परब्रह्म परमेश्वर का चिंतन करने से पहले ब्रह्म शब्द के ऊपर विचार करें।
वेद साहित्य का मूल भाषा संस्कृत है।

शब्द के ऊपर विचार करने से पहले भाषा विषयक भ्रांतियों को दूर करना आवश्यक है। प्राचीन सनातन साहित्य सभीं लगभग संस्कृत भाषा में है। वैदिक काल में संस्कृत भाषा यहां का मुख्य भाषा रहा है।

उस समय हर प्रकार के वार्तालाप संस्कृत भाषा में किए जाते थे।

सभीं ग्रंथ पुराण मूल रूप से संस्कृत में है।

संस्कृत साहित्य को जनमानस के जरूरत अनुसार वर्तमान में अनेक भाषाओं में व्याख्या किया गया है और किया जाता है।

संस्कृत भाषा निश्चित तौर पर हमारे पूर्वजों की भाषा रहा है। संस्कृत हमारे देश का मूल भाषा रहा है। किसी के कहने से और नहीं कहने से सनातन भाषा संस्कृत का महत्व कम नहीं हो जाता। वैदिक शब्दों को जनमानस में फैलाने के लिए संस्कृत भाषा मूल है।

आज एक आश्चर्य है की सिर्फ मंत्र को रटने का फार्मूला बताया जाता है।

ब्रह्मजिज्ञासा। परब्रह्म ईश्वर का चिंतन। Brahmajigyasu. Paarbrahm Chintan.

वास्तव में मंत्र समझ कर उसमें डूब जाना है। संस्कृत के लिखे हुए शब्दों को सिर्फ याद करने से नहीं होगा उसके भाव को समझना होगा।

मैंने अधिकतर देखा है , सर्वप्रथम जो बहस होता है उसमें भाषा को लेकर होता है।

जो संस्कृत को शुद्ध रूप से प्रकट नहीं कर सकता। उसे शुद्ध रूप से प्रकट करने के लिए मजबूर किया जाता है,और जो व्यक्ति अपने शब्दों को शुद्ध रूप से प्रकट नहीं कर पाता उसे अज्ञानी और मूर्ख की श्रेणी में डाल दिया जाता है।

अमेरिका में रहने वाले अनपढ़ व्यक्ति को क्या कहेंगे?

जबकि वास्तव में ऐसा होता नहीं है। अमेरिका में रहने वाला अनपढ़ कोई भी व्यक्ति यहां फर्राटेदार अंग्रेजी बोल सकता है। वैसे अनपढ़ भाषा को जानने वाले व्यक्ति को क्या कहेंगे। यहां जो व्यक्ति अंग्रेजी जानता है वह अपने आप को समाज का बहुत ही योग्य व्यक्ति महसूस करता है। यहां जो अंग्रेजी जानते हैं वे दूसरे भाषा के लोगों को अनपढ़ समझते हैं।

शुद्ध ज्ञान किस भाषा में होता है?

जबकि विचार चिंतन करें तो ज्ञान का भाषा से कोई लेना-देना नहीं है। यहां पर एक बात और कहा जाएगा ज्ञान का जाति ,धर्म ,पंथ ,संप्रदाय से भी कोई लेना देना नहीं है।

ज्ञान किसको किसको हो सकता है?

ज्ञान एक गूंगे को भी हो सकता है। ज्ञान एक बहरे को भी हो सकता है। ज्ञान एक अंधे को भी हो सकता है। ज्ञान एक वन में रहने वाले वनमानुष को भी हो सकता है।

दुनिया में जाति और धर्म किसने बनाया?

यदि ऐसा नहीं होता तो ज्ञान सिर्फ एक ही जाति और धर्म तक सीमित हो जाता। वास्तव में जाति धर्म वर्ण और संप्रदाय यह सभीं समाज के एक समूह द्वारा निर्मित है। जन्म से कोई विशेष जाति अथवा धर्म समूह का नहीं होता। यदि जन्म से हीं जाति धर्म मिल जाता तो आज संसार में इतने धर्म समूह वर्ण और संप्रदाय नहीं होते।

मंत्र के अशुद्ध उच्चारण से क्या हो सकता है?

रामायण किस भाषा में है। रामायण का श्लोक कोई शुद्ध कहे अथवा अशुद्ध कहे। उस श्लोक के जरिए कहा जाने वाला ज्ञान वह समझ पाता है कि नहीं, यह महत्त्व रखता है। श्लोक के पीछे दिए गए निर्देश को उसे पूरी तरह से स्वीकार है कि नहीं है, यह सबसे बड़ा महत्वपूर्ण बात है।

क्या अशुद्ध मंत्र उच्चारण से दोष लगता है?

मंत्र के अशुद्ध उच्चारण पर यहां किसी को कुछ शंका का हो सकता है। मैं यहां एक बात स्पष्ट कहना चाहूंगा अशुद्ध मंत्र उच्चारण का दोष उसे ही लगता है जो मंत्र की सिद्धि करता है।

कोई व्यक्ति संकल्पित कोई अनुष्ठान करता है और उसमें मंत्रों का अशुद्ध उच्चारण होता है , ऐसी स्थिति में उसे दोष लग सकता है।

जिससे कोई सिद्धि न करनी हो, उसे किसी प्रकार भी मंत्रों के अशुद्ध उच्चारण का दोष नहीं लगता।

आप सोचेंगे ब्रह्म का चिंतन में मैं भाषा और सिद्धि पर बात कर रहा हूं। यहां विचारनिय है बात है, संपूर्ण सनातन साहित्य संस्कृत में है ,और सभीं श्लोक पूर्ण रूप से मंत्र है।

ब्रह्मजिज्ञासा। परब्रह्म ईश्वर का चिंतन। Brahmajigyasu. Paarbrahm Chintan.

हिंदू धर्म में वास्तविक मंत्र क्या है?

वेद-पुराण, ग्रंथ महा-ग्रंथ, उपनिषद एवं संसार में प्रचलित ग्रंथ रामायण-महाभारत इन सभीं के सभीं श्लोक-श्रुति‌ अपने आप में एक मंत्र है।

हिंदू संस्कृति का सबसे बड़ा विरासत।

यह सनातन साहित्य इस संस्कृति में भारत की अपनी विरासत है। हिंदू धर्म को अथवा सनातन धर्म को भ्रम का धर्म कह कर प्रचारित किया जाता है। यह निश्चित रूप से तथ्यहीन और अनर्गल बात है। यहां जिस मंत्र का बात हो रहा है वह मंत्र साधारण नहीं है।

सभीं मंत्र हमारे अपने पूर्वजों द्वारा खोज किए गए एवं अनेक प्रकार के अनुसंधान करने के उपरांत निकला हुआ फल है।

दूसरे देश तथा वहां के व्यक्तियों ने वहां की संस्कृति के अनुसार दूसरे देशों पर कब्जा करने की सोची। किसी भी प्रकार जीव को तकलीफ देकर उनके ऊपर शासन करने की सोचीं।
सनातन पूर्वजों ने हमारे लिए क्या किया?

पूर्वजों ने ब्रह्म का चिंतन किया, आत्म चिंतन किया।

उस परमेश्वर की खोज के लिए नाना प्रकार के यत्न किए। ईश्वर को पाने के लिए दिन और रात को एक कर दिया। उसके उपरांत जो ईश्वर से प्राप्त हुआ उसको अपने आने वाले वंश के लिए समाज में प्रस्तुत कर दिया।

वेदांत दर्शन में पहला ही पद है।
अथातो ब्रह्मजिज्ञासा।१/१/१
अर्थात अब यहां से ब्रह्म का जिज्ञासा का आरंभ करें।

चिंतन तो सभीं करते हैं परंतु किस विषय पर चिंतन करते हैं यह महत्वपूर्ण बात है।

मानव सबसे ज्यादा किस विषय पर चिंतन करता है?

पूरी दुनिया का मुख्य चिंता रोटी कपड़ा और मकान पर होता है। जिसके पास रोटी कपड़ा और मकान सोचने का विषय नहीं है वे अधिकतर मनोरंजन की बातें सोचते हैं।

वास्तविक महात्मा किस विषय पर चिंतन करते हैं?
अर्थात सभी का सोच अपने शरीर के लिए हैं और शरीर के भोग के लिए है। हमारे पूर्वज महान महात्माओं ने इन विषयों को छोड़कर चिंतन किया। उन्होंने रोटी कपड़ा और मकान को महत्व नहीं दिया। उन्होंने ज्ञान की पराकाष्ठा में शासन को महत्वपूर्ण नहीं समझा।

हमारे महात्माओं ने सांसारिक भोग को महत्त्व देने के बजाय ब्रह्म चिंतन को महत्व दिया।

इसका भी मुख्य कारण रहा अपना भारतीय संस्कृति। सनातन संस्कृति जन्म से मोक्ष की बात करता है। मोक्ष जब तक ब्रह्म में लीन नहीं हो जाता तब तक नहीं हो सकता।

ब्रह्मलीन क्या है और वास्तविक मोक्ष क्या है?

ब्रह्म में वहीं लीन हो सकता है जिसके रोंम-रोंम में ब्रह्म बसता हो। जिसके रोटी कपड़ा और मकान में भी ब्रह्म का चिंता हो। जिसके मनोरंजन में भी ब्रह्म समाया हो। जो वास्तव में ब्रह्म विचारक हो। जिसके अंदर ब्रह्म का जिज्ञासा कूट-कूट कर भरा हो।

मानव वास्तव में किसके कैद में है?

दूसरे के चिंतन का लाभ दूसरे को नहीं मिल सकता। जैसा की भावनाएं व्यक्ति अपने द्वारा ही तैयार करता है। हमारा भावना हमें ही नुकसान और लाभ देगा। क्योंकि व्यक्ति स्वयं की ही भावना में स्वयं से हीं कैद में है।

हमारे ब्रह्मर्षि एवं ऋषि महात्माओं ने अनेंक चिंतन किया। आज कहते हुए हमें हर्ष है कि हमारे पूर्वज वास्तव में ब्रह्मजिज्ञासु थे। उनके अंदर ब्रह्मजिज्ञासा का तत्व लबालब भरा था। वे सत्य रूप से के ब्रह्म चिंतक थे।

आज की स्थिति प्राचीन काल से अलग है। आज उदाहरण याद आता है।

“आज ऐसा लगता है जैसे मानो जीव्हा को नौकरी पर लगा रखा है। दिल कुछ और सोच रहा है, मस्तिष्क में कुछ और चल रहा है और
जीव्हा बिना रुके मंत्र का जाप किए जा रहा है।”

मंत्र जाप का लाभ नहीं मिलता क्यों? पूजन से कुछ लाभ नहीं हुआ ऐसा क्यों?

जिस जाप में अपनी भावनाएं सम्मिलित ना हो वैसा जाप व्यर्थ है। जिस पूजन क्रिया में अथवा वैदिक क्रिया में भावनाएं सम्मिलित ना हो वह सभीं क्रिया व्यर्थ हैं।

इस प्रकार का जाप और क्रिया करके अपने आप को खुश किया जा सकता है परंतु मंत्र के ईश्वर को प्रसन्न नहीं किया जा सकता।

ब्रह्मजिज्ञासा। परब्रह्म ईश्वर का चिंतन। Brahmajigyasu. Paarbrahm Chintan.

आज के समय अपने कुतर्क के जरिए वैदिक शब्दों पर अनेक प्रकार के प्रश्न चिन्ह लगाए जाते हैं और समाज में भ्रम पैदा किए जाते हैं।

जबकि सभीं प्रकार के वैदिक क्रिया भावनाओं से संबंधित है। जिस प्रकार भावना रहित को क्रिया से लाभ नहीं मिलता ,उसी प्रकार वैदिक क्रिया के लिए जिसके अंदर भावना न हो,वह वैदिक क्रिया को नहीं समझ सकता। ऐसा व्यक्ति वैदिक अथवा सनातन साहित्य को नहीं समझ सकते।

ब्रह्मा का चिंतन बहुत ही गहन विषय है। किसी विषय का जिज्ञासा किसी के अंदर पैदा नहीं किया जा सकता। जिज्ञासा व्यक्ति के स्वयं के भावना के ऊपर आधारित होता है।

ईश्वर को कौन प्राप्त कर सकता है? परब्रह्म परमेश्वर को कैसे पाएं?

परब्रह्म परमेश्वर के करीब वही जा सकता है जिसके अंदर उस ब्रह्म के बारे में जानने की ब्रह्मजिज्ञासा हो। परब्रह्म परमेश्वर सच्चिदानंद के लिए चिंतन हो।

व्यक्ति अपने कल्पनाओं में विचार करें कि हमारा पारब्रह्म परमेश्वर कैसा होगा। उस ईश्वर का स्वरूप कैसा होगा।

उदाहरण के तौर पर समझे “कोई ऐसा व्यक्ति हो जिसके पेट में कोई भी बात न पचती हो। वैसा व्यक्ति जब कोई महत्वपूर्ण बात सुन लेता है, तो वह बेचैन हो जाता है ,अपनी बातों को दूसरे से कहने के लिए। जब तक वह अपनी बात को कहता नहीं, तब तक उसे मन में शांति और उसे दिल में चैन नहीं मिलता।”

पारब्रह्म का चिंतन कैसे हो? ब्रह्मजिज्ञासु कैसे बने?

ब्रह्म के चिंतन के सामने, ब्रह्मजिज्ञासु के सामने ऐसा बेचैनी बहुत छोटा होगा। वह उस भ्रमण के चिंतन में इतना डूब जाएगा कि उसे न अपना भान रहेगा और न ही संसार का।

जैसे कोई मोहब्बत में अपना सब कुछ छोड़ देता है वैसे ब्रह्म प्रेम में व्यक्ति अपना और अपने सुख भोगों का चिंतन छोड़ विचार करें।

यदि ब्रह्म के चिंतन में कहीं कोई क्रिया की बात आती हो तो उसके लिए बेचैन न हों, वह स्वयं ही उस ईश्वर से प्रश्न करें, वह ईश्वर उसे निश्चित तौर पर उत्तर देगा। संसार में जो भी आश्चर्य है सभी ईश्वर है।

संसार में ईश्वर को कैसे देख सकते हैं? वह भगवान कैसा दिखता है? संसार में आश्चर्य क्या है?

संसार में हर जीव का जीवन आश्चर्य है। एक जीव के अंदर उसके समस्त अंग आश्चर्य है। धरती से दिखने वाला सूर्य आश्चर्य है चंद्रमा भी आश्चर्य है। धरती पर रात और दिन ऑक्सीजन देने वाला पीपल का पेड़ भी आश्चर्य है।

शरीर के अंदर प्राण हैं पर कहां है किसी को नहीं दिखता ,यह भी आश्चर्य है।

शरीर के अंदर से प्राण निकलता है यह सत्य है परंतु कैसे और निकल कर कहां जाता है यह भी आश्चर्य है। प्राण को निकलते हुए कोई देख नहीं पाता यह भी आश्चर्य है।

संसार में ऐसे बहुत मिलते हैं जो कहते हैं परमेश्वर उन्हें नहीं दिखता। यहां सभीं प्रकार के आश्चर्य वह पारब्रह्म परमेश्वर है।

वेद शास्त्र, सनातन साहित्य बार बार कहता है, संसार में जो भी तत्व है, उस तत्व को जो शक्ति देता है वहीं ब्रह्म है।

वह ईश्वर पर ब्रह्म आंखों को देखने की शक्ति देता है। वहीं ईश्वर शरीर को हर प्रकार से शक्ति देता है। वहीं पारब्रह्म ईश्वर सूर्य और पृथ्वी को भी गति देता है।

ईश्वर को सरल तरीके से कैसे समझें?

चुंबक सभीं कोई समझते हैं, चुंबकीय शक्ति को भी समझते हैं परंतु चुंबकीय शक्ति को ईश्वर नहीं मानते। चुंबक को जो शक्ति देता है वही परब्रह्म ईश्वर है।

ईश्वर का प्राप्ति कैसे हो?

ईश्वर का चिंतन दूसरे के करने से नहीं होगा, ईश्वर को अनुभव करने के लिए स्वयं ही ईश्वर का चिंतन करना होगा। वह परम शक्ति परब्रह्म परमेश्वर किसी का खास नहीं, वह सबका ही बराबर है। और सभीं अपने अनुसार से अपने तरीके से ब्रह्म का विचार करने के लिए स्वतंत्र हैं। किसी भी जाति धर्म संप्रदाय समूह से हो। सभीं अपने अनुसार से अपनी परिस्थिति के अनुसार, उस ईश्वर का चिंतन कर सकते हैं।

ब्रह्मजिज्ञासा। परब्रह्म ईश्वर का चिंतन। Brahmajigyasu. Paarbrahm Chintan.

वह ईश्वर किस जाति का है? ईश्वर वास्तव में किस धर्म का है?

वह ईश्वर किसी खास धर्म संप्रदाय अथवा जाति विशेष का नहीं है। वह ईश्वर हवा के समान है, वह कण कण में है।

उस ईश्वर पर ब्रह्म परमेश्वर को पाने के लिए स्वयं के अंदर ब्रह्मजिज्ञासा उत्पन्न करना होगा।

ब्रह्म का चिंतन भी स्वयं ही करना होगा। किसी के पीछे अंध भक्त होने की आवश्यकता नहीं है। हमारे पूर्वजों ने यह साबित किया है वह ईश्वर सर्वत्र है।

सनातन सहित भारत के हर वर्ग और जाति समूह का संपत्ति है। सभीं को इस पर गौरवान्वित होना चाहिए।

2 thoughts on “ब्रह्मजिज्ञासा। परब्रह्म ईश्वर का चिंतन। Brahmajigyasu. Paarbrahm Chintan.

    1. यह ईश्वर का असीम कृपा है! शब्द अच्छा है तो सार्थक है। आपकी भावना उत्तम श्रेणी की है…. धन्यवाद!

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