संसार में भारत की संस्कृति अपने आप में बेहद ही खास और महत्वपूर्ण है।

यहां हम चिंतन करेंगे ,प्रकृति जीव का माता कैसे?

सनातन धर्म वाले प्रकृति को अपनी माता मानते हैं।

हर भारतवासी भारत देश को भारत माता कह कर पुकारते हैं। हर भारतवासी भारतीय भूमि को जन्मभूमि मानते हैं। जिस पृथ्वी पर इतना बड़ा साम्राज्य है, पृथ्वी को अपनी माता मानते हैं।सनातन धर्म सबसे पुरानी पद्धति को जिसे वैदिक पद्धति कहा जाता है वह सनातन है। हिंदू शब्द स्वयं से किसी ने नहीं रखा, हम सनातनीयों को विदेशी लोग हिंदू धर्म वाले कहते हैं।

भारत की संस्कृति कितनी महान है ।इसके महानता का उल्लेख करना शायद किसी के बस का बात नहीं होगा।

भारत समस्त प्रकृति को अपनी माता मानता है। विज्ञान पृथ्वी के अंदर जितने भी तत्व हैं तथा ब्रह्मांड के अंदर जितने तत्व है उसे जीवन का कारण मानते हैं।

सनातन धर्म वाले जो प्रकृति जीव का कारण है,उसी प्रकृति को माता कहते हैं। एक दृष्टि से देखें तो प्रकृति को माता कहना किसी प्रकार भी अनुचित नहीं है।

संसार में जो जन्म देती है उसे माता कहा जाता है। माता भी प्रकृति है। और में जितने भी जीव की उत्पत्ति हुई है वह सब एक प्रकृति का निश्चित कारण है। ऐसा विज्ञान कहता है।

आप एक खाली बर्तन में शुद्ध स्वच्छ पानी भरो और उसे एक जगह स्थिर रख दो।

कुछ दिनों अथवा महीनों बाद उसमें अनेक कीटाणु उत्पन्न हो जातें है। वहां यदि ध्यान से देखें तो उस कीटाणु की माता वह प्रकृति हुई। क्योंकि वहां पर उस प्रकृति ने उस कीटाणु को जन्म दिया है।

एक छोटा सा और उदाहरण है आप बाजार से कच्ची मूंगफली लेकर आओ। उस मूंगफली को एक डब्बे के अंदर आप बंद करके किसी कोने में रख दो। 3 या 5 महीने बाद आप देखोगे कि उसमें अनेक कीटाणु आ गए हैं। यह भी हो सकता है कि आपको वह मूंगफली अंदर से खोखला मिले।

आप के डब्बे को बंद करने के बावजूद भी अंदर कीटाणु उत्पन्न हो गए।

वास्तव में उस डब्बे के अंदर एक प्रकृति मौजूद है। उसी प्रकृति ने वहां पर कीटाणु रूपी जीव को पैदा किया। एक तरीके से कहा जाए तो वहां वह प्रकृति उस जीव की माता हुई।

भारत के संस्कृति में आज हर जगह सनातन पद्धति का छाप मिलता है।

जो नदी पहाड़ों से निकलकर समंदर में मिल जाती है । उस नदी को यहां पर माता का दर्जा दिया गया।

भारत में वह नदी सिर्फ नदी नहीं है जीवनदायिनी माता है।

वह स्वयं ही जगत जननी माता का स्वरूप है। इस प्रकार से हमारे पूर्वज कहते हैं और सनातनी इस बात को मानते हैं।

धरती पर अनेक नदियां हैं परंतु सब नदिया हर जगह माता नहीं कहलाती।

जबकि वैज्ञानिक पद्धति की बात करें तो समंदर का पानी पीकर हम जी नहीं सकते। क्योंकि हम समंदर के जीव नहीं हैं।

प्रकृति जीव का माता कैसे? How is nature the mother of the creature?

जमीन से जो पानी निकलता है वह पानी भी उसी नदी का पानी होता है जो मीठा है।

एक दृष्टि से देखें तो उस पानी के ऊपर हमारा जीवन है। वह पानी है तो हमारा जीवन है और यदि कोई पानी नदी बनकर हमें जीवन देती हो। विश्व जल रुपी प्रकृति ने हमें जन्म दिया हो उसे माता कहने में क्या हर्ज है।

कहा जाता है हिंदू धर्म अंधविश्वास की पराकाष्ठा है। ऐसा कहने वाले को हिंदू धर्म के अंदर आस्था नहीं दिखता।

हिंदू धर्म सब को सम्मान करता है। हिंदू धर्म वह धर्म है जहां देवता और दैत्य दोनों पूजे जाते हैं।

सनातन धर्म कहता है प्रकृति हमारी माता है। यह प्रकृति है तो हम हैं और यदि प्रकृति नहीं तो हम भी नहीं।

जो व्यक्ति प्रकृति के विपरीत सोचते हैं वह प्रकृति को सम्मान नहीं करते।

उदाहरण के लिए हर सनातनी वृक्ष को देवता का स्वरूप मानते हैं।

भारत में एक मशहूर वृक्ष पाया जाता है जिसका नाम पीपल। पीपल के वृक्ष के ऊपर आज का विज्ञान कहता है।

धरती पर वह स्वयं इतना विशाल पेड़ है जो रात और दिन दोनों समय सिर्फ ऑक्सीजन हवा छोड़ता है। ऑक्सीजन के ऊपर हमारा जीवन है। पर्यावरण के बारे में विचार करने वाले व्यक्ति रात दिन यही बात कहते हैं पर्यावरण का संरक्षण अपनी मानव संस्कृति को बचाने के बराबर होगा। भारत में पीपल के वृक्ष को देवताओं में सब श्रेष्ठ भगवान विष्णु समझकर पूजा जाता है।

धरती पर जो भी जीव है वह सब ऑक्सीजन के ऊपर आश्रित हैं। हम सांस लिए बगैर कुछ क्षण भी जीवित नहीं रह सकते।

हमारे ऊपर माता प्रकृति का कितना बड़ा उपकार है। माता प्रकृति हमें जन्म देने के उपरांत रात दिन हमारे संरक्षण में लगी हुई है। जिस प्रकृति ने हम जिवों की उत्पत्ति किया है ,क्या वह माता कहलाने का हकदार नहीं है।
जो देवता पीपल का वृक्ष बनकर हमारे कल्याण के लिए सिर्फ ऑक्सीजन हीं दे रहा है। जो पेड़ एक पिता की भांति हमारा संरक्षण कर रहा है क्या वह पिता कहलाने के लायक नहीं है।

वैदिक सिद्धांत अपने आप में एक प्रमाणित सिद्धांत है। वैदिक सिद्धांत का अनुकरण समस्त विश्व समुदाय करता है।

धरती पर अनेक विज्ञान महामानव ने बनाएं। उन्हीं विज्ञान में सर्वश्रेष्ठ और विशाल विज्ञान हैं वैदिक विज्ञान।

विज्ञान आज जिस वस्तु को अपने से दूर कर रखने की बात करता है। वैदिक सिद्धांत हजारों साल पहले हीं उसे अपने से दूर रखने का सिद्धांत बना चुका रहता है।

भारत के संस्कृति में भारत का सबसे बड़ा संपत्ति भारतीय वैदिक सिद्धांत है।

सनातन धर्म ऐसे ही सनातन नहीं कहा जाता। सनातन पद्धति में जीवन के हर क्षण को नजदीक से अध्ययन किया है।

भारत को माता कहने में किसी को तकलीफ होता है।

जो भूमि जीने के लिए रोटी देता हो, जो भूमि जीने के लिए जल देता हो,जो भूमि जीवन के लिए हवा देता हो। जिस भूमि ने प्रकृति का इतना बड़ा साम्राज्य अपने ऊपर रख रखा है। क्या वह भूमि माता कहलाने के हकदार नहीं हैं?



इस प्रकार प्रकृति हमारी माता है उसी प्रकार प्रकृति की माता पृथ्वी है।

इस पृथ्वी की माता को हम ब्रह्मांड कह सकते हैं। धरती पर समस्त जीव की माता प्रकृति नहीं तो और कौन हो सकता है।

अन्न खेत से उत्पन्न होता है। खेत अपना जीवन दाता भूमि है। वह खेत प्रकृति है । उस खेत से हम अपना जीवन यापन करते हैं। हमारे खाने वाले अन्य का माता हमारा खेत है।

यह कोई भावना नहीं है। इसे किसी भी प्रकार अंधविश्वास नहीं कहा जा सकता।

यदि किसी मानव ने अपने चिंतन में इस प्रकृति और धरती को बनाने वाले के रूप में देख लिया हो। तो उसनें ऐसा कौन सा गुनाह कर दिया। यहां उसका अपना श्रद्धा है, उस व्यक्ति का इस समूचे प्रकृति के लिए एक सम्मान है।

जिस व्यक्ति ने सोचा! चिंतन किया, कि हमारा परमेश्वर ऐसा होना चाहिए। हमारे परमेश्वर का रूप ऐसा होगा।

इस प्रकार का वह चिंतन करता है ध्यान करता है। वह उस रूप को एक साकार रूप में परिवर्तन कर सामने बिठाता है तो उसमें उसका क्या गुनाह। सनातन पद्धति में सबसे खास बात है। कोई व्यक्ति अपने द्वारा माने हुए ईश्वर को दूसरे के ऊपर नहीं थोपता।

उस सनातन पद्धति वाले व्यक्ति के अंदर यह खास कला है।

वह अपने परमेश्वर को हर रूप में देखता है। सनातन पद्धति में जो ऋषि मुनि अथवा महामानव हुए उन्होंने जिस पद्धति को उत्तम पाया उसे समाज के सामने प्रकट किया। समाज वैसे महापुरुष को पिता के रूप में दर्जा देता है। सनातन धर्म में किसी रूप को मानने की कोई बाध्यता नहीं है। जिसका कुछ फायदा जो पूरी तरह से धर्म के विपरीत हैं वे लोग उठाते हैं।

सनातन पद्धति कहता है वह परमेश्वर ऐसा नहीं है जो सिर्फ एक को ही दिखेगा।

वह परमेश्वर किसी एक का गुलाम नहीं हो सकता। जो भी व्यक्ति उस परमेश्वर को जिस रूप में भी भजन करें।जिस रूप को मान और श्रद्धा दें वही रूप में वह परमेश्वर कल्याण करेगा। संसार में परमेश्वर को पाने के लिए और अनेकों पद्धति हो सकते हैं।

संसार में परमेश्वर को पाने के लिए अनेक पद्धति भी है। सभी पद्धति अपने आप में खास हो सकते हैं।

परंतु सनातन पद्धति अपने आप में खास है। सनातन में सबसे खास है कि यह सभीं पद्धति को स्वीकार करता है।

यही सनातन सिद्धांत है कि भारत में प्रकृति को माता कहा जाता है। प्रकृति को माता कहना किसी भी प्रकार से हास्य का विषय नहीं हो सकता।

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हम हर जगह प्रकृति के गुलाम हैं। व्यक्ति जिस शरीर के अंदर रहकर उत्पात मचाता है अपना शरीर भी प्रकृति है। सभी अपने आप से अपने शरीर के अंदर शरीर के लिए गुलाम हैं।

यह मानव शरीर सदैव से सदैव के लिए इस प्रकृति का गुलाम है। हम जीव प्रकृति के ऊपर पूरी तरह से आश्रित हैं।

यह प्रकृति हर क्षण हमें जीवन दे रही है। इसलिए यह प्रकृति पूरी सम्मान के साथ हम मानव समाज की माता हैं।

2 thoughts on “प्रकृति जीव का माता। Jivan ka Aadhar prakriti.

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