प्रेम एवं पागलपन की यात्रा किसके लिए है? प्रेम का वास्तविक हकदार कौन? सनातन और हिंदू धर्म में प्रेम दर्शन।

प्रेम यात्रा किसके लिए और प्रेम का वास्तविक हकदार कौन?एक पुरानी कहावत है “इश्क नहीं आसान इतना एक आग का दरिया है और डूब कर जाना है।”निश्चित तौर पर इस एक आग का दरिया है फिर भी व्यक्ति डूबने को बेचैन रहता है।

यहां पर यह नहीं कहा जा रहा कि आप हवस में अंधे हो जाओ। क्योंकि हवस का अंधापन निश्चित तौर पर व्यक्ति को ले डूबता है।

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यदि वास्तविकता से विचार करें तो बचपन से व्यक्ति ने अपने लिए जैसा संसार बनाया है। वह अपने भावनाओं के द्वारा गुलाम हुए जो संसार के सामने प्रस्तुत किया है उसे वही मिल रहा है।

बिगड़े हुए अतीत को कोई बदल सके यह किसी के बस की बात नहीं।

व्यक्ति चाहे तो अपने विचारों की शुद्धि से भविष्य को सुधार सकता है। प्रेम कोई खाने की वस्तु नहीं। प्रेम तो व्यक्ति अपने अंदर महसूस करता है।

वास्तविक प्रेम अपने अंदर त्याग की भावना जागृत करता है।

सीधी तौर से कहें तो वास्तविक प्रेम व्यक्ति को त्याग करना सिखा देता है।

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जब  व्यक्ति के अंदर त्याग करने की धारा चल पड़ता है तो उसका इच्छा स्थिर हो जाता है। उसके बाद उसे और कुछ नहीं चाहिए । उसके आगे उसके जीवन में जो कुछ भी स्वत: मिलेगा व्यक्ति उसी से आनंद में डूबा रहेगा। इसीलिए

हमारे महात्मा कहते हैं  “एक अपने परमेश्वर से प्रेम करो और दुनिया में उनके द्वारा बताए हुए कर्म को भलीभांति करो।” 

इन बातों के अंदर विरोधाभास है परंतु वास्तव में दोनों एक ही है। सनातन सत्य व्यक्ति को अपना दृष्टि हीं बदलने की बात करता है।

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One thought on “प्रेम का हकदार कौन? Pagalpan aur Prem Yatra.

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