अतुल्य भारतीय कौशल – भारत के व्यापार और व्यापारी। क्या व्यापारी जनता नहीं हो सकता?

व्यापारी समाज में एक मशहूर कहावत है।” संसार में सब कुछ बिकता है बशर्ते की उसे समझ कर बोली लगाने वाला चाहिए।”


सब कुछ बिकता है कहने का अर्थ यह नहीं होता कि व्यक्ति अपनी खुशियों को बेच देता है। व्यक्ति अपने सम्मान को बेच देता है, ऐसा नहीं होता जिसे बिकना होता है वह स्वयं अपनी कीमत जानता है।



किसी वस्तु का कीमत लगाने से पहले यह सोचना होगा कि सामने वाला उसका वास्तविक कीमत क्या ले सकता है।

भारत के व्यापार और व्यापारी का कौशल दुनिया में मशहूर है।समाज बहुत बड़ा है और समाज में प्रत्येक व्यक्ति के पास जीवन को जीने के लिए अपना सूझबूझ है। इन सबके बावजूद हर व्यक्ति अपने जीवन के अंदर महत्व अलग-अलग प्रकार से देता है। कोई व्यक्ति खाने को महत्व देता है, कोई पहनने को महत्व देता है, तो कोई आनंद पूर्वक जीने को महत्त्व देता है। कोई एक ऐसा भी है जो जीने के लिए अपने हठ को महत्व देता है।



इस वजह से हर व्यक्ति हर एक सामने वाले का कीमत नहीं लगा सकता।

यहां कारण यही बनता है कि उस  व्यापारी को यह पता नहीं है कि सामने वाला अपने अंदर कौन से विषय को महत्व देता है।
प्राचीन इतिहास से यह पता चलता है हर युग में व्यापार होते रहे हैं और होते रहेंगे। हमारे अपने समाज के अंदर से व्यापारी सदैव निकलते रहेंगे।


व्यापारी समाज में एक और कहावत है   “दुनिया में हर चीज संभव है कुछ भी असंभव नहीं। क्या यह वाकई सत्य बात है।”


निश्चित तौर पर यह सत्य बात है। कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है। व्यक्ति किस असंभव चीज को संभव करना चाहता है और उसके लिए उसे क्या-क्या छोड़ना पड़ेगा, यह उसे समझना होगा। अर्थात आज उसके पास क्या-क्या है और जब संभव होगा तो उसमें से क्या-क्या नहीं रहेगा। इसके ऊपर निश्चित करता है कि असंभव होने वाला संभव कैसे होगा, कितना होगा।

व्यक्ति के अंदर दुनिया में सिर्फ एक ही लक्ष्य हो तो उसके पूरा होने का संभावना बहुत होता है।

लक्ष एक से जितना अनेक होगा ,उतना ही उसे संभव होने का संभावना कम होगा।



उदाहरण के लिए एक सरल बात है।

क्या वह पत्नी को खुश करने के लिए मां को नाराज कर सकता है।

और यदि व्यक्ति कर सकता है तो निश्चित तौर पर पत्नी को खुश कर देगा। यहीं पर यदि मां को खुश करना हो तो क्या व्यक्ति पत्नी को नाराज कर सकता है। और यदि व्यक्ति पत्नी को नाराज कर सकता है तो निश्चित तौर पर मां को खुश कर देगा। यहां उदाहरण पर चिंतन की आवश्यकता नहीं है यह वास्तविक सच्चाई है। व्यक्ति के अंदर अपना समझदारी कैसा है।

वह अपनी खुशियों के लिए किसका बलि चढ़ा सकता है।

यह तो वह समझदार व्यक्ति ही स्वयं निश्चित करता है। व्यक्ति यदि संतुलित होगा, व्यक्ति को यदि मां और पत्नी दोनों चाहिए तो निश्चित तौर पर उसे दोनों तरफ समझौता करना पड़ेगा। अब उस समय अथवा उस व्यक्ति के ऊपर निर्भर करता है कि व्यक्ति के अंदर प्राथमिकता में कौन हैं।

व्यापार करने वाले के लिए भी यही नियम लागू होता है।

एक व्यापारी अपनी सोच के बुलंदियों पर पहुंचने के लिए अपने किन किन सिद्धांतों का बलि दे सकता है। एक व्यापारी अपनी चाहतों को पूरा करने के लिए अपनी किन चाहतों को कुर्बान कर सकता है। यह तो व्यापार करने वाला व्यापारी ही समझता है।

वह जमाना चला गया जब संसार में बंधुआ मजदूर हुआ करते थे। अब तो सब स्वतंत्र है कुछ भी सोच सकते हैं।

किन व्यक्ति को क्या पाना है और उसे पाने के लिए क्या क्या खोना होगा।

यदि एक व्यक्ति कुछ पाने के लिए अपना बहुत कुछ होने को तैयार हैं तो निश्चित तौर पर वह उसे मिलेगा।
भारत में कौशलता की कमी नहीं है। यहां के आम जनमानस में कौशलता तो कूट-कूट कर भरा हुआ है।



इसी भारत में एक समय था जब सरकारी नौकरी लाइन में लगकर मिला करते थे। उस समय नौकरी था पर उसे करने के लिए चाहत का कमी था। उस समय इतना अधिक की संख्या में जनसंख्या भी नहीं था।

आज आम जनमानस में नौकरी करने की चाहत भी है, प्रचुर मात्रा में नौकरी करने के लिए व्यक्ति भी हैं परंतु आज वह समय नहीं है।

आज के समय नौकरी के लिए सिर्फ योग्यता की जरूरत नहीं है। आज के समय नौकरी को जीतने के लिए भी योग्यता की आवश्यकता है। और इस प्रकार का योग्यता हर व्यक्ति के अंदर होते हुए भी नहीं होता।

समाज में संघर्ष अनेक प्रकार के होते हैं। व्यापार में भी संघर्ष होता है और व्यापारी के अंदर भी संघर्ष होता है।

प्रत्येक व्यक्ति संघर्षों को भी अपने अनुसार से महत्व देता है। हर व्यक्ति के अंदर हर प्रकार के संघर्ष करने का क्षमता नहीं होता।


संघर्ष व्यक्ति को जीवन में मजबूत बनाता है।

जो व्यक्ति संघर्ष से डरते हैं वह मैदान छोड़ कर बैठ जाते हैं। भारत में कौशल का विशेष है और इसे सरलता से समझ सकते हैं। भारतीय अपने देश में तो हर प्रकार के व्यापार करते हैं इसके साथ अभी आज के समय विदेशों में भी अनगिनत उत्तम व्यापारी है।

आज नए युग में नौकरी करना भी एक व्यापार ही जैसा है।

क्योंकि व्यक्ति आज के समय नौकरी को जीतने के लिए जो तत्व लगाता है वह भी उस तत्व को पाने के लिए ही होता है।
जिसने नौकरी को भी अपने बुद्धि कौशल के जरिए नहीं वस्तु कौशल के जरिए जीता हो वह निश्चित तौर पर पहले एक व्यापारी है।

जिसने कुछ देकर कुछ लिया हो वह जहां भी रहेगा वह व्यापार में संतुलित रहेगा।

जो धन देकर शांति खरीदते हैं वह भी व्यापारी ही है। आज समाज में धन लेकर जो शांति देते हैं वह भी व्यापारी हीं हैं। इसीलिए सनातन साहित्य में कर्म और अकर्म की बात कहा गया है।

यदि वेद शास्त्र अपने शब्दों में जो कहते हैं उसे सरल भाषा में कहा जाए तो कोई भी ऐसा कार्य अनैतिक माना जाएगा।

जिस कार्य से संसार में किसी भी एक जीव अथवा संसार में किसी के भावनाओं को ठेस लगे। किसी व्यक्ति के द्वारा किसी की भावनाएं आहत हो। किसी के द्वारा समाज का अहित हो वह सभीं अनैतिक है।

व्यापार में भी श्रीमद्भागवत गीता के शब्दों का बहुत बड़ा महत्व है। कर्म को करने के लिए डरो नहीं, आगे बढ़ो और भली-भांति कर्म करो। यदि भली-भांति करोगे तो निश्चित तौर पर तुम्हारे द्वारा होगा।

एक व्यापारी के अंदर लालच होना स्वाभाविक बात है। समाज को चलाने के लिए किसी भी एक सरकार की जरूरत होता है। सरकार की जरूरत को पूरा करने के लिए व्यापार है। सरकारी कभी व्यापार नहीं करता उसके बावजूद अधिकांश सरकारी व्यक्ति व्यापार ही करता है।

व्यापार वह नहीं है जो सिर्फ दिखता है। यदि व्यापार की परिभाषा करने गए तो इसके ऊपर एक बहुत बड़ा ग्रंथ लिखा जा सकता है।

कहीं भी कोई भी व्यक्ति अपने जरूरत से ज्यादा धन को एकत्र करने के लिए जो अपने पास की पड़ी हुई कोई बहुमूल्य वस्तु को दांव पर लगाता है, वह सब व्यापार है। अक्सर एक सरकारी नौकरी पेशा व्यक्ति भी कुछ पाने के लिए अपनी नौकरी तक को दांव पर लगा देते हैं। ऐसी स्थिति में कभी-कभी व्यापार में घाटा भी हो जाता है।

एक सभ्य व्यापार के लिए सभ्य समाज और सभ्य सरकार की आवश्यकता होता है।

इस प्रकार का सभ्य समाज! समाज के प्रत्येक व्यक्ति के योगदान से बनता है। इन सब जगहों पर समाज से सभ्य का क्या आधार है यह बहुत बड़ा विषय है।



जीवन को जीने के लिए एक चींटी भी संघर्ष करती है। उसे भी हर जगह अपनी जान का खतरा होता है।

और यह भी सत्य है कि हर व्यक्ति अपने सामर्थ्य अनुसार पूरा सामर्थ लगाता है। अपने अंदर की कमी को व्यक्ति भली-भांति नहीं समझ पाता और दूसरे को दोष लगता है।

समाज को समाज के प्रत्येक व्यक्ति की पूरी आवश्यकता है ,वह किसी भी जाति धर्म समूह अथवा वर्ग के क्यों ना हों।

आज सभी एक साथ हैं तभी इतना विशाल समाज बना। यदि इस प्रकार ऐसा नहीं होता तो ,मानव! आज समूह में नहीं होते और शायद आज भी जंगलों में रहकर जानवरों का शिकार कर रहे होते।

बुरा कर्म तो कोई भी व्यक्ति स्वयं से कर सकता है परंतु अच्छा करने की प्रेरणा और अच्छा करने की बाध्यता समाज देता है।

व्यापार शब्द संतुलन देता है, वह संतुलन जिसका हर जगह आवश्यकता है। हर घर में, हर गांव में , हर शहर में‌ तथा हर व्यक्ति के अंदर आवश्यकता है।

हर व्यक्ति के अंदर अच्छाई और बुराई दोनों हैं। जिसके अंदर बुराई ज्यादा है तो वह बुरा है और जिसके अंदर अच्छाई ज्यादा है वह अच्छा है।

यह समाज तय करता है तराजू का पलड़ा किस तरफ भारी है। यह समाज ही तय करता है ,एक उत्तम शब्द को कौन से उत्तम श्रेणी में रखा जाए।

वास्तव में व्यापार तो हौसलो की होनी चाहिए अपने सैद्धांतिक, नैतिक विचारों  की नहीं।

2 thoughts on “व्यापार और व्यापारी का कौशल दुनिया में मशहूर है। Bhartiya Vyapar aur vyapari

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