माता के प्रेम का आधार क्या होता है? सनातन और हिंदू धर्म में प्रेम एक दर्शन।

माता के प्रेम का वास्तविक परिभाषा क्या है?एक माता के प्रेम को तौलना मूर्खता होगा। क्योंकि संसार में एक मां ही है जो अपनी खुशी को बच्चे का खुशी समझती है। निश्चित तौर पर मां की आशाएं होती है। जब बच्चा बड़ा होता है तो सोचता है हम अपनी एक अलग दुनिया बसाएंगे। बच्चा बड़ा होकर अपना अलग दुनिया बसा भी लेता क्योंकि वह यह जानता है कि हमारा संसार अलग ही होना चाहिए।

एक माता ने अपने बच्चे को अपना संसार समझ कर पाला था।

एक माता ही बच्चे का दूसरा संसार बनाती है और कब उसका संसार बिखर जाता है उसे भी एहसास नहीं होता। माता अपना संसार समझकर बनाती है और पता चलता है कि वह उस संसार में नहीं है। एक मां अपना दर्द किस से कहें जब अपना ही सुनने को तैयार न हो।


माता का दर्द तो एक माता ही बयां कर सकती है परंतु यह दुनिया का दस्तूर है यह सब के साथ होने वाला है।

इसलिए सनातन सत्य कहता है कर्म करना ही धर्म है। संसार में सबसे प्रेम करें और परिस्थिति के अनुसार परमेश्वर जो कर्म कहता है करने के लिए ! उसे भली-भांति करें।

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