कोई कहता है किसी भी प्रकार निराशा की बात मत करो। यह सोचना ही गलत है की वास्तविक सत्य निराशा का कारण हो सकता है।

Prakriti se kaun ladega. आज तक प्रकृति से कौन जीत पाया है। संसार के हर प्राणी प्रकृति के आधीन है और प्रकृति के परवश हुआ कर्म किया करते हैं।

प्रकृति से कौन लड़ेगा। प्रकृति सबका अहंकार तथा अस्तित्व खत्म कर देने वाला है। क्या प्रकृति सब का नाश करने वाला है? यह वास्तविक सत्य नहीं है।

क्या प्रकृति ने भूतकाल में हमारे अपने सगे संबंधियों को अतीत में निगल गया, यह सच्चाई नहीं है। इस धरती पर किसका अहंकार टिका है और किसका टिकेगा।

Prakriti se kaun ladega. Sanatansaty

मुझे यहां महान महात्मा श्री कबीर जी की वाणी याद आता है।

कबीर जी ने इस सत्य को बहुत ही सरल और अनोखे अंदाज में कहा है। कबीर जी की भाषा कड़वाहट भरा तो होता है परंतु सत्य का आईना भी दिखा देता है। कबीर जी अपने इस दोहे के जरिए दुनिया वालों से कहते हैं-

माटी कहे कुम्हार से, तु क्या रौंदे मोय ।
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूंगी तोय ॥

अर्थात कबीर जी कहते हैं-

मिट्टी! बर्तन बनाने वाले कुम्हार से कहती है, तू मुझे क्या रौंद रहा है। हे कुम्हार! एक दिन ऐसा आएगा, मैं तुझे रौंदूंगी।

इस दुनिया में सभी जीवों का उत्पत्ति मिट्टी से हुआ है। जब जीव के शरीर का अंत होता है तो वह वापस मिट्टी में मिल जाता है। यह कोई धीरे कहने वाला अथवा छुपकर कहने वाला विषय नहीं है।

यह वास्तविक सत्य है और सब जानते हैं। आज के समय में सभी ज्ञानवान है, कौन है? जिसके पास ज्ञान नहीं है।

आज के दिन में समाज में प्रश्नों के लिए गूगल बाबा अपना काम करते हैं। प्रश्न पूछा नहीं कि उसका उत्तर सामने हाजिर हो जाता है।

कोई यदि समझना न चाह रहा हो तो उसमें उसके ज्ञान का क्या दोष है। कौन है जो इस धरती पर सदा रहने वाला है।

सबको जाना है समय नजदीक आ रहा है, प्रकृति अपना मुंह खोलो बैठे इंतजार कर रही है।

श्री कबीर दास जी अपने शब्दों के जरिए कहते हैं। जिस मिट्टी से यह शरीर बना हुआ है, वही मिट्टी शरीर से कहता है।

इस प्रकृति से शरीर का निर्माण हुआ है। यही प्रकृति जीव के शरीर से कहता है। तु मुझे क्या नष्ट करने पर तुला हुआ है।

हे जीव! मुझको मिटा सके ऐसी तेरी हस्ती कहां। तेरी सभीं मस्ती सिर्फ और सिर्फ मेरी हस्ती में है।

समाज में कोई ऐसा भी है जो अपना प्रकृति स्वयं निर्माण कर लेना चाहता है। मानो उनके अंदर ऐसा सोच है कि वे प्रकृति को अपनी मुट्ठी में कर लेना चाहते हो।

वास्तव में प्रकृति सिर्फ और सिर्फ ईश्वर की गुलाम है। प्रकृति ने जिनकों बनाया है वे सभीं प्रकृति के गुलाम हैं। समस्त जीव पूरी तरह से प्रकृति के अधीन है।

यह प्रकृति बार-बार कहता है तू मुझे नष्ट करने पर क्यों तुला हुआ है। एक दिन ऐसा भी आएगा जब मैं तुझे नष्ट कर डालूंगा। उस समय तेरा कोई भी जमा पूंजी काम नहीं आएगा।

मैं सिर्फ तेरे शरीर को नष्ट नहीं करने वाला हूं।

मैं तेरे अहंकार को, तेरे घमंड को, तेरे लालच के द्वारा जमा किए हुए सभी धन को एवं तू जिसके कारण अनैतिक कर्मों को करते रहा है उस सबका मैं शिकार कर लूंगा।

माटी कहे कुम्हार से, तु क्या रौंदे मोय ।
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूंगी तोय ॥

श्री कबीर दास जी एक दोहे के जरिए प्रकृति की सभी सच्चाई को व्यक्त कर देते हैं।

प्राचीन साहित्य से इस समाज ने बहुत ज्ञान पाया है। उन सभीं ज्ञान के अंदर एक ज्ञान यह भी है कि जितने भी अधिक सामर्थ्यवान व्यक्ति हुए सभीं ने अधिक जीने के लिए बहुत प्रयत्न किया।

इतिहास में ऐसे भी महापुरुष हुए जिन्होंने अमर होने के लिए अनेक प्रकार के कर्म किए।

अमर होने के लिए कुछ अच्छा कर्म किया और कुछ बुरा भी कर्म किए।

अनेक प्रकार के प्रयासों के बाद भी संसार में आज तक कोई अमर नहीं हो सका है,और यह भी सत्य है कि आगे भी कोई अमर हो भी नहीं सकता।

ईश्वर को अमर कहा गया है कारण ईश्वर का जन्म नहीं होता। सनातन साहित्य ईश्वर को अजन्मा कहता है।

जिसका जन्म ही ना हुआ हो उसका मृत्यु भी नहीं हो सकता। जो जन्मा है वह आज नहीं तो कल मरेगा।

प्रकृति में कुछ तो ऐसे भी हैं जो सोचते हैं कि यह शरीर मर जाएगा उसके बाद भी हमें एक उत्तम स्वर्ग लोक प्राप्त होगा।

यदि कहीं स्वर्ग लोक है तो वह भी इसी धरती पर है।

यदि उत्तम कर्म होगा तो उत्तम गति मिलेगा। उत्तम गति का अर्थ मोक्ष नहीं होता व्यक्ति आज से उत्तम मार्ग की ओर बढ़ने लगता है।

व्यक्ति अपने श्रेष्ठ कर्मों द्वारा उत्तम गति को प्राप्त कर सुयोग जन्म को पाता है।

मृत्यु के अंत समय के भावना हीं व्यक्ति का जन्म निश्चित करता है। व्यक्ति बचपन से अपने भावनाओं को बनाने का काम स्वयं करता है।

प्रकृति से कौन लड़ेगा और कब तक लड़ेगा।

एक छोटा सा बच्चा जिसे कभी आंखो से डराया जाता है वह भी आगे चलकर अपनी हीं आंखों से डराने लगता है। इस संसार में जिससे हमने मोहब्बत किया वह कभी पलकें बिछानें की बात करता है। वही व्यक्ति आगे चलकर पैरों तले जमीन खिसकाने का काम करता है।

किसी समय सुंदर तन को देखकर! जो कभी आईना भी शर्म आ जाता था।

वही आईना अब मायूस होने लगता है। व्यक्ति कभी बालों को रंग-बिरंगे करके समाज को दिखाने का प्रयत्न करते हैं। एक समय आता है कि उन्हीं बालों में कलर किए जाते हैं ताकि सफेदी को छुपाया जा सके।

प्रकृति को कोई भरमा नहीं सकता। जो प्रकृति को अपने अनुसार से बदलने की कोशिश करते हैं वह वास्तव में वे अपने मन को भरमाते हैं।

व्यक्ति अपने मन को भी कब तक भरमा पाएगा। एक समय ऐसा आएगा आखिरकार प्रकृति जीत जाएगा।

मानव तन का झूठा शानो शौकत मिट जाएगा। अहंकार धूल में मिल जाएंगे।

घमंड शीशे के प्लेट के जैसा चकनाचूर हो जाएगा। मानव तन जिस पर हमें कभी नाज हुआ करता था वह सदा के लिए मिट्टी में मिल जाएगा।

इसलिए कबीरदास जी कहते हैं । हे मानव! तू नाज मत कर अपने तन पर।

यह मानव शरीर प्रकृति का बहुत बड़ा वरदान है। तेरा शरीर ईश्वर का वरदान है। धरती के सभीं जीव तेरे अपनें हैं। अपने इस शरीर को जाया न होनें दे। तू प्रकृति का सम्मान कर। तू मिट्टी का सम्मान कर। मिट्टी से जन्मे हुए सभी प्रकृति का सम्मान कर। तू आज जिससे घमंड और ईर्ष्या करता है। उसका जो हाल होने वाला है तेरा भी वही होगा।

आज तक इस प्रकृति ने सबको जैसे मसलकर खत्म कर दिया। तू भी प्रकृति के द्वारा मसल दिया जाएगा।

प्रकृति से कोई जीत नहीं सकता। अपने मौत से कोई नहीं जीत सकता। आज नहीं तो कल सबनें जाना है। तुझे भी जाना होगा तू कितना भी यत्न कर ले।

मानव धर्म कर्म की महानता की बात करता है।

मृत्यु के समय व्यक्ति के साथ वास्तव में यदि कुछ जाता है तो वह अपने द्वारा किया गया कर्मों का भाव जाता है।

इसीलिए श्रीमद्भागवत गीता कहतीं हैं – तू सिर्फ कर्म किए जा उसके फलों की इच्छा ना कर। और तु किसी के द्वारा परवश होकर कर्म मत कर।

तू जब कर्म करेगा तो वह निश्चित होगा। जब किसी चीज के द्वारा मजबूर किए जाने पर कर्म करेगा तो वह कर्म भली-भांति नहीं हो सकता। कारण उस किए गए कर्म में तेरा भावना संपूर्ण सम्मिलित नहीं होगा।

इसलिए सनातन सत्य कहता है व्यक्ति कर्म तो सबके लिए करें परंतु चिंतन सिर्फ अपने लिए करें।

आने वाले समय में प्रकृति हमें झुकने पर मजबूर कर दे उससे पहले हीं हम झुकना सीख जाएं। मजबूरी में झुकने पर बहुत दर्द होगा। प्रकृति से हम कभी जीत नहीं सकते।

इस बात को हम सहस्त्र स्वीकार करें और प्रकृति के नियमों को स्वीकार करें। यह कड़वा सत्य है और इसे सभी को स्वीकार करना हीं होगा।

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