाल विद्या मंदिर दिखने में सभी साधारण स्कूल जैसा लगता है।

परंतु इस स्कूल के अंदर भारतीय संस्कृति का छाप! अध्यात्म मिलता‌ है।

मैंने इस चीज को करीब से अनुभव किया है। मां बाप बच्चे का भला तो चाहते हैं, साथ में अपना एक रुतबा भी चाहते हैं। चुकी यह स्कूल गैर सरकारी होने के बाद भी सरकारी है। स्कूल के बारे में आप चाहे तो विशेष सर्च करके देख सकते हैं।

यह स्कूल यदि शुरू से व्यापार की दृष्टि से चलाया गया होता तो शायद यह शहर में एक अलग ही महत्व रखता।

यह स्कूल वास्तव में समाज कल्याण तथा सेवा की दृष्टि से चलाया जाता है। मैंने अनुभव किया है इसी कारण से बड़े लोगों के बच्चे इस स्कूल में नहीं पढ़ते।

आज व्यापारिक दृष्टि से चलाए जाने वाला स्कूल डोनेशन के नाम पर तरह-तरह के फीस लिया करते हैं।

वे बच्चे को उत्तम शिक्षा दें अथवा न दे अच्छा नाम देते हैं। यदि वास्तविक दृष्टि से देखा जाए तो बच्चे के एजुकेशन से नाम का क्या रिश्ता।

एक उत्तम शिक्षण संस्थान का कार्य एक मानव जीव को योग्य कुशल आदमी बनाना।

उस बच्चे को कुशल व्यापारी न बनाना ,नहीं तो वह बच्चा एक दिन अपने व्यापार के पलड़े पड़ मां बाप को भी तौल देगा। समाज के अंदर कामयाबी वही तक अच्छा है की एक इंसान दूसरे को इंसान समझें।

वह स्वयं ही कामयाब होकर अपने आप को न भूल जाए, वह अपनें तथा अपनों को भूल जाए वैसा कामयाबी किसी काम का नहीं।

ऐसा कामयाबी अधोगति की ओर लेकर जाता है।

श्री मीणा पंत जी अपने बारे में तो विशेष कुछ नहीं कहतीं ,एक घटना उन्होंने बताया। जब वहां ससुराल में बहुत परेशान थी और उन्हें कोई रास्ता न सूझा तो उन्होंने मेहेर बाबा को एक पत्र लिखा। मेहेर बाबा का इनकें परिवार से विशेष लगाव था। वह पत्र कोई लंबा-चौड़ा नहीं था बहुत ही सरल और कम शब्दों में था।

उस पत्र का उत्तर मेहेर बाबा की तरफ से आया। मेहर बाबा अखंड मौन व्रत में थे।

उनके इशारे को समझ कर उनके भक्त! दूसरे भक्तों में शब्द को प्रकट कर दिया करते थे। माताजी के पास उनका पत्र आया, बाबा जी ने लिखवा भेजा

“तेरा विश्वास बहुत उत्तम है। मेरे ऊपर तेरा श्रद्धा अपार है। तुम तनिक भी चिंता न करो ,तेरे जीवन की हर परेशानी का समाधान हो जाएगा।”

श्री मीणा पंत जी का बाबा जी से बहुत लगाव है। आज भी इस बात को अनेक प्रकार से कहती हैं , उन्होंने बाबाजी के उस पत्र को खो दिया।

वें कहतीं आज भी बाबा जी द्वारा प्रेषित शब्द मेरे कानों में गूंजते हैं।

मेहेर बाल विद्या मंदिर की स्थापना के लिए वे कहतीं हैं ” एक बार मैंने अपने पिता से स्कूल खोलने की बात कही। पिताजी ने मेरे बातों को मजाक समझा। और बोले कि यदि मजाक है तो ठीक है। स्कूल खोलकर बंद कर देना है तो खोलने का कोई मतलब नहीं है,और यदि वाकई बाबाजी के नाम से तुम स्कूल चलाना चाहती हो तो मैं तुम्हारे साथ हूं।”

माता जी कहती हैं बाबा जी की आशीर्वाद और पिता के सहयोग से मैंने श्री मेहेर बाल विद्या मंदिर की स्थापना की।

महज एक कमरा से इस स्कूल का शुरुआत हुआ। बाबाजी का विश्वास मेरे साथ था। पिताजी ने एक बार कहा , जिस दिन 35 बच्चे हो जाएंगे उसी दिन मैं तुझे बड़ा स्कूल बना कर दूंगा।

बाबा जी का आशीर्वाद स्कूल में 35 बच्चे भी हो गए। मैंने पिता से कहा अब आपका आशीर्वाद चाहिए। मेरे पिता ने फिर उस समय अभी जो वर्तमान स्कूल है, वह जमीन स्कूल के लिए दे दिया।

उसके बाद से नित निरंतर स्कूल धीरे-धीरे बढ़ते रहा है। आज स्कूल में ढाई सौ से ज्यादा बच्चे शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं।

श्री मीणा पंत जी अपने स्वभाव के अनुरूप स्कूल के शिक्षकों से आग्रह किया करती हैं। वे स्कूल के विषय में कहतीं हैं, स्कूल में सबसे खास है स्कूल के सभीं शिक्षक मेरे अनुरूप है और अच्छे हैं। सभीं शिक्षक एवं शिक्षिका उत्तम विचार तथा अध्यात्म की दृष्टि रखते हैं।

वे कहतीं हैं, स्कूल में बच्चे को बहुत ही ज्यादा दबाव देकर नहीं उसे खुश करके पढ़ाया जाता है।

स्कूल में नई शिक्षण पद्धति के साथ अध्यात्म के शब्द भी दिए जाते हैं।

श्री मीना पंत जी का समाज के प्रति योगदान महत्वपूर्ण एवं सराहनीय है।

यह एक सेवा संस्थान है, और यहां के विशेष माननीय लोगों को इस संस्थान के ऊपर विशेष ध्यान होना चाहिए। मैं अपने शब्दों के जरिए यहां के श्रेष्ठ महानुभावों से आग्रह करता हूं कि इस सेवा संस्थान का विशेष ख्याल करें।

यह संस्थान शुरू होने के साथ से लेकर आज तक निरंतर अपना सेवाएं देता रहा है।

मेहेर बाबा का नाम अपने आप में महत्वपूर्ण है। इस स्कूल का योगदान समाज में नजरअंदाज योग्य नहीं है।

श्री मीणा पंत जी ने अपने स्वभाव से इस स्कूल को व्यापार की दृष्टि से कभी नहीं देखा। आज भी यह स्कूल के रूप में उत्तम सेवाएं दे रहा हैं। इन्होंने इस सेवा संस्थान के लिए कभी भी किसी प्रकार समाज में शोर नहीं किया। कहा जाता है ,बच्चे भगवान के स्वरुप होते हैं। बच्चे के ऊपर सब की दृष्टि होनी चाहिए।

आज यदि समाज में कोई वास्तविक सेवा संस्थान है तो उसके ऊपर सब का विशेष ध्यान होना चाहिए।

हम आशा करते हैं कि यह शिक्षण संस्थान अपने अविश्वसनीय सामाजिक योगदान के साथ नित्य निरंतर आगे बढ़ता रहेगा।

मेहेर बाल विद्या मंदिर अपने आप में एक खास शिक्षण संस्थान है। यहां का शिक्षण पद्धति सनातन मूल्यों पर आधारित एवं महत्वपूर्ण है।

श्री मीणा पंत जी! अपने बारे में लिखने से मना करती हैं फिर भी मैंने कुछ शब्द लिखे हैं। मैं आगे कोशिश करूंगा ,उनके जीवन के ऊपर एक विशेष लेख लिख सकूं।

सिद्ध मेहेर बाबा को विशेष नमन एवं उनके भक्तों को हार्दिक शुभकामना!

5 thoughts on “मीना पंत मेहेर बाल विद्या मंदिर।Meher bal Vidya Mandir doon school

  1. मीना पंत जी महान है, उन्हें मिलकर उनके चरण छूने की इच्छा हो रही है।

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    1. कर्म और विचार उत्तम हो तो वह व्यक्ति को महान बनाता है। भविष्य हर एक इच्छा को करीब से देखता है…….

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  2. Glad to know about Meher Baba School in Doon. I am a Baba lover since 1958 when I had his first Darshan – I was 5 and had carried marbles to play with him. He made 4 of us friends sit on sofa with him played and blessed us. We had those marbles for long. I visited Pune for Darshan with mother every year till he took Samadhi. Nostalgic memories now.

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