इस धरती पर एक रोग ,जो जीवन के जो साथ में आता है !

वह है वृद्धावस्था! कोई बुढ़ापा भी कहता है। यह रोग इतना बड़ा है की प्राचीन काल से इससे लड़ने के लिए अनेकों प्रकार के कोशिश किए गए। आज भी लोग यही सोचते हैं क्या करें कि जीवन का सबसे बड़ा रोग वृद्धावस्था न आए। हम वृद्धावस्था से कैसे लड़े, इसके लिए सभी कोशिश में लगे रहते हैं। यह सत्य है Budhapa.Jeevan ka sabse bada rog‌ है।

संसार में जवान होने के अनेकों प्रकार के दवा भी पाए जाते हैं।

बहुत जगह प्रचार भी मिलेगा इसका। परंतु यह सभीं दवा वास्तव में कुछ समय के लिए जवानी प्रदान करता है। वास्तव में यदि कहा जाए कि वह दवा जवानी देता है तो यह महज एक सपना है। कारण दवा लेकर यदि जवान हो रहे हैं तो वास्तव में जवान नहीं हो रहे हैं।

वह दवाई दूर खड़े हुए लाचार वृद्धावस्था को या कहें कि लाचार बुढ़ापा को खींचकर करीब लेकर आता है।

यदि किसी व्यक्ति के अंदर समय से पहले बुढ़ापा आ जाए तो उसका दवा के माध्यम से इलाज है। क्योंकि उसको उम्र के अनुसार बुढ़ापा नहीं कहेंगे वह एक प्राकृतिक रोग है। समय से पहले से आए हुए बुढ़ापे को दवा ठीक कर देता है।

यदि इस बुढ़ापे की बात करें तो समाज जानता है ऐसे बुढ़ापे को बुढ़ापा नहीं कहते हैं रोगी कहते हैं।


एक बीमार आदमी अपने शरीर में बीमारी को लेकर लाचार अवस्था में चला जाता है। रोगी बीमार व्यक्ति के लिए बहुत प्रकार के दवाएं होता है और व्यक्ति ठीक भी होते हैं।

यहां जिस बुढ़ापे का जिक्र किया जा रहा है। यहां जिस वृद्धावस्था के बारे में हम बात कर रहे हैं यह वृद्धावस्था! वास्तविक वृद्धावस्था है।

यह बुढ़ापा हम इस धरती के सभी जीवो में देख सकते हैं। यहां तक की नहीं चलने वाले जो पेड़ हैं उन पेड़ को भी वृद्धावस्था आता है।

जंगल के राजा के नाम से मशहूर शेर को भी बुढ़ापा आता है।

एक समय जिस शेर से जंगल के हर जानवर डरा करते हैं। जब वही शेर वृद्धावस्था में कहीं पड़ा होता है तो बिल्ली और चूहे उससे खेल खेला करते हैं। उस शेर को एक चिड़िया भी चिढ़ा कर चला जाता है।यह शेर के जीवन की वास्तविक सच्चाई है। कोई शेर है इसके लिए उसे वृद्धावस्था नहीं आएगा ऐसा नहीं हो सकता।

इसी प्रकार यदि मानव जीवन की कहानी देखें तो अपने ऊपर बहुत आश्चर्य होगा।


एक बच्चा जन्म लेता है तो वह बिल्कुल किसी फूल के कली के समान दिखता है। उसका हाथ पैर, पैरों की उंगलियां सब नाजुक होते हैं। धीरे-धीरे बड़ा होना शुरू होता है ।वह एक समय अपने पैरों से चलने लगता है। उस बच्चे की दृष्टि अपने से बड़े के ऊपर होता है। उस बच्चे को सब कुछ बड़ा बड़ा दिखता। उस समय उसे हर बार यही लगता है कि वह इस दुनिया में बहुत छोटा है।

वह गमले में लगे हुए फूल के पौधे से भी अपने आप को छोटा देखता है।

उसे किसी प्रकार का मानसिक अहम नहीं होता है। उसे सिर्फ जरूरत की सामग्री चाहिए।

वह बच्चा थोड़ा और बड़ा होता। वह अपने आप को दुनिया में कुछ ऊंचा देखने लगता।

जितना बड़ा होता है उसके खिलौने उतने बड़े होते जाते। उस बच्चे के ऊपर मानसिक दबाव कम नहीं होता। उस वक्त तक उसके ऊपर शिक्षा ग्रहण करने का दबाव चालू हो जाता है। वह जैसे-जैसे बड़ा होता है वैसे वैसे दुनियां उसे अपनी ओर खींचना चाहता है और मां-बाप उसे रोककर पढ़ाना चाहते हैं। उसके मां-बाप उसे आगे बढ़ाना चाहते हैं।

अब उसके मस्तिष्क में ऐसा ख्याल आता है ।जब उसका शिक्षा पूरा हो जाएगा वह अपने मनमर्जी का मालिक हो जाए।

जब तक तो वह वृद्धावस्था के बारे में कभी सोचा भी नहीं होगा। उसके अपने वृद्ध कुछ समय पश्चात छोड़कर चले जाएंगे वह तो ऐसा भी नहीं सोचता।

जब जीवन का दबाव उसके ऊपर आता है जब परिवार की जिम्मेदारी उसके ऊपर आता है।

उस समय वह बैल के जैसा जीवन रूपी खेत को जोतने में लग जाता है। वह बच्चा इस उम्मीद में कि उसे आनंद मिलेगा क्योंकि वह आजाद हो जाएगा। जब वह आजाद होता है तो अपनें ही दबाव में दब जाता है। उस समय वह पूरी तरह से सांसारिक भावनाओं में बंधा रहता है।

वहां भी वृद्धावस्था के बारे में उसे कोई सोच नहीं होता।

वह यह देख ही नहीं पाता की एक बहुत बड़ा रोग, वृद्धावस्था बहुत तेजी से उसके तरफ दौड़ा चला आ रहा है। उस समय उसे लगता ही नहीं कि वह कभी बुड्ढा भी होगा। उसे इसका आभास भी नहीं होता कि उसे वृद्धावस्था में क्या गति होने वाली है।

वह जवानी के मद में चूर अपने आप को दुनिया के चकाचौंध में झोंक देता है।

वह अपने जीवन के लड़ाई को लड़ते-लड़ते अचानक अपने आप को वृद्धावस्था में पाता है। उसे यकीन नहीं होता कि इतना जल्दी वृद्धावस्था में कैसे आ गया। अब तक तो वह जवान था, उसे अपने सुंदरता पर नाज था। परंतु वह आज अपने बुढ़ापे को छुपाने की कोशिश करता है। वह आज भी नहीं समझ रहा है बुढ़ापे की लाचारी बहुत तेजी से करीब आ रहा है।

यह बुढ़ापा बीमारी का बुढ़ापा नहीं है यह बुढ़ापा तो समयानुसार आने वाला वास्तविक बुढ़ापा है।

कल तक जिस बच्चे को वह डांट कर चुप करा देता था वही बच्चे आज चुप रहने का नसीहत देते हैं। आज भी वह बुढ़ापे को नहीं देख पाता। आज भी वह अपने अंदर अनेकों दर्द लिए अंदर ही अंदर घुटते रहता है।

आज तक वह समाज में एक सम्मानित व्यक्ति था। वह अपने परिवार को बहुत ही संस्कार वाला मानता था।

उसने तो अपने परिवार को संस्कार दिया परंतु वही संस्कार आज उसे कुसंस्कार दिखता है। आज उसे यकीन होता है कि अब हमारा दिन चला गया। अब हमें अपने सभी प्रकार के तमन्ना का त्याग कर देना चाहिए।

परंतु भावना रूपी तमन्ना जो जकर के रखा हुआ है, वह उस समय छोड़ने को तैयार नहीं होता।

आज भी वह उसी रुतबे के साथ जीना चाहता है। परंतु शरीर के रुतबे की तरह उसके भाव का भी रुतबा चला गया ।

आज उसका कोई नहीं सुनने वाला। पहले वह लोगों को सुनाया करता था परंतु आज जो आता है वह सुना कर चला जाता है।

आज अच्छा क्या, बुरा भी कोई सुनने वाला नहीं है। उसके मन में अनेकों ख्याल आते हैं।

कल तक वह अपना खुशियां बांटा करता था और आज उसका कोई दुख बांटने वाला नहीं है। आज सब अपने चंद शब्दों से दिलासा दिया करते हैं।

यह वास्तविक वृद्धावस्था है । इस वृद्धअवस्था रुपी जीवन से सबका मुलाकात होगा।

सनातन साहित्य में देवी और देवता को भी अमर नहीं बताया गया है। अर्थात इस संसार के प्रकृति में कोई अमर नहीं है। जो जन्मा है उसे मृत्यु भी आएगा। जो आज जवान है कल बुढ़ापा भी आएगा।

एक वृद्धावस्था के दर्द को वृद्ध व्यक्ति हीं समझ सकता है।

मैं यहां यह नहीं कह रहा कि सब अपनें गलत हैं। परंतु एक वृद्ध के सामने परिवार के दूसरे व्यक्तियों का अपना एक संसार है। वे परिवार! वृद्ध को अपना जिम्मेवारी तो मानते हैं परंतु वे अपनी दुनिया में नहीं मानते।

अब बात आता है इस बुढ़ापे का उपाय क्या है। व्यक्ति अपने वृद्धावस्था से कैसे लड़े?

एक वृद्ध के लिए सरल उपाय यही है कि वह अपने परमेश्वर में स्नेह लगाए। वह सांसारिक इच्छाओं का पूरी तरह से त्याग कर दे। उसके अपने उसके लिए क्या करते हैं ,और क्या करना चाहिए ऐसा सोच पूरी तरह से छोड़ दे। क्योंकि समाज में पड़ा हुआ एक लाचार वृद्ध अपने अनुसार से अपने शरीर को भी नहीं चला सकता। वह अपने-अपनों को कैसे चलाएगा।



प्राचीन इतिहास में जो भी सिद्ध महात्मा हुए, यही बात बार-बार कह कर गए। व्यक्ति स्वस्थ शरीर में परमेश्वर से अपनी प्रीति जोड़ लें। क्योंकि जब व्यक्ति अस्वस्थ होता है ,उस समय शारीरिक पीड़ा व्यक्ति को स्वस्थ सोचने नहीं देता।

सनातन सत्य कहता है कोई आपके लिए जीवन को नहीं जी रहा।

यह दुनिया सब अपने लिए जीवित है। इसलिए कर्म तो सबके लिए करें! परंतु जीवन को जिएं अपने लिए।

दुनिया में कोई बीमार नहीं होना चाहता। सब पूरी उम्र निरोग रहना चाहते हैं। रात दिन भगवान से यही प्रार्थना करते हैं कि, हे भगवान मुझे निरोग रख। मुझे संसार की सभीं खुशियां दे दे। मुझे इस जीवन में और समय दें कि मैं इस जीवन का आनंद उठा सकूं।

वह सब दिन परमेश्वर से आनंद तो मांगता है परंतु परमेश्वर से परमेश्वर को कभी नहीं मांगता। व्यक्ति के शरीर में वृद्धावस्था रूपी जन्मजात बीमारी है।

यह बीमारी भविष्य रूपी समय में मुंह खोले खड़ा हुआ है। वह मुंह खोल कर इंतजार में खड़ा है जवानी को निकलने के लिए।

यह जीवन लाख प्रयत्न कर ले फिर भी बुढ़ापे के मुंह में जाने से नहीं रोक सकता।

जब बुढ़ापा जवानी को निकल जाएगा फिर शुरू होता है बुढ़ापे की लाचारी। उस लाचारी को पूरी दुनिया देखती है परंतु समझता कोई नहीं।

एक वृद्धावस्था व्यक्ति अपने आप को लाचार तो महसूस करता है। परंतु वह अपना दर्द किसी को महसूस नहीं करा सकता।

ऐसी स्थिति में अब वह डरने लगता है।

मृत्यु रूपी सच्चाई सामने मुंह फाड़े खड़ा है। यह वह व्यक्ति देख रहा होता है। कि सामने खड़ा मृत्यु हमें खा जाएगा। आज भी वह जीना चाहता है। वह उस मृत्यु से बार-बार कहता है। मुझे फिर से जवानी दे दे।

मुझे एक बार फिर से स्वास्थ्य कर दे। कुछ संसार में अधूरे पड़े भोग इच्छा को मैं पूर्ण कर लूं।

वह खड़ा हुआ मृत्यु कुछ नहीं सुनता है। क्योंकि मृत्यु का काम तो मौत देना है। उसके हाथ में जीवन नहीं है।

वृद्धावस्था में व्यक्ति इस डर से दहशत में रहता है। पता नहीं सामने खड़ा मृत्यु कब हमें साथ ले कर चला जाए।

वह व्यक्ति उस संसार को छोड़कर जाना नहीं चाहता। जिस संसार को उसने अपने अहंकार और भावना से तैयार किया था।

बुढ़ापा का सरल इलाज यही है कि व्यक्ति के अंदर बुढ़ापे से लड़ने की शक्ति पहले से जागृत हो।

वह अपने बुढ़ापे से भय न करें। वह अपने बुढ़ापे को वास्तविक सत्य माने। मृत्यु आने वाला है ,वह मृत्यु देव को भी सम्मान की नजरों से देखें।
वह मृत्यु देव से प्रार्थना करें की है।हे देव मैं संसार में हूं। मैं संसार के लिए जीवन को जी रहा हूं। जब तक मेरे अंदर जीवन है मैं प्रकृति से लड़ते रहूंगा। हे मृत्यु देव आपकी जब इच्छा हो मैं आपके साथ चलने को तैयार हूं।

अपने कर्म को ऐसा सुदृढ़ बनाए की मौत से भी यह बात कह पाए कि मैंने जिस जीवन को आनंद से जीया है।

मैं जीवन के वास्तविक सच्चाई मौत को भी उसी आनंद से स्वीकार करूंगा। मृत्यु देव भी संसार चक्र का पालन कर रहे हैं।

यदि वृद्धावस्था में मृत्यु देव का उपकार ना हो ऐसी स्थिति में एक वृद्ध लाचार शरीर क्या करेगा।

उस वक्त इस संसार के हमारे अपने भी मृत्यु देव से प्रार्थना करने लग जाते हैं। हे मृत्यु देव इन्हें मुक्ति दे दो। यह एक जीवन की वास्तविक कटु सत्य है।

3 thoughts on “वृद्धावस्था जीवन का सबसे बड़ा रोग।Budhapa sab Ko aane wala ek Rog.

  1. एक समय जिस शेर से जंगल के हर जानवर डरा करते हैं। जब वही शेर वृद्धावस्था में कहीं पड़ा होता है तो बिल्ली और चूहे उससे खेल खेला करते हैं। ” I like this line.. reality of life.. nice post 😊

    Like

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s