वैदिक पूजन क्या है। भक्ति में क्या पूजन आवश्यक है। हिंदू धर्म और पूजन। सनातन धर्म पूजन एक दर्शन दो।

क्या भगवान को पाने के लिए पूजन आवश्यक है? वैदिक पूजन और भक्ति पूजन दोनों अलग-अलग है। वैदिक अनुष्ठान सभी एक नियम के तहत होता है। वैदिक परंपरा का एक आधार रखा गया है। वैदिक पूजन में संकल्प आवश्यक है।

बिना संकल्प का कोई यज्ञ पूजन नहीं हो सकता।

छोटे से छोटा पूजन अनुष्ठान हो अथवा बड़े से बड़ा महायज्ञ हो सबके लिए संकल्प आवश्यक होता है। क्योंकि संकल्प के वगैर किसी प्रकार का पूजन फल प्राप्त नहीं होता। इस प्रकार शास्त्रों में कहा गया है।

वैदिक पूजन अनुष्ठान उनके लिए कहा गया है जो संसार में कुछ पाना चाह रहे हो, अथवा जिन्हे ने स्वर्ग की प्राप्ति करनी हो।

सीधे शब्दों में कहें तो जिन्हें धर्म अर्थ और काम इन सब की प्राप्ति करनी हो तो पूजन क्रिया मुख्य है। वैदिक पद्धति में देव का प्राण प्रतिष्ठा होता है, प्राण प्रतिष्ठा का अर्थ यह होता है की जो परमेश्वर निराकार रूप में है उस परमेश्वर को एक रूप देकर उन्हें अपने समक्ष प्रस्तुत करते हैं।

चुकी पूजन क्रिया मे संकल्प होता है इसलिए प्राण प्रतिष्ठित देवता का किसी भी प्रकार अनादर को बहुत बड़ा दोष माना गया है।

जिस प्रकार यज्ञ के लिए एक नियम कानून होता है वैसा ही प्राण प्रतिष्ठित देवता के लिए पूजन का एक नियम विधि होता है। जिसका शास्त्रों के अनुसार पालन आवश्यक है। जो देवता प्राण प्रतिष्ठित न हो उसमें इस प्रकार का दोष नहीं लगता।



इन सबसे अलग परमेश्वर की भक्ति में बिल्कुल अलग नियम है।

या यूं कहें कि परमेश्वर की भक्ति के लिए कोई नियम ही नहीं है। कुछ रिती रिवाज को जो मानने वाले है व्यक्ति हमारे इस बात को आश्चर्य रूप में लेंगे। कहीं कहा जाता है की परमेश्वर का नाम इस स्थिति में नहीं ले सकते, अमुक व्यक्ति परमेश्वर का नाम नहीं ले सकता। परंतु उदाहरण के तौर पर परमेश्वर की भक्ति इसीलिए है कि वह अपने भावनाओं का जाल तोड़कर परमेश्वर को पास जा सकें।

जब व्यक्ति को मृत्यु निकट आए तो उसे परमात्मा के सिवा और कुछ भी याद न हो।

वास्तव में व्यक्ति के अंदर पूजन क्रिया का इतना बड़ा जाल है कि वह इस सोच में ही पड़ा रहता है कि कब वह शुद्ध है और कब अशुद्ध है। इसका नियम बंधनें और पूरी तरह से जानते जानते बहुत देर हो चुका होता है।

जबकि एक साधारण बात है ,जितने भी नियम कानून है सभी पूजन के लिए है। यज्ञ के लिए है, कुछ पाने का उद्देश्य है उसके लिए।

कोई यह कहेगा कि परमेश्वर सिर्फ एक विशेष लोगों के लिए है तो यह भी गलत होगा। परमेश्वर का कोई अपना और पराया नहीं है। सनातन साहित्य में एक पुराण है श्री गरुड़ पुराण। उस में विस्तार से व्यक्त किया गया है कि परमेश्वर हर एक जगह पर हैं।

मानव शरीर से निकलने वाले मूत्र और विष्ठा तक में परमेश्वर का वास है। शरीर के मांस और हड्डियों तक में परमेश्वर का वास है।

शब्दों पर कुछ शंका हो तो श्री गरुड़ पुराण का पढ़  सकते हैं।

वैदिक पूजन क्या है। भक्ति में क्या पूजन आवश्यक है। हिंदू धर्म और पूजन। सनातन धर्म पूजन एक दर्शन दो।

हिंदू धर्म में जब व्यक्ति मुर्दे को लेकर जाते हैं उस समय भी हरी और राम का नाम जपा जाता है क्योंकि परमेश्वर का नाम हमेशा ही शुभ माना गया है।

अर्थात जिस समय सनातन साहित्य में सबसे अशुद्ध कहा गया है उस समय परमेश्वर का नाम ले सकते हैं। उस समय परमेश्वर का नाम दूषित नहीं होता इसके बाद क्या बचता है, इससे बड़ा और कौन सा अशुद्ध काम है जिस समय परमेश्वर का नाम लेने से, परमेश्वर का नाम दूषित हो जाएगा और व्यक्ति को पाप लगेगा।

यहां एक बात फिर से कहा जाएगा अनुष्ठान का बात अलग है। जब व्यक्ति कोई भी अनुष्ठान करेगा तो उस अनुष्ठान के नियम को मानना पड़ेगा।

उस अनुष्ठान के लिए संकल्प करना पड़ेगा। उस अनुष्ठान के लिए व्यक्ति को जिस प्रकार शुद्धि चाहिए वह भी करना पड़ेगा।

सनातन अनुष्ठान अलग है और सनातन में भक्ति का मार्ग अलग है। व्यक्ति जब तक सांसारिक भावनाओं से निकलकर स्वतंत्र नहीं होता तब तक वह परमेश्वर के स्थिति को नहीं समझ सकता।

संसार में बहुत बार ऐसा देखने को मिला है की अंत समय में व्यक्ति का जीवन बहुत कष्ट में होता है। ऐसे भी व्यक्ति मिलते हैं जो विष्ठा से लिपटे रहते हैं।

अंत समय में व्यक्ति का स्मृति भ्रम हो जाता है, अंत समय में व्यक्ति चिड़चिड़ा हो जाता है। उस समय उसके मन में यह है कि वह शुद्ध नहीं है वह परमेश्वर का नाम कैसे लेगा। या उस समय परमेश्वर का नाम वह मजबूरी में लेता है।वास्तव में परमेश्वर की भक्ति के लिए कोई नियम कानून नहीं है।

परमेश्वर के लिए यही एक नियम है की भक्त परमेश्वर के सिवा सब कुछ भूल जाए। व्यक्ति को सिर्फ परमेश्वर का हीं एक नाम ही याद रहे।

जिस दिन व्यक्ति वास्तव में परमेश्वर में डूब जाएगा उसी दिन वह अमर हो जाएगा। अर्थात वास्तविकता को समझकर उसके अंदर से मृत्यु का भय चला जाएगा। उसके बाद वह अपनी आंखों से एक नया दुनिया को देखेगा।

परमेश्वर को प्रेम चाहिए, प्रेम अंधा होता है इसका इतिहास में अनेकों वर्णन है। पूजन करना अनुष्ठान करना है, पूजन कराना पांडित्य है।

वास्तव में परमेश्वर भक्त ये दोनों में नहीं आते है। क्योंकि भक्तों को अनुष्ठान करके यदि कोई जादू सीखना है तो फिर वह भक्त नहीं हो सकता। एक परमेश्वर भक्त को जादू से क्या लाभ।

जब हमारे वैदिक शास्त्र यह कहते हैं कि स्वयं ब्रह्मा जी का भी एक निश्चित आयु है, जो कल्प के अंत में सब उस परम शक्ति में लीन हो जाते हैं।

जिसे परम शक्ति परमेश्वर आनंद सच्चिदानंद के नाम से पुकारा जाता है। कहा जाता है कि वह परमेश्वर रंग-रूप आकार से कहीं ऊपर है, वह न हीं स्त्री है न पुरुष है। एक दिन जाना सब ने उन्हीं के पास है इसलिए जिसे भी मानते हो उसे ही परम शक्ति सच्चिदानंद स्वरूप मानकर रात दिन उसके चिंतन में लग जाएं। उस परमेश्वर से बार-बार कहे, हे ईश्वर मुझे अपना प्रेम दे दे। मुझे अपनी चिंतन में इतना डूबा दे , ताकि मैं सारी दुनिया भूल जाऊं। स्वामी मुझे अपने देखने की दृष्टि देदे। मैं तेरी आंखों से दुनिया को देखना और महसूस करु कि दुनिया का वास्तविक रूप क्या है।

भक्ति के लिए सबसे बड़ा जो धन चाहिए वह परमेश्वर के लिए प्रेम है। यदि संसार के लिए प्रेम है तो फिर ईश्वर के लिए प्रेम नहीं है।

क्योंकि प्रेम तो अंधा होता है जब ईश्वर दिखने लगेगा तो संसार खो जाएगा। जब दो से प्रेम होता है तो अंधापन नहीं रहता, वहां पर अपना बुद्धि कार्य करता है।

एक कबीरदास जी का बहुत ही प्रचलित दोहा है-

पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।

पोथी पढ़ कर पांडित्य हासिल किया जा सकता है परंतु परमेश्वर का भक्ति हासिल नहीं किया जा सकता।

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