संसार में दुखी कौन नहीं है। सुख कैसे मिले। हिंदू धर्म। सनातन धर्म।

संसार में ऐसा कौन सा जीव है जो दुखी ना हो? संसार बहुत बड़ा है और सभी जीवों का अपना अपना दुख है। जल में रहने वाले, धरती पर आने तथा आकाश में विचरण करने वाले, जो जीव हैं, सभी को अपना अपना परेशानी है।

हम मानव के अंदर अपनी अपनी परेशानियां हैं।

एक बच्चा जन्म लेता है, भूख लगता है, अपना भूख बता नहीं सकता। जब बच्चा रोता है ,तब लोग समझते हैं कि बच्चा भूखा है। बच्चा धीरे-धीरे बड़ा होता, जैसे जैसे बड़ा होता है ,वैसे वैसे उसके सपने बड़े होते जाते हैं।

पहले वह छोटी-छोटी खिलौनों से खुश हो जाता था, धीरे धीरे उसे अपने अनुसार बड़े-बड़े खिलौने चाहिए।

एक समय ऐसा आता है, क्योंकी सिर्फ खिलौनों से अब कोई सुख नहीं मिलता है।

अब जीवन के वास्तविक सपने देखने लगा है। वह जो ऊंची और अच्छी चीज़ देखता है, वह सब उसे चाहिए।

अभी तक उसे यह पता नहीं होता, कि किस ऊंचाई को पाने के लिए कितना योग्यता की जरूरत है। किसी सपने को पाने के लिए कितनी कुर्बानियों की आवश्यकता है।

सपनों में कुछ हसीन सपने भी देखता, अब तो उसे अपने अनुसार से एक पार्टनर चाहिए, जो उसके मन के इच्छा  को तृप्त कर सके।

उसे तृप्ति मिलेगी और मिलता भी है, परंतु यह सिक्के का एक पहलू होता है, सिक्के के दूसरे पहलू के बारे में वह बच्चा अंजान होता है। दुनिया को उसने देखा है अब तक, परंतु उस नजरिए से नहीं देखा है।

सिक्के का दूसरा पहलू उसके जीवन का वास्तविक सत्य है।

आश्चर्य की बात है वह बच्चा जब तक सिक्के के पहले पहलू को जान नहीं पाता तब तक उसे सिक्के का दूसरा पहलू नजर नहीं आता। यह बात जीवन को जीने में दोनों पार्टनर के ऊपर लागू होता है। दोनों हसीन सपने लेकर मिलते हैं, परंतु सपना तो सपना ही होता है।

वास्तविक आनंद और सपने का आनंद दोनों बिल्कुल अलग अलग होता है।

यदि सत्य बात करें तो जो आनंद सपने को देखने में आया, जब सपना सच हुआ तो वह आनंद पता ही नहीं कहां चला गया। दोनों यह सोच कर बैठे थे, कि मिलकर अब हम स्वर्ग में प्रवेश करेंगे, स्वर्ग में गए परंतु वह स्वर्ग भी बाद में दुख देने वाला, भय देने वाला जगह है।

अब वे सिक्के के दूसरे पहलू में जी रहे होते हैं, वे अपने संसार में, इस संसार में जिएंगे, परंतु कैसे जिएंगे यह उनके समझदारी के ऊपर निर्भर करता है।

दोनों एक दूसरे को समाज की वास्तविकता समझकर हालात को समझते हुए, अपने आप से समझौता कर लेते हैं, तब तो अच्छा है। यदि नई स्वर्गनुमा  दुनिया को समझ जाते हैं, और इस दुनिया में जीना सीख जाते हैं, तब तो उन्हें दुख में भी आनंद मिल जाएगा। नहीं तो वास्तविकता यही है कि इस धरती पर हर व्यक्ति को कुछ चाहिए।

शायद कोई ऐसा मिलेगा, जिसे कुछ नहीं चाहिए, और वह कहे कि मैं वाकई में स्वर्ग में जी रहा हूं।

ऐसे व्यक्ति को हम कुदरत का करिश्मा कह सकते हैं, धार्मिक महानताओं के अनुसार वैसे व्यक्ति के ऊपर परमेश्वर की असीम कृपा होती है।



दोनों जोड़े का इतने पर ही दुख कम नहीं होता। वे समाज में जीना सीख कर, अपना एक नया दुनिया बस लेते हैं, रात दिन इसी दुनिया में जीते, उनके बच्चे बड़े हो जाते हैं। उनके बच्चे हसीन सपने देखते हैं और अपना दुनिया बनाते हैं।

एक दिन जिस प्रकार चिड़िया जब उड़ना सीख जाता है, तो वह मां का घोंसला छोड़कर कोई और घोंसला बना लेता है।

समस्त दुनिया सपनों का संसार लिए यूं ही जीते जा रहे हैं। वे सभी आपस में मिलकर हंसी और खुशी के गम पिए जा रहे हैं।

दोषी कौन है? वास्तव में दोषी कोई, यह दुनिया का चलन है, चिड़िया कब तक अपने बच्चे को घोसले में रख सकती है।

बच्चे को अलग दुनिया बसाने है, एक दुनिया में रहकर वह दूसरा दुनिया नहीं बसा पाएगा। क्योंकि उसकी इच्छा शक्ति, उसके सोचने और समझने के बाद भी ऐसा करने नहीं देंगे, शायद पूरी तरह से उसका प्रकृति भी साथ नहीं देगा।

इसीलिए इतिहास से एक कहावत है, सुख के तो बहुत साथीं ही मिल जाया करते हैं, परंतु दुख का साथीं कोई नहीं मिलता, उसे तो स्वयं ही झेलना पड़ता है।

इसीलिए सनातन सत्य कहता है, ” परमेश्वर को अपना बना लो, परमेश्वर के लिए चिंतन करो, एक परमेश्वर की बंदगी करो और अपने शरीर के द्वारा कर्म समस्त संसार के लिए करो।”

One thought on “संसार में दुखी कौन नहीं। Prakriti mein sabko dukh hai.

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