प्रेम की परिभाषा। सनातन धर्म में प्रेम दर्शन। प्रेम के लिए हिंदू धर्म क्या कहता है।

प्रेम की वास्तविक परिभाषा क्या है?प्रेम वहां से शुरू होता है, जहां बुद्धि अपना कार्य छोड़ देता है। इसीलिए इतिहास में अनेक महामानव यह बात दर्शा कर गए, प्रेम तो संसार में परम पवित्र तत्व है।

सांसारिक दृष्टि से देखें तो प्रेम वह तत्व है।

जिसमें जीने में भी मजा है और मरने में भी। जब प्रेम होता है तो मानो दिल बार बार रोता है।

प्रेम में गिरा हुआ एक-एक आंसू भी संसार में किसी अमृत से कम नहीं मालूम पड़ता।

वास्तविक प्रेम बयां करना बहुत मुश्किल लगता है। यह बात तो वास्तव में प्रेमिका बिना प्रेमी के अकेले में अपने प्रेमिका के लिए करती है। यहां प्रेमिका का अर्थ सिर्फ स्त्री अथवा लड़की नहीं है, प्रेम करने वाला प्रेमिका है और प्रेम पाने वाला प्रेमी है।

प्रेम तो वह तत्व है जिसमें प्रेमिका को एक-एक आंसू मानो जन्नत का आनंद देता हो।

इसीलिए हमारा सदैव कथन रहता है, जीवन को जीने में तकलीफ है, मरने के बाद तो आनंद ही आनंद।


है। इस प्रकार का प्रेम यदि कुछ क्षण के लिए हो, तो इसका मजा तो प्रेमिका ही समझती है।

प्रेम में जीवन जीने वाला हर समय, हर क्षण, पल-पल प्रेम में ही जीता है।

यदि वास्तविक प्रेम पाना है, तो सर्वप्रथम वास्तविकता तो अपने प्रेम में लाना होगा। बिना हमारे समर्पण के हम सिर्फ सामने वाले का समर्पण का इच्छा करें, तो यह गलत होगा।

किसी का प्रेम पाने के लिए, अपना बुद्धि नही लगाएं, प्रेमी के लिए अपने अंदर प्रेम को जागृत करें।

आजीवन के लिए उसका प्रेमीका बन जाए। वास्तविक प्रेम में इच्छा , द्वेष, बदला,  आवश्यकता तथा नफरत जैसे तत्व का कोई स्थान नहीं होता।

One thought on “प्रेम की वास्तविक परिभाषा क्या है? Prem ki paribhasha.

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