भक्ति कैसे करें? हिंदू धर्म में भक्ति की परिभाषा। सनातन धर्म में भक्ति कैसे हो।

हिंदू धर्म में भगवान की भक्ति कैसे करें?अपने तथा अपनों को लेकर समस्त संसार पर एक परमेश्वर का ही अधिकार है। परमेश्वर हर प्रकार से सक्षम है और परमेश्वर का तुलना कोई नहीं कर सकता।

परमेश्वर ने हमें बनाया और हमारे लिए यह समस्त संसार बनाया इस बात को अपनी भावनाओं के जरिए स्वीकार कर लेना यही परमेश्वर भक्ति है।

अर्थात यह मन में भरोसा हो जाना कि उस परमेश्वर के सिवा संसार में कोई और सर्व सक्षम है ही नहीं।



जब तक यह नहीं हो जाता तब तक के लिए ही भक्ति की अनेकों क्रियाएं बताया गया है। क्योंकि परमेश्वर का आधिपत्य स्वीकार के बाद कुछ शेष नहीं रह जाता।

जब तक अंतःकरण में इस प्रकार का दृष्टि ना हो जाए तब तक जो क्रिया किया जाता है उसे साधना कहते हैं।


आज के समय भक्त अनेकों प्रकार की चर्चाएं करते हैं परमेश्वर के बारे में। वास्तव में देखें तो परमेश्वर का सत्ता कहां नहीं है। बिना ऑक्सीजन के हम कुछ क्षण भी जीवित नहीं रह सकते। यदि व्यक्ति पृथ्वी की कक्षा से बाहर निकल जाए तो वह किसी प्रकार गति भी नहीं कर सकता।

पृथ्वी पर जितने भी तत्व गतिमान हैं सब उस शक्ति से ही गतिमान है। परमेश्वर का एक छत्र सत्ता स्वीकार कर लेना ही परम भक्ति है।



अब परमेश्वर की सत्ता को स्वीकार करने में कितना समय लगता है यह भक्त के ऊपर निर्भर करता है।

क्योंकि भक्त ने अपने ऊपर भावनाओं का विशाल जाल बुन रखा है । जिस जाल से निकल पाना अत्यंत कठिन है।

सनातन साहित्य कहता है “मन ही संसार है और मन ही बंधन है।” यदि विचार करें तो पता चलता है की अनेक भावना से निकलने के लिए कुछ और भावनाओं का जाल अपने ऊपर ओढ़ लेना ऐसा नहीं होता ।

परमेश्वर कहीं दूर नहीं रहता परमेश्वर तो मौत के सदृश्य है। जहां हम हैं परमेश्वर भी वहीं मौजूद है।

भक्त के अंदर भावनाओं से छूटने की बेचैनी कितना है और परमेश्वर से मिलने का तड़प कितना है? यह निर्भर करेगा कि परमेश्वर से मिलन कब होगा।

जिस प्रकार संसार के सभी प्रकार के कर्म अपने द्वारा ही किए जाते हैं। उसी तरह परमेश्वर प्राप्ति में लगने वाले सामर्थ्य को स्वयं ही करना होगा। परमेश्वर की भक्ति में लगे हुए भक्तों को विचार करना होगा कि वह भावनाओं का जाल को कैसे तोड़ पाए।

परमेश्वर को कुछ अर्पण करना यह परमेश्वर के लिए अपना भावना है।

जबकि परमेश्वर को हम कुछ दें, इस प्रकार का भावना परमेश्वर का नहीं हो सकता।
समस्त संसार एक परमेश्वर का गुलाम है वह किसी का गुलाम नहीं। परमेश्वर को कोई क्या दे सकता है।



ऐसा नहीं है कि श्रद्धा में परमेश्वर को जो कुछ अर्पण किया जा रहा है वह गलत है।

जो कुछ भी आप अर्पण कर रहे हो वह परमेश्वर सब देख रहा है।

वह परमेश्वर यही चाहता है की सामग्री के साथ भक्त अपनी भावनाओं को मुझे सौंप दें। सभीं प्रकार के भावनाओं का मेरे लिए त्याग कर दे।

हर जीव के अंदर जो आत्मा है वह परमात्मा का शक्ति है। संसार के हर तत्व में अपना एक गुण है वह गुण परमेश्वर का शक्ति है।

यदि व्यक्ति चिंतन में ले तो परमेश्वर हर जगह दिख जाएगा। एक भक्त अपने सांसारिक भावनाओं से ऊपर नहीं उठ पाता।भक्ति में यह सबसे बड़ा बाधक है। वास्तव में परमात्मा की स्वीकार्यता ही भक्ति है।

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s