गुरु और सद्गुरु में क्या अंतर है। हिंदू धर्म में गुरु कैसा हो। सनातन धर्म गुरु के लिए क्या कहता है।

गुरु से भी सद्गुरु महान क्यों होता है? इसे सरल भाषा में समझने के लिए सबसे पहले यह समझना होगा कि गुरु किसका। गुरु का व्याख्या बहुत लंबा हो सकता है ।

जिसके द्वारा हम कुछ भी सीखें अथवा जो कोई भी हमें कुछ सिखाएं वह सब गुरु हैं।

माता को गुरु कहां गया है पिता को भी गुरु कहा गया है। शिक्षक को गुरु कहा गया है। आज के दिन शेयर ब्रोकर जो शेयर के बारे में ज्ञान देता है वह भी गुरु है।

इन सब से अलग एक आध्यात्मिक गुरु होता है जो संसार से निकलने और परमात्मा से मिलने का मार्ग दिखाता है।

आध्यात्मिक दृष्टि से अध्यात्म का कोई भी गुरु यदि सांसारिक भोगों के प्राप्ति का मार्ग बताता है तो वह वास्तविक गुरु नहीं हो सकता। क्योंकि धन का अर्जन मार्ग बताने वाला धन का गुरु हो सकता है परंतु अध्यात्मिक गुरु नहीं हो सकता। यदि उन गुरु के अंदर आप झांक कर देखो तो आपको पता चलेगा कि वह स्वयं ही संसार में बंधा हुआ है।

जो गुरु अध्यात्म की कुर्सी पर बैठकर संसार के भोगों में लिप्त करने वाला है।

जो सुख और दुख को देने वाले विषय हैं उन विषयों में रमन करवाता है। वह अध्यात्म का वास्तविक गुरु कैसे हो सकता है?

आज के समय ऐसे संसार से मोहित गुरु अपने शब्दों के जरिए हर बार यही कहते हैं कि अमुक शास्त्र कहता है।

शास्त्र कहां क्या-क्या कहता है आज के युग में सबको पता है। आध्यात्मिक गुरु अपना क्या कहते हैं यह विचारणीय बात है। आज के समय आध्यात्मिक गुरुओं का एक विचार है जितने शिष्य बढ़ जाए उतना बढ़िया है।

आज के समय जिसके पास जितना अधिक शिष्य है उतना बड़ा गुरु है। एक बार गए और सदा के लिए बंध गए।

अब आप छोड़ नहीं सकते हो ।कल आपकी इच्छा हो जाए कि मैं दूसरे गुरु के पास चला जाऊं ऐसा हो नहीं सकता ।

गुरु भक्ति के लिए तो बहुत लंबी चौड़ी व्याख्या शास्त्रों में मिलेगा। परंतु यदि कोई लोभी गुरु मिल जाए तो उसे छोड़कर निकलने के लिए कोई शास्त्र में नहीं मिलेगा।

सनातन साहित्य में संकल्प का बहुत बड़ा स्थान है। वास्तव में देखा जाए तो बिना संकल्प के कुछ भी नहीं हो सकता। सनातन में जितने भी पूजन क्रिया तथा कर्मकांड है सभी बिना संकल्प के नहीं हो सकता।

संकल्प की बात है तो व्यक्ति को विचार करना होगा की संकल्प क्यों?

यदि सांसारिक सुख चाहिए तो संसार में संकल्प करके बंध जाए बहुत अच्छा है। परंतु जिसने मोक्ष के लिए सांसारिक संकल्प किया हो वह संसार को कैसे छोड़ सकता है।

जो भी पूजा पाठ करता है सभीं को भक्त कहा जाता है, वास्तव में उसे यह भी सोचना पड़ेगा कि वह भक्त किसका है।

सभी प्रकार के पूजन में संकल्प अपने लिए करता है और ख्वाब परमेश्वर को पाने की देखता है।

गुरु भगवान के पास जाने के लिए मार्ग दिखाता है। गुरु भगवान के पास जाने के लिए नाना प्रकार के कर्म क्रिया बताता है और साथ में पूजन अपना करवाता है ।वह वास्तव में परमात्मा का भक्त नहीं हो सकता।

निश्चित तौर पर कहा गया है कि परमेश्वर का भक्त परमेश्वर के सदृश्य हो जाता है। परंतु कोई भी भक्त परमेश्वर की भक्ति करके परमेश्वर नहीं बन जाता। जो कोई भी परमेश्वर का वास्तविक भक्त है वह अपने आप को भगवान के बगल में नहीं रख सकता।

संक्षेप में कहें तो आध्यात्मिक गुरू संसार से छुड़ाने वाला होता है संसार में बांधने वाला नहीं होता।

यहां किसी भी गुरु का तिरस्कार करने का बात नहीं कहा जाता। वह गुरु हो सकता है और गुरु है ।परंतु वह कौन सा गुरु है यह विचारणीय बात है। सद्गुरु कौन है और वह किस प्रकार से लाभ पहुंचा सकता है यह तो वास्तव में भक्त स्वयं विचार करें तो ज्यादा उत्तम होगा।

क्योंकि इतिहास गवाह है जिसे जो चाहिए वह उसके पीछे जाता है। जीसे जो नहीं चाहिए उसे वहां कोई बांध भी नहीं सकता।

कोई किसी को बांधने का प्रयास कर सकता है बांध नहीं सकता । मन को बांधना अपने बस में नहीं है तो वह दूसरे के बस में कैसे हो सकता है।

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