अतुल्य भारत में तीर्थ का अपना एक स्थान है। लगभग भारत के हर जिले में एक महत्वपूर्ण तीर्थ मिल जाएगा। सभीं तीर्थ अपने आप में खास है और अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।श्री राम वनवास यात्रा मार्ग तीर्थ स्थान। Shri Ram ke 14 varsh.

भगवान 14 वर्ष में देश के किंन-किंन भागों में गए वह स्थान कौन से हैं और उस स्थान का महत्व क्या है इस लेख में व्याख्या करने की कोशिश करेंगे।

व्याख्या का कोई सीमा नहीं होता, सभीं अपने -अपने तरीके से व्याख्या करते हैं।
भगवान राम कौन थे?

भारत में यदि श्रीराम के महत्व की बात करें तो भगवान राम के बिना भारत का कल्पना भी नहीं हो सकता।

श्री राम वनवास यात्रा मार्ग तीर्थ स्थान। Shri Ram ke 14 varsh.

पुरुषोत्तम श्री रामचंद्र अपने आप में अतुलनीय चरित्र के एक प्रकार से संस्थापक रहे। श्री रामचरितमानस अपने आप में एक चरित्र विशेष ग्रंथ है। रामायण अर्थात श्रीराम के रहने का उत्तम स्थान। श्री रामायण भारत के हर भाषा में उपलब्ध है। सब में प्रमुख संस्कृत भाषा में उपलब्ध श्री बाल्मीकि रामायण माना जाता है।

रामचंद्र जी ! सनातन हृदय वाले के अंदर क्या महत्व रखते हैं ,यह बात समस्त सनातनी समझता है।

जैसा कि सबको पता है, श्री राजा दशरथ के चार पुत्र! जब राजा बड़े पुत्र को राजगद्दी देने की बात करते हैं, तो राजा की तीन रानी में से एक रानी अपने पुत्र को राजा बनाना चाहती है। अपने पुत्र को राजा बनाने के लिए और पुत्र की भलाई के लिए राजा के बड़े पुत्र श्री राम को बनवास देने की बात करती है।

श्री रामचंद्र अपने पिता की बात नहीं सुनते? तथा पिता के वचन हेतु वन में जाने को तैयार होते हैं।


राजा अपने वचन में बंधे हुए थे वे श्री राम को रोक नहीं पाए, भगवान राम अपनी पत्नी श्री सीता जी और भाई लक्ष्मण के साथ 14 वर्ष के लिए वन में प्रस्थान करते हैं।

श्री रामचंद्र की त्याग की महिमा अपार है। वे अपने पिता की भावनाओं को समझते हैं।

एक राजापुत्र तथा राज्य के युवराज होने के बाद भी वे सहर्ष वन में रहना स्वीकार करते हैं।

भगवान श्री राम 14 वर्ष के वनवास में जिस रास्ते से गुजरें और जहां – जहां उन्होंने विश्राम किया वह सभीं सनातन धर्म में आज महातीर्थ है। वह सभीं जगह भारतवासी के लिए पूजनीय हैं।

१- सर्वप्रथम तमसा नदी के तट पर विश्राम!

तमसा नदी प्राचीन काल में एक प्रसिद्ध नदी रहा । यह तमसा नदी जिला अयोध्या भारत में मौजूद है। कथाओं में आता है, यह तमसा नदी वहीं जगह है, जहां श्री दशरथ जी के हाथ से पित्र भक्त श्रवण कुमार की मृत्यु हुई थी। बताते हैं यहां से कुछ ही दूरी पर वह स्थान है। तमसा की भूमि अपने आप में एक महत्वपूर्ण तीर्थ है। जिसे वर्तमान सरकार एक रूप देने की कोशिश में लगी है।

२-श्रृंगवेरपुर
भगवान श्रीराम ने यहां पर दूसरे दिन विश्राम किया था। श्रृंगवेरपुर संगम प्रयागराज से लगभग 20 किलोमीटर दूरी पर स्थित है। आदि काल में श्रृंगवेरपुर के राजा गुह्यराज श्री निषादराज का राज्य था। भगवान श्री राम यहीं से अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ केवट का सहारा लेकर ,श्री गंगा जी को पार किए थे। यहीं पर श्री सीता जी ने माता गंगा जी का पूजन किया था।

३- चित्रकूट धाम
धाम भारत के उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश से जुड़ा हुआ है। चित्रकूट अपने आप में एक महा धाम हैं। यहां पर श्री तुलसीदास जी के निवास करने का भी प्रमाण मिलता है। श्री राम चरित्र मानस का बहुत भाग यहां पर लिखा गया। यहां देश-विदेश के श्रद्धालु इस पवित्र धाम के दर्शन के लिए आते हैं। यहीं पर भरत जी श्री राम जी से मिलने के लिए पहुंचे थे।


यहां प्रमुख स्थान में-


श्री कामदगिरि पर्वत।
कहते हैं श्री कामदगिरि जी एक उपस्थित देव हैं। कामदगिरि के परिक्रमा का एक अपना हीं महत्व है। श्रद्धा और आस्था रखने वाले इस स्थान को सिद्ध मानते हैं। कहा जाता है कि श्री कामदगिरि का परिक्रमा करने पर हर प्रकार का मनोरथ पूर्ण होता है। कामदगिरि में प्राचीन इतिहास की झलक आज भी देखने को मिलेगा।

श्री जानकी कुंड
जानकी कुंड मंदाकिनी जी के तट पर स्थित है, कहते हैं श्री सीता जी इसी कुंड में स्नान किया करते थी।

स्फटिक शिला
स्फटिक शिला जो आज भी प्राचीन स्तंभ बनकर मंदाकिनी जी के किनार पर स्थित है। हर साल लाखों की संख्या में भक्तगण आकर आज भी सीता जी के पैरों के निशान का दर्शन करते हैं। रामायण में कथा है इसी स्थान पर जयंत कौवे का रूप धारण कर सीता जी के पैर में चोंच मारा था। उस समय सीता जी इसी स्फटिक शीला पर विराजमान थी।

जब यह बात श्री राम जी को पता चला तो उन्होंने एक सरकंडे को तीर बनाकर उस कौंवे पर छोड़ा। जयंत रूपी काक पूरे ब्रह्मांड में घूमता रहा। सभीं शक्तियों से उसने अपने को बचाने के लिए प्रार्थना की। किसी ने उस कौंवे की पुकार नहीं सुनी। अंततः वह कौवा भगवान के पास आकर क्षमा याचना करता है।कृपालु श्री राम जी उस जयंत का एक आंख लेकर उसे जीवन दान देते हैं।

गुप्त गोदावरी
गुप्त गोदावरी चित्रकूट से लगभग 18 किलोमीटर दूर गुफा में स्थित है। गुफा के अंदर एक तालाब है जिसे गुप्त गोदावरी कहा जाता है। गुफा से निरंतर एक धारा बहती हैं जो तिर्थ नगर में पवित्र माना जाता है।

श्री हनुमान धारा
हनुमान धारा मंदाकिनी तट से आसानी से देखा जा सकता है। श्री हनुमान जी की विशाल मूर्ति है। मूर्ति के ठीक सामने एक झरना निरंतर बहता है। उस पहाड़ी के ऊपर गांव है और खेती भी होता है। इस पहाड़ी पर चढ़ने के बाद महाधाम श्री चित्रकूट का सुंदर दर्शन किया जा सकता है।

भरतकूप
भरतकूप के लिए प्रचलित है कि श्री भरत जी जब राम जी से मिलने आए थे, तो वे वहीं बनवास में श्री राम का राज्याभिषेक के लिए सभीं नदियों का जल एकत्र कर साथ लेकर आए थे। वह जल श्री अत्रि मुनि के परामर्श से भरत जी ने एक कूप में रख दिया। वही कूप आज भरतकूप के नाम से प्रसिद्ध है। यहीं से भरत जी राम जी की आदेश से उनका चरण पादुका लेकर वापस अयोध्या चले गए। अयोध्या जी पहुंचकर उन्होंने उस पादुका के सहारे 14 वर्ष तक अयोध्या की गद्दी संभाली।

श्री राम वनवास यात्रा मार्ग तीर्थ स्थान। Shri Ram ke 14 varsh.


यह स्थान बहुत ही मनोरम और महत्वपूर्ण है।
यहां से पास में ही अत्रि मुनि का आश्रम पड़ता है।

४- अत्रि मुनि का आश्रम
पवित्र पावन मंदाकिनी गंगा के किनारे पर एक मनोरम स्थान। ऋषि श्री अत्री जी की पत्नी अनुसूया जी के तपोबल से यह गंगा जी प्रकट हुई । अनसूया आश्रम! आज भी यदि भारत में कहीं प्राचीन दृश्य झलकता है तो वह यह आश्रम है। इसी आश्रम के पास भारत के महान संतों में एक श्री अड़गड़ानंद जी महाराज का आश्रम है। साल के हर समय भक्तों का यहां तांता लगा रहता है। यहां मंदाकिनी दर्पण की भांति बहा करती है। नदी के तट पर मछलियों का झुंड दर्शन को आए भक्तों का स्वागत करती हैं। यहां पर मछली को पकड़ना अवैध है। यह मछली भी डरा नहीं करतीं, आप करीब जाओ, तो आपको ऐसा लगेगा जैसे मानो वह सब आपका इंतजार कर रही हो।

५-दंडकारण्य
दंडकारण्य में कभी दंडक नाम का राक्षस का राज हुआ करता था। इसीलिए इस स्थान का नाम दंडकारण्य पड़ा। दंडकारण्य बहुत ही विशाल और घना वन प्रदेश हैं। इसका विस्तार विंध्याचल पर्वत से लेकर गोदावरी के तट तक फैला हुआ है। दंडकारण्य इतने दूर तक है कि इसका सीमा भारत के छत्तीसगढ़, ओडिशा और तेलंगाना प्रदेश का हिस्सा मिलता है। राम जी के वनवास के समय दंडकारण्य में राक्षसों का आतंक था। श्री राम जी ने उस समय दंडकारण्य को राक्षसों से मुक्त कर दिया।

६-अमरकंटक
यह भारत के महातिर्थ में से एक हैं। यह स्थान अपने आप में इतना महत्वपूर्ण है कि भारत की महानदी में शामिल श्री नर्मदा जी, सोन नदी और जोहिला नदी का यह उद्गम स्थान है। भारत के मध्य प्रदेश में स्थित यह विद्यांचल और सतपुड़ा की पहाड़ियों को मेल करता है। अमरकंटक में अनेक विशाल मंदिर विद्यमान हैं, जिसके दर्शन के लिए भक्त निरंतर जाया करते हैं। यहां मंदिरों में प्रमुख-श्री नर्मदा जी का मंदिर, श्री शिव मंदिर, सूर्य नारायण मंदिर, श्री दुर्गा मंदिर, श्री सिद्धेश्वर महादेव मंदिर, श्री राधा कृष्ण मंदिर तथा इनके अलावा भी अनेक मंदिर मौजूद है। यहां भक्तों के लिए अनेक मनोरम स्थान हैं उनमें विशेष- धूनी पानी, दूध धारा, सोनमुड़ा, श्री मां की बगिया, कपिलधारा, श्री कबीर चबूतरा, श्री सर्वोदय जैन मंदिर तथा इनके साथ अनेक महत्वपूर्ण स्थान है।

७-श्री अगस्त मुनि के आश्रम
नासिक में स्थित श्री अगस्त्य मुनि के आश्रम जहां भगवान ने कुछ समय बिताएं, यहां से कुछ दूरी पर पंचवटी में भगवान अनेक समय बनवास का व्यतीत किए। यही पंचवटी में सूर्पनखा की नाक कटी थी। इसी स्थान पर राम जी के साथ खर और दूषण का भीषण युद्ध हुआ था। श्री सीता जी का हरण भी इसी पंचवटी से हुआ था।


८-माता शबरी का आश्रम
यह आश्रम भारत के छत्तीसगढ़ प्रदेश में स्थित है। माता शबरी ईश्वर भक्तों में शिरोमणि कहलाती है। माता शबरी की भक्ति का तुलना किसी से नहीं हो सकता। स्वयं भगवान ने माता शबरी के जूठे बेर खाकर यह सिद्ध किया की वह भगवान के अनन्य भक्त थीं। प्राचीन काल में यह क्षेत्र भी दंडकारण्य से ही जुड़ा हुआ था। यह स्थान भारत में महत्वपूर्ण स्थान में से एक है।

९-ऋष्यमुक पर्वत
ऋषि मुख पर्वत जहां श्री मतंग ऋषि का आश्रम था। यहां पर सुग्रीव बाली के डर से अपने मंत्रियों के साथ रहते थे। बाली इस पर्वत पर मतंग ऋषि के श्राप के कारण नहीं आता था। यह पर्वत श्री रामचंद्र जी और भाई लक्ष्मण जी का कुछ समय के लिए निवास स्थान रहा।

१०- रामेश्वरम
रामेश्वरम भारत के चार धाम में से एक महा पवित्र तीर्थ धाम है। श्री रामचंद्र जी समुंद्र पार करने के समय यहां पर भगवान भोलेनाथ का भक्ति किए थे। श्री रामचंद्र जी अपने हाथों से एक शिवलिंग का निर्माण किए। वह शिवलिंग आज द्वादश शिवलिंग में से एक माना जाता है। यह स्थान हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण केंद्र बिंदु है। रामेश्वरम जहां श्री रामचंद्र जी के द्वारा स्थापित भगवान शिव का मंदिर है।

१२ धनुषकोडी
यह वह स्थान है जो भारत और श्रीलंका के मध्य स्थित है। कहा जाता है यह वही आस्थान हैं जहां पर भगवान रामचंद्र जी अपने वानर सेना के साथ समुंद्र पर सेतु का निर्माण किए थे । यह रामेश्वरम के बाद समुंदर के बीच स्थित एक पवित्र स्थान हैं। यहां राम जी के अनेक मंदिर हैं और श्रद्धालु भक्तजन दर्शन के लिए बराबर आया करते हैं। यहीं से लंका तक प्राचीन सेतु का अवशेष मिलता है। यह से सेतु निर्माण के पश्चात श्री लंका में प्रवेश और रावण के साथ महायुद्ध।

रावण से महा युद्ध के पश्चात भगवान राम श्री सीता जी और भाई लक्ष्मण को लेकर वापस अयोध्या लौट आते हैं।
श्री राम भगवान कैसे हुए?

राम अपने आप में कितने महत्वपूर्ण हैं भारत में यह सब जानते हैं। राम के लिए राम का नाम ही काफी है।

श्री राम वनवास यात्रा मार्ग तीर्थ स्थान। Shri Ram ke 14 varsh.

कहा जाता है राम अपने जन्म से पहले भी थे और दुनिया से जाने के बाद भी राम सदैव उपस्थित हैं। राम का शरीर जन्मा हुआ था परंतु राम वास्तव में अजन्मा रहे।

भारत में राम की महिमा अपार है, व्यक्ति जीने के लिए राम राम करता है। और व्यक्ति जब मर जाता है तो भी राम-राम करके अंतिम संस्कार किया जाता है।

कहा जाता है राम नाम अपने आप में पवित्र नाम है और व्यक्ति किसी भी स्थिति में राम नाम का उच्चारण करता है तो वह स्वयं पवित्र हो जाता है।

राम की महिमा अपार है ,वे जहां पर गए वह तीर्थ की महिमा भी अपार हो गई। सनातन धर्म के अनुयाई विश्व के कोने-कोने से आकर राम जी के पावन तीर्थ का दर्शन कर अपना कल्याण करते हैं। श्री राम का नाम जहां जुड़ जाता है वह नाम तथा स्थान भी पवित्र हो जाता है।

भगवान श्री राम जिसको छोड़ देंगे उसका क्या होगा?

श्री रामायण में एक कथा प्रचलित है।
“जब सेतू बंध का कार्य चल रहा था उस समय सभीं वानर सेना पत्थरों पर राम नाम लिखकर समुंद्र में डाला करते जा रहे थे। सभीं पत्थर समुंद्र पर तैरने लगे, इस प्रकार सेतु का निर्माण में कार्य चल रहा था। उसी समय राम जी को एक खेल सुझा! उन्होंने एक पत्थर उठाया और समुंदर में डाल दिया और आश्चर्य वह पत्थर डूब गया।

उन्होंने हनुमान जी से कहा ‘हनुमान! देखो यहां सभीं बंदर मित्र हमसे भी शक्तिमान है। यह जो भी पत्थर डाल रहे हैं सब तैर रहा है। मैंने भी एक पत्थर डाला परंतु वह डूब गया। मेरे हाथों से कहीं ज्यादा प्रभाव इन बंदर के हाथों में है।’

हनुमान जी सुनकर हंसने लगे और बोले ‘प्रभु! इन तैरते हुए पत्थरों को देखिए, इन्हें आपके नाम का सहारा मिला हुआ है। आपके नाम का प्रभाव है कि यह सभीं पत्थर तैर रहे हैं। आपने जिस पत्थर को फेंक दिया हो। अर्थात जिसको आपने छोड़ दिया उसके डूबने के सिवाय और कोई रास्ता नहीं है। जिसे आप छोड़ देंगे उसका डूबना तो निश्चित है न!’

वास्तव में कहा जाता है राम से कहीं बड़ा उस राम का नाम है। जिसके नाम से सभीं को गति मिलता है। राम नाम की शक्ति जो राम नाम के पीछे हैं वहीं विशेष समझता है।

राम का जीवन हीं अपने आप में बहुत बड़ा संदेश है।

श्री राम वनवास यात्रा मार्ग तीर्थ स्थान। Shri Ram ke 14 varsh.

उस राम ने कभी नहीं कहा कि मेरा जाप करो। वह राम तो राजा भी नहीं बनना चाहता था। उस राम को तो राजा भरत ने राजा बनाया। वे राम समस्त जगत के प्यारे रहे, उन्होंने अपने चरित्र से समाज को वह दिया जिसके वजह से श्री राम आज स्वेक्षा से माने जाने वाले भगवान है।

श्री राम महान है, श्री राम का वनवास यात्रा महान है। श्री राम जिस जगह पर एक क्षण भी बिताए वह समस्त भूमि महान है। वह सभीं स्थान सदैव अपने आप में तिर्थ है और पवित्र है।

2 thoughts on “श्री राम वनवास यात्रा मार्ग तीर्थ स्थान। Shri Ram ke 14 varsh.

  1. आपकी श्री रामचन्द्रजी के प्रति जो आस्था है उसको नमन है.. 14 varsh की यात्रा का जो वर्णन दिया उसे पढ़कर मेरी आंखें भर आई🙂

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