कहते हैं इंसान नहीं बदलता पैसा बदल देता है। व्यक्ति को धन का चाहत अंधा बना देता है। सत्य की बात अनेक होता है ,परंतु जब धन की बात आता है तो सत्य का सुई मानो रुक जाता हो।
पूर्व काल से एक मशहूर कहावत चला आ रहा है।

“बाप बड़ा ना भैया सबसे बड़ा रुपैया।”


व्यक्ति अपना रंग रूप नहीं बदलता ,रुपए की ताकत उसे सब कुछ देता है। क्योंकि वास्तव में रुपए के रंग हजार हैं।

संसार में धन किसको नहीं चाहिए। सभी को धन चाहिए और सब को रुपए की आवश्यकता है।

सबसे बड़ा रुपैया। रुपए के रंग हजार। Baap bada na bhaiya. Paise ki takat.


ज्ञान और विवेक रुपए और धन को विशेष महत्व नहीं देते। फिर भी सभीं को धन चाहिए। समाज में सभी को रुपए की जरूरत है।

आज रुपए पैसे सिर्फ समाज में ताकत नहीं देते साथ में आवश्यकताओं की पूर्ति भीं करते हैं।

कहते हैं समाज में ईमान नहीं बिकता फिर भी ईमान की बोली लग जाता है।

ईमान किसी का गुलाम नहीं होता फिर भी वह धन का गुलामी स्वीकार करता है।

यह कड़वा सत्य है कि समाज में व्यक्ति का मापदंड धन से लगाया जाता है। जो वास्तविक नियम के दायरे में नहीं आता। फिर भी यह समाज धन के अनुसार से ही व्यक्ति को तौलता है।

यदि ऐसा नहीं होता तो संसार में लोभी और लालची व्यक्ति को सम्मान की दृष्टि से लोग नहीं देखते।

बहुत दृश्य में ऐसा आता है की आम जनमानस रसूखदार के सामने नतमस्तक हुआ रहता है परंतु पीछे में गाली बकता है।



यदि वास्तव में विवेक की दृष्टि से देखें तो उसे, वैसे व्यक्ति को सम्मान नहीं देना चाहिए। परंतु वह सम्मान देता है। सामाजिक दृष्टि से उसे सम्मान देना ही होगा। कारण उसे भी धन की मर्यादा ने बांध रखा है। वह भी अपने सामाजिक विचारों में बंधा हुआ है।

समाज में हर दृश्य में रुपए का अहमियत झलकता हुआ मिलता है।

कुछ प्रतिशत को छोड़ दिया जाए तो समाज में व्यक्ति अपने रिश्ते को भी धन के ऊपर तौल देता है।

जब कभी अपनों और अपनों के रिश्तो की बात आता है यह रुपया अपना रंग दिखा जाता है।

यह पैसा अपने सगे संबंधियों के साथ खेल खेलने लगता है। यह रुपया अपने अपनों को मजबूर कर देता है रुपए को महत्त्व देने के लिए।

बाप बड़ा ना भैया सबसे बड़ा रुपैया। रिश्ते में पिता को सबसे ऊपर कहा गया। ऐसा नहीं है कि माता का महत्व कम है। परंतु बाप अपने बच्चे पर प्रभुत्व ज्यादा जमाते हैं।

संसार में एक और कहावत है
“जो अपने बाप की नहीं सुनता वह किसी और की नहीं सुनता।”

सबसे बड़ा रुपैया। रुपए के रंग हजार। Baap bada na bhaiya. Paise ki takat.


यह कहावत कही सही है और कहीं गलत है। मैं कहता हूं जो किसी की नहीं सुनता वह अपनी पत्नी की जरूर सुनता है। और किसी की सुने ना सुने रुपए और धन का जरूर सुनता है।

संसार में माता के बाद पिता का स्थान सर्वोच्च है।

परंतु यहां पिता इसलिए कहा गया है कि समाज में मां से ज्यादा लोग बाप की सुनता है।

पिता का इतना महत्व होने के बाद यहां कहावत है जहां धन की बात आता हो तो पिता बाद में और रुपया-पैसा पहले।

वास्तव में ऐसा कहने वाले और करने वाले दोनों ही ज्ञान और विवेक से कोसों दूर हैं।

क्योंकि सत्य है संसार में हर वस्तु दो बार मिल जाता है परंतु मां-बाप दूसरी बार नहीं मिलते।

कुछ प्रतिशत को छोड़ दीजिए तो यह भी सच्चाई है की

‘दुनिया पैसा पैसा करती है और पैसा पर ही मरतीं है।’



मानो ऐसा लगता है इस समाज का भगवान पैसा है। यह रुपया-धन ! व्यक्ति को इतना अंधा कर देता है कि वह अहंकार का राजा बन जाता है। उस व्यक्ति के अंदर यह भ्रम हो जाता है कि अब वह दुनिया की हर वस्तु को खरीद सकता है।

वह बहुत प्रकार से अनैतिक कोशिशें भी करता है परंतु अंतत: हार जाता है। उसने पैसे की ढे़री तो लगा दी।

परंतु उसके अपने! उसी घन का सहारा लेकर उसके अस्तित्व को मिट्टी में मिला देते हैं।

इतिहास गवाह है एक से एक धनवान हुए । एक भी व्यक्ति धन से हिस्सा ले जाने वाला कोई ना हुआ। बहुत ऐसे दृश्य में आया है जो अनैतिक तरीके से धन को एकत्र करता है,वही धन उसे एक बार तकलीफ देने लगता है।

सब किसी को पता है रुपया कोई नहीं खाता। धन कोई नहीं खाता।

सोना कोई नहीं खाता। धन कितना भी ज्यादा हो, खाने से ज्यादा कोई नहीं खाता।

धन आने से पहले अनेक प्रकार की आशाएं दिखाता है।

व्यक्ति कल्पनाओं के समंदर में गोते लगाता है। धन आता है वह अपने साथ एक तूफान लेकर आता है। वह तूफान इतना तीव्र वेग से आता है कि व्यक्ति का कल्पना हवा में उड़ जाता है।

वह शख्स यह महसूस नहीं कर पाता है कि रुपए का वास्तविक आनंद क्या है।

व्यक्ति झूठे आशा और विश्वास में धन को लेकर अपने रिश्ते को भी तौल देता है।

यह रुपया मानो ऐसा लगता है कि वह रिश्ते को खा गया हो।

यह रुपया-पैसा! ऐसा लगता है कि रिश्ते नाते को धीरे धीरे चबा रहा है। यह धीरे-धीरे अपनों के प्रेम को चूस रहा है।

देखते-देखते अपने पराए हो जाते। यह रुपया एक बहन से भाई का प्रेम छीन लेता है। यह रुपया एक भाई से बहन का प्रेम छीन लेता है।

इस रुपए की करनीं यदि कहीं जाए तो मुंह थक जाएगा शब्द कम पड़ेंगे।

यह रुपए और धन कितना जालिम है यह सब चिंतन में समझ सकते हैं।

यह रुपया ऐसा है जो एक पिता के प्रेम को खा जाता है। यह रुपया एक मां का सम्मान खा जाता है।

यह रुपया पुत्र के अधिकार को खत्म कर देता। यह रुपया पुत्र को कुपुत्र बना देता है। यह रुपया दिल के टुकड़े दोस्त को दुश्मन बना देता है।

इस रुपए को क्या कहे भैया।
यह रुपया तो हुआ है जो पति-पत्नी में भी झगड़े लगा देता है।

इस रूपए ने भगवान के वास्तविक पूजन को भी खा लिया है। जब एक भक्त भगवान की भक्ति करता है तो यह रूपिया सामने खड़ा हो जाता है।

जिस भगत को ईश्वर की भक्ति करना चाहिए वह रुपए की भक्ति में लींन हो जाता।

यह तो समाज का वास्तविक सच्चाई है। इस विषय को सभीं भली-भांति समझते। परंतु रुपए-पैसे और धन की गुलामी करने को मजबूर है।

सनातन साहित्य इस बात पर जोर देता है की स्वार्थ के द्वारा खड़ी की हुई दीवार ज्यादा समय तक टिका नहीं रहता। झूठ की दीवार बहुत ऊंचा नहीं उठ सकता।

झूठ का दीवार एक छलावा है। जो झूठ का सहारा लेकर दूसरे को छलना चाहते हैं। वह वास्तव में अपने आप को छल रहे होते हैं।



झूठ सत्य के ऊपर पर्दा तो डाल सकता परंतु उसके अस्तित्व से खेल नहीं सकता। क्योंकि झूठ का वास्तविक अस्तित्व नहीं होता।

यदि रिश्ते का शुरुआत स्वार्थ से हुआ हो तो उसका समापन भी स्वार्थ से ही हो जाएगा।

इसलिए कहते हैं वास्तविक रिश्ते में अपने स्वार्थ का जगह नहीं होना चाहिए।

स्वार्थ संसार में एक जादू के जैसा है। जो जहां जाता है दृश्य को अपने अनुसार से बदल लेता है।

जिस रिश्ते का शुरुआत धन ,रूपया , पैसा और झूठ से हुआ हो वह वास्तविक रिश्ता नहीं हो सकता। अथवा ऐसा कह सकते हैं इस प्रकार का रिश्ता ज्यादा लंबे समय तक नहीं चल सकता।

यदि आपस में रिश्ते को बरकरार रखना है तो रिश्ते और धन का महत्व समझना पड़ेगा।

यहां यह समझना पड़ेगा कि बाप बड़ा है न कि पैसा। “बाप बड़ा ना भैया सबसे बड़ा रुपैया” बहुत सुन चुके।
अब अपनों को और अपने अपनों को। अपने रिश्तो को बचाने के लिए बाप के भी महत्व को समझना पड़ेगा, और रुपया के भी महत्व को समझना पड़ेगा।

रुपया या धन कह सकते हैं यह जीवन का आवश्यकता है। रुपया क्या है?

जीवन का आवश्यकता है। परंतु अपनों का रिश्ता आवश्यकता नहीं है वह जीवन है।

महाभारत में अपने योद्धाओं के मरने के बाद युद्ध जीतने के लिए दुर्योधन यह वाक्य कहता है। ”अब यदि मैं यह युद्ध जीत भी जाऊं तो मेरे लिए इसका कोई महत्व नहीं है। कारण मैं यह युद्ध लड़ कर जो अपनों को दिखाना चाह रहा था, एवं मैं जिसे दिखाने के लिए युद्ध लड़ रहा था। वे सब के सब दुनिया छोड़कर चले गए। अब यह जीत भी मेरे लिए हार के समान हैं।”

वास्तविकता यही है उन्हीं अपनों को दिखाने के लिए लोग धनवान बनना चाहतें है।

सबसे बड़ा रुपैया। रुपए के रंग हजार। Baap bada na bhaiya. Paise ki takat.

उसी अपनें रिश्ते में महत्वपूर्ण बनने की कोशिश करता है।एक दिन उसी धन के लिए अपनें और अपनों के रिश्ते का तिलांजलि दे देता है।



यह कैसा रुपया-पैसा है। जिस सपनों को देख कर व्यक्ति पैसा-पैसा करता है ,एक दिन यही पैसा उन सपनों को हीं खा जाता है।

पैसा क्या है आवश्यकता है और रिश्ते क्या है वह जीवन का आनंद है। आवश्यकता के लिए लड़ा जा सकता है परंतु अपने जीवन के आनंद को खो कर कौन-सा आनंद मिलेगा।

जब अपने ही नहीं रहेंगे, जब अपनों का प्रेम ही नहीं रहेगा। फिर वह धन और रुपया किस काम का।

रिश्ते में धन का अहमियत उतना ही दिया जाना चाहिए कि रिश्ता कायम रहे। आपसी रिश्तो में प्रेम का मिठास रहे। जब आपसी रिश्ते में कड़वाहट आता है तो वह दिन का चैन और रात का नींद ले लेता है।

अपने क्रोध, अहंकार और अहम के ऊपर रिश्तो को बलि न चढ़ाएं। धन कभी-कभी आनंद देता है परंतु रिश्तेदारी जीवन पर्यंत तक आनंद लेता है।

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