प्रेम और फ्रेम में क्या अंतर है? हिंदू धर्म में प्रेम की वास्तविकता। सनातन धर्म में प्रेम।

सच्चा प्रेम और झूठा प्रेम की वास्तविकता क्या है?प्रेम तो वह है जिसमें व्यक्ति प्रेम के चक्कर में अपने स्वार्थ को भूल जाता है। प्रेम रूपी फ्रेम वह है जो बनाया हुआ है, जो महज प्रेम का ढांचा तैयार किया हुआ है। इस प्रकार का प्रेम अधिक समय तक प्रभावित नहीं रहता।



जो प्रेम करता है, अपनी खुशियों को त्याग कर प्रेम करता है, वह वैसे ही प्रेम का तमन्ना भी करता है।

एक होता है नि:स्वार्थ प्रेम, यहां उस प्रेम का बात नहीं हो रहा। जब प्रेम समय की कसौटी पर चढ़ता है तो वास्तविकता क्या है ,यह अपने आप पता चल जाता है।

प्रेम का शुरुआत दिल से होता है, दिमाग के लाख मना करने के बाद भी,  दिल प्रेम कर बैठता है।

जहां दिल का बात होता है, वहां चोट भी दिल पर लगता है। दिमाग समझाने की कोशिश भी करता है तो भी दिल मानने को तैयार नहीं होता।

दिल बेचारा क्या करें, प्रेम अंधा होता है।

प्रेमी अपने लिए भी वैसा ही प्रेम खोजता है, परंतु ऐसा संभव नहीं हो सकता, चाहत! तो ऐसा ही होता है।



फ्रेम की बात करें तो, यह दिमाग के द्वारा गढ़ा जाता है, जिसे जमाना झूठ और फरेब के नाम से जानता है।

ऐसा व्यक्ति प्रेम करने का नाटक करता है, परंतु कहते हैं ,स्वांग बहुत समय तक नहीं चलता, जब वास्तविकता से पर्दा उठता है, तो पता चलता है कि यह प्रेम नहीं था महज एक फ्रेम था।

प्रेम और फ्रेम में जमीन और आसमान का अंतर होता है।

दिल बहुत ही नाजुक होता है, कब कौन से बात को लेकर टूट जाएगा, यह तो दिल को भी पता नहीं होता। इसीलिए लेखक कहता है प्रेम करो, परंतु यह जरूर देखो, कि कहीं सामने से प्रेम के रूप में फ्रेम तो नहीं है।

प्रेम अंधा होता है उसके बावजूद प्रेम पवित्र होता है, क्योंकि एक प्रेमी व्यक्ति के अंदर में घात नहीं छुपा होता।

एक प्रेम ! अपने प्रेम को बचाने के लिए, सबसे पहले तैयार होता है त्याग करने के लिए। इतिहास गवाह है इसीलिए सच्चे प्रेमी, सदा के लिए अपना नाम कर जाते हैं।

One thought on “प्रेम की वास्तविकता क्या है? प्रेम में समर्पण।Saccha Prem aur jhuta Prem.

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