प्रकृति प्रेम यात्रा की- ०२, प्रेम सदैव के लिए त्याग खोजता है। सनातन और हिंदू धर्म में प्रेम एक दर्शन।

प्रेम को अपने लिए क्या चाहिए।इस प्रकृति में शायद ही ऐसा कोई जीव है जो प्रेम नहीं करता। प्रेम को क्या चाहिए, प्रेम को सिर्फ प्रेम चाहिए। यदि करीब से देखें तो एक मानव कितने प्रकार का प्रेम करता है।

सर्वप्रथम तो व्यक्ति अपने आप से प्रेम करता है, अपने जीवन से प्रेम करता है।

अपने जीवन से संबंधित वस्तुओं से प्रेम करता है तथा जीवन के लिए जरूरी आवश्यकता उनसे प्रेम करता है।



प्रेम की गहराई कितनी है, ये समझ पाना और समझा पाना अनेक कठिन होता है।

एक व्यक्ति खाने में अनेक प्रकार की सामग्री बहुत पसंद करता है, जबकि वही पसंद आने वाली सामग्री दूसरे को पसंद नहीं होता। एक व्यक्ति को कुछ गिनती के रंग पसंद करते हैं, वहीं दूसरा व्यक्ति को उन रंगों को पसंद नहीं करता।

दोष न हीं खाने की सामग्री में है, न हीं दिखने वाले रंगों में है।

इसे हम प्रेम की विभिन्नताएं कहेंगे। एक ही दृश्य से कुछ लोग प्रेम करते हैं। एक ही दृश्य के ऊपर सब का वक्तव्य अलग अलग होता है। यहां हम प्रेम को इच्छा के रूप में मानते हैं।

क्योंकि नि:स्वार्थ प्रेम का परिभाषा अलग होगा।

इच्छा रूपी प्रेम निरंतर एक सामान नहीं रहता। इच्छा वाले प्रेम की वजह से ही व्यक्ति संसार में नाना प्रकार के तकलीफों को झेलता है।



उदाहरण के लिए आज कोई व्यक्ति एक नया मोबाइल खरीद करता है, आज उसकी दृष्टि सबसे उत्तम की है।

यहां वह अपना दिल और दिमाग दोनों को लगाकर खरीद करता है। वह उस मोबाइल का अनेक प्रकार से अनेक जगह तारीफ भी करता है। कुछ दिन उपरांत जब वह नई मॉडल का मोबाइल देखता है और वह नई तरफ आकर्षित हो जाता है। अब उसे अपना पुराना मोबाइल छोटा सा जान पड़ता है। उसे अपने उस पुराने मोबाइल से वह आनंद नहीं मिलता जो नया नया में आनंद मिला था।

यहां विचार करने वाली बात है ,दोष किस में है।

मोबाइल भी वही है और व्यक्ति भी वही है। दोष सिर्फ अपने नजर का है और भावना का है। बहुत बार ऐसा होता है किस प्रकार की सोच व्यक्ति विशेष के लिए भी हो जाता है। जो वास्तव में जीवन के दौर में इस प्रकार का नहीं होना चाहिए।

प्रेम करने वाला व्यक्ति किसी से प्रेम तो कर लेता, परंतु उसको निभा नहीं पाता।

यदि वास्तविकता की बात करें तो प्रेम करने से कहीं गुना कठिन काम है प्रेम को निभाना। प्रेम में पर्दे एक तरफ नहीं होते हैं दोनों तरफ आंखों पर पट्टी बंधा रहता है। इसलिए दोनों के मिलने के बाद और जीवन शुरू करने के बाद निश्चित तौर पर दोनों को ही आपस में समझौता करना चाहिए। इसमें दोनों को ही अपने अहम का त्याग करना होगा।

व्यक्ति प्रेम करने में अनेकों त्याग कर चुका होता है और यहां बाद में त्याग करने में कठिनाई होता है।

व्यक्ति को अपने अंदर की प्रेम प्रकृति को समझना होगा, और अपने अंदर सामंजस्य बिठाकर साथ साथ चलना होगा।

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