श्रीमद्भागवत गीता १/१ अर्जुन विषाद का भर जाना और भगवान से प्रार्थना। हिंदू धर्म। सनातन धर्म।


श्रीमद्भागवत गीता के बारे में कितना भी कहा जाए कम है ‌। यहां तक कि कितना भी समझ लिया जाए वह भी कम है। महानुभाव-मित्रों! इससे पहले श्रीमद्भागवत गीता क्यों? श्रीमद्भागवत गीता के महत्व संक्षेप में मैंने कहने की कोशिश किया है।
अब हम गीता जी के अंदर एक एक श्लोकों के ऊपर लिखने  की कोशिश करेंगे।

धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः ।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय ॥ 
भावार्थ-
धृतराष्ट्र बोले- हे संजय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में एकत्रित, युद्ध की इच्छावाले मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया?॥1/1



श्रीमद्भागवत गीता को समझने के लिए गीता जी के पहले अध्याय का पहला श्लोक के ऊपर चिंतन निश्चित ही आवश्यक है।

यह श्लोक वास्तव में गीता जी का श्लोक नहीं है, परंतु यह श्लोक गीता जी के लिए आवश्यक है। पहले के इस लोक में न श्री कृष्ण है, और न हीं अर्जुन है। यह पहला श्लोक वास्तव में गीता जी के जन्म लेने की भूमि है।

गीता जी के लिए एक कथा प्रचलित है, कहते हैं जब व्यास जी ने महाभारत रूपी हरिवंश पुराण की रचना की, जो कि हर प्रकार से उत्तम था, उसके बावजूद परमेश्वर की प्रेरणा के अनुरूप उन्हें पुराण पूर्णंतया नहीं लगा।

चुकी व्यास जी महाभारत होने से पहले से यह सब जानते थे, उन्होंने एक ऐसी वार्ता का उल्लेख किया, जो हर प्रकार से गुप्त था।

सभी घटनाओं का व्यास जी ने देखा भी था और सुना भी था। धृतराष्ट्र अंधे थे इसलिए संजय से सुने थे। श्री अर्जुन गीता जी के ग्रहण करता थे। और कोई उपदेशक था तो स्वयं परम शक्ति परमेश्वर थे।

मैं बार-बार कहता हूं, गीता जी के उपदेशक कृष्ण नहीं थे, नहीं भगवान विष्णु थे।

क्योंकि श्री गीता जी को कृष्ण में अथवा श्री विष्णु में बांधना श्रीमद्भागवत गीता को छोटा करना हो जाएगा, या फिर समझना मुश्किल होगा।



यदि ये श्री कृष्ण की वाणी कहा जाए, तो गीता जी को संजय की वाणी भी कहा जा सकता है।

और श्री व्यास जी की वाणी भी कहा जा सकता है। श्री कृष्ण जी! श्री मद्भागवतगीता को, एक तीसरे पुरुष बनकर कहते हैं। इसका जिक्र उन्होंने एक बार नहीं अनेक बार कहा है, अर्जुन से पहले भी अर्जुन था, और कृष्ण से पहले भी कृष्ण थे। इसका विस्तार परमेश्वर ने अपनी विभूतियों में किया है। अपनी विभूतियों में अपने अनंत रूपों की व्याख्या उन्होंने किया है ‌। उन व्याख्या में श्री अर्जुन और श्री कृष्ण एक बहुत ही छोटा स्वरूप है।

श्री कृष्ण वास्तव में श्री कृष्ण ने नहीं थे, क्योंकि परमेश्वर ने हीं इसमें  कहा है, जो मुझे सिर्फ कृष्ण रूप से जानता है, वह वास्तव में मुझे नहीं जानता।

परमेश्वर ने अपने वास्तविक स्वरूप को, विराट स्वरूप में दर्शाया है। इस रहस्य को भली भाती श्री अर्जुन समझे !

जब तक श्रीमद्भागवत गीता के प्राकट्य जमीन और भूमिका समझ में ना आए, तो श्री गीता जी को समझना मुमकिन ही नहीं नामुमकिन है।

उदाहरण के तौर पर भेद अपनी आंखों में नहीं होता, भेद दृश्य में होता है। हम यह कभी नहीं कह सकते कि हमारा शब्द ही महान है। आज तक अतीत में जितने भी ज्ञान को प्रदर्शित करने वाले, महामानव हुए शायद उनके समक्ष मैं बहुत छोटा हूं। सभीं ने अपने अपने तरीके से श्रीमद्भागवत गीता के व्याख्यान दिए। सभी का अपना अपना महत्व है।

वास्तव में यदि बात करें तो श्रीमद्भागवत गीता सिर्फ ज्ञान नहीं है, ज्ञान को प्राप्त करने की कुंजी है।

परमेश्वर और जीव के बीच जो दूरी है, उस दूरी को मिटाने के लिए, जिस प्रकार के योग क्रिया की आवश्यकता है, उसका कुंजी है।


सभी अपने परंपरा को फॉलो करते हैं, यदि करीब से देखें तो हंसी आएगा, जिस परंपरा को फॉलो कर कोई बहुत बड़ा परंपरा बना, लोगों ने उस मुख्य परंपरा को भुला दिया।

या यूं कह सकते हैं सामाजिक विचारधारा इतना हावी हो गया, की मूल विचारधारा कहीं दूर हो गया।

गीता जी के शुभारंभ में धृतराष्ट्र संजय से पूछते हैं हे संजय, धर्म भूमि कुरुक्षेत्र में युद्ध की इच्छा वाले मेरे और पांडु के पुत्रों ने क्या किया?
यह शब्द किसके थे, हस्तिनापुर के महाराज धृतराष्ट्र के थे।

धृतराष्ट्र को भी पता था, किया धर्म की लड़ाई है।

पांडव अपने धर्म को निभाने के लिए युद्ध भूमि में आए हुए थे। इधर से दुर्योधन भी अपने धर्म को ही देखते हुए युद्ध के लिए तैयार हुआ था। धृतराष्ट्र अंधा होते हुए भी मन की आंखों से, युद्ध भूमि में गया था। वह यह सोच कर नहीं गया था, कि वह अधर्म कर रहा है।

वास्तव में धृतराष्ट्र के लिए धर्म शब्द यह दर्शाता है।

धृतराष्ट्र को पुत्र मोह रूपी कामना ने उसे मन और बुद्धि  से भी अंधा कर दिया था। यहां धृतराष्ट्र कहता है  ”युद्ध की इच्छा वाले मेरे और पांडु के पुत्रों ने”
जबकि यह सत्य है, धृतराष्ट्र अपने मन बुद्धि से स्वयं कुरुक्षेत्र में मौजूद था , वास्तव में कौरव और पांडवों को युद्ध की इच्छा नहीं थी, युद्ध की इच्छा तो धृतराष्ट्र की थी। व्यक्ति कभी भी अपने आप को दोष नहीं देता, यह सभी जानते हैं।

दुर्योधन एक राजा का बेटा था, उसका इच्छा उसके पिता का सोच था,वह अपने पिता के साथ हुए अन्याय के लिए लड़ रहा था।

युद्ध की इच्छा पांडवों को भी नहीं थी, वे तो कौरवों की इच्छा से युद्ध के लिए कुरुक्षेत्र में उपस्थित हुए थे।

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