प्रकृति प्रेम यात्रा की- मानव जीवन में कुछ पाने की आशा। हिंदू धर्म में जीवन।

क्या मानव जीवन में पनपने वाले आशा का अंत हो सकता है।एक बच्चा जब से जन्म लेता है, तब से उस बच्चे के अंदर एक आशा का बनना शुरू हो जाता है,” आशा कौन सी आशा!”
कुछ पाने की आशा कुछ बनने की आशा। एक बच्चे के अंदर नाना प्रकार के आशाएं जागृत हो जाती है, छोटी-छोटी आशाएं, छोटे-छोटे खिलौने के रूप में। उसी छोटे से बच्चे के अंदर आशाओं के पीछे, उसे खोने का डर, उसे छिंन जाने का डर।

प्रत्येक दिन हर घंटे छोटी बड़ी आशाओं का जागृत होना, और कुछ का टूट जाना तथा कुछ को पा जाना।

बचपन की यह बातें सब जानते हैं समझते हैं। सभी के जीवन में इस प्रकार की घटनाएं घटित हुई है और सामने घटित हो रही है। और यह नित्य निरंतर चलता रहेगा, हम सब समझते हैं और यह कहते भी हैं, कि उस समय बचपना था, अथवा यह कहेंगे कि बच्चे का बचपना है।



जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है वैसे वैसे उसकी आशाएं बड़ी होती जाती है, पहले वह खिलौनों में खेलकर शांत हो जाता था, पर अब उसे खिलौना नहीं

वास्तविक खेल चाहिए। वह आए दिन नए सपने बुना करता है ।

उस सपने को कैसे सच करें इस प्रयास में नित्य निरंतर लगे रहता है। ऐसा नहीं है कि सपने देखना गुनाह है, वास्तव में मैं कहूं की जागृत अवस्था में सपने न देखना व्यक्ति के बस की बात नहीं, कारण व्यक्ति का मन सपने देखने पर मजबूर करता है।

यदि स्थिति के अनुसार, बुद्धि के जरिए सपने बनाए जाएं, तो व्यक्ति के लिए इस प्रकार की सपने अथवा आशाएं लाभप्रद हो सकता है।

ठीक  वैसा हीं जैसे व्यक्ति बुद्धि के जरिए थोड़े आनंद के लिए, बहुत ही अल्प मात्रा में मद्यपान का सेवन करता है। इस स्थिति में अल्प मद्यपान व्यक्ति को आनंद दे जाता है।

परंतु वह किसी प्रकार भी उस व्यक्ति को भ्रमित नहीं करता।

दूसरी स्थिति में देखा जाए तो जिस व्यक्ति ने, मन की भावनाओं में बहकर, रोज की आदि स्वरूप में यदि मद्यपान का सेवन करता है, तू इस स्थिति में मद्यपान उस व्यक्ति को भ्रमित कर जाता है, और आनंद के रूप में अभी बात करें वह आनंद बहुत ही अल्प मात्रा में होता है जो मात्र शरीर महसूस करता है।

जब वह व्यक्ति नशे से बाहर होता है, तो उसे वह बिना आनंद का जीवन तकलीफ में होता है।

उस स्थिति में उसका कारण है, की नशा उस समय शरीर करने लग जाता है, और जब नशा नहीं मिलता तो शरीर असंतुलित रहने लगता है।



सपने अथवा आशा में भी ऐसा ही होता है, जब व्यक्ति सपने अथवा आशाओं की कल्पनाआओं में इस कदर डूब जाता है।

जब उसे अपने वास्तविकता का भान ना हो, ऐसी स्थिति में, मन के ऊपर मस्तिष्क का कंट्रोल नहीं रहता, जिस कारण व्यक्ति अपनी आशाओं को पूरा करने में फेल हो जाता है।

इस बात को हम एक और तरीके से समझ सकते हैं, हर व्यक्ति के अंदर दिमाग है, उसके अंदर हर प्रकार की बुद्धि जागृत है, उसके बावजूद, जब शरीर मन के द्वारा बुद्धि पर हावी हो, तो वैसी स्थिति में सब प्रकार की बुद्धि रहते हुए भी, बुद्धि अथवा कहे दिमाग अपना असर नहीं दिखा पाता, और वह उस क्षण अथवा समय के लिए फेल हो जाता है।

युवावस्था में व्यक्ति अपने दिमाग से परे हटकर मन की भावनाओं में भटकते भटकते इतना दूर निकल जाता है, कि बहुत बार ऐसा देखा गया है, कि वह स्वयं उससे पीछे नहीं आ पाता।

जबकि वास्तव में उस युवा के पास जीने के लिए हर प्रकार की बुद्धि का भंडार है, परंतु वह पूर्णतया उसके काम नहीं आता, और वह अपूर्णता की जिंदगी जीने पर बाध्य रहता है।



वृद्धावस्था में भी इसी प्रकार की स्थिति उत्पन्न रहता है, व्यक्ति के पास बुद्धि होता है।

मन के ऊपर बहुत हद तक बुद्धि का कंट्रोल भी रहता है, परंतु आशाएं यहां भी उसका पीछा नहीं छोड़ता, जबकि वह स्वयं जानता है की आशाओं को पूरा करना अब उसके बस की बात नहीं।

वह अनजाने में इस प्रकार की आशाएं करता है, जो उसकी सोच के दायरे से बाहर हो।

सोच का दायरा अर्थात अपने बच्चों से उम्मीदें। इसको और गहराई से सोचें, तो बच्चे हमारी दुनिया में हैं पर बच्चे के दुनिया में हम नहीं। बच्चे की अपनी एक नई दुनिया है, जो सिर्फ अपने सपने के लिए जीना जानता है।

बच्चा हमारे सपने को समझता तो है, हमारे आशाओं को जानता भी है।

परंतु हमारे सपने और आशाओं को वह स्वीकार नहीं कर सकता, अथवा यूं कहें कि किसी भी स्थिति में हमारी सपने को बच्चे अपना सपना नहीं मान सकते। अथवा सीधी दृष्टि में कहे कि हम किसी को भी, अपना सपना मानने के लिए बाध्य नहीं कर सकते।



मानव जीवन कुछ पाने की आशा लिए, अपना जीवन शुरू करता है।

पूरी उम्र अपने आशाओं को पूरा करने के लिए संघर्ष करता है, और अंत समय में अधूरे सपने, आशाएं, और कल्पनाओं में अपने शरीर को छोड़ जाता है। इसलिए सनातन धर्म, प्राचीन महामानव, अथवा प्राचीन इतिहास यह सदैव कहते रहा है।

आशा एक करो अपने इष्ट की आशा करो, ईश्वर से प्रेम करो, जीवन की जरूरी चीजों को पाने के लिए, आखरी दम तक कर्म करो। यही है प्रकृति प्रेम यात्रा की।

दुनिया एक सपना है,
सपने में सब जीते हैं,
और सपने में ही मर जाते।
काश व्यक्ति का एक ही सपना होता,
जो पूरा होने के बाद भी खत्म ना होता।
फिर तकलीफ न यूं जीने में होता।
सपने ही आनंद देते हैं,
पर सपने ही दर्द भी दे जाते हैं,
सपने तो सपने होते हैं ,अधूरी प्यास
कुछ पाने की आशा।

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