प्रेम कैसे करें और प्रेम किससे करें? हिंदू धर्म। सनातन धर्म।प्रेम की परिभाषा।

प्रेम किससे करें और प्रेम कैसे करें?प्रेम कैसे करें, इसे समझने के लिए सर्वप्रथम  प्रेम को समझना होगा। प्रेम क्या है और यह कैसे काम करता है।

वास्तविक प्रेम कभी किसी का गुलाम नहीं हो सकता।

गुलाम अर्थात मजबूरी में किया गया प्रेम, प्रेमी अथवा प्रेमिका अपने प्रेम में एक दूसरे को शरणागत कर सकते हैं। यहां एक बात विचारणीय है, क्या शारीरिक इच्छाओं की पूर्ति करना प्रेम है।

यह प्रेम नहीं हो सकता, क्योंकि शारीरिक इच्छाओं की पूर्ति होने के बाद सामने वाले के साथ, पहले वाला आकर्षण नहीं रह जाता।

यह बात तो वैसा लग रहा है जैसे, भूखे को कुछ भी अच्छा लगता है, और पेट भरने के बाद स्वादिष्ट से स्वादिष्ट भोजन भी छोटा लगता है । प्रेम भोजन नहीं है, प्रेम किसी आवश्यकता के ऊपर आश्रित रहने वाला तत्व नहीं है।



यह निश्चित है की प्रेम का शुरुआत, आकर्षण अपने प्रेमी के बारे में महान दर्शन सहायक होता है।

ऐसी स्थिति में आकर्षण और दर्शन यदि वास्तविक ना हो तो प्रेम का स्थिति नीचे आ जाता है। इसीलिए कहते हैं प्रेम वस्तु के ऊपर आश्रित रहने वाला तत्व नहीं है।

शारीरिक इच्छाओं की पूर्ति करना, यह व्यक्तिगत आवश्यकता है। इसमें प्रेमी और प्रेमिका दोनों का बराबर योगदान रहता है।

किसी परिस्थिति में कोई एक आवश्यकताओं की पूर्ति करने में सक्षम नहीं होता, उस स्थिति में दूसरा पक्ष का आवश्यकता कहीं और केंद्र की तलाश करने लग जाता है। यही वास्तव में दो प्रेमियों के बीच दूरी का कारण बनता है।

यह कोई कहे की तुम मेरे से प्रेम करो, पूरी तरह से तुम मेरे ऊपर आश्रित रहो, और मैं साथ में किसी और के साथ आश्रित रहूंगा, ऐसा नहीं हो सकता।

इस प्रकार का प्रेम पारिवारिक कलह का कारण बनता है। संसार में यदि समाज को आपस में साथ रहने के लिए, एक दूसरे के इच्छाओं का पूर्ति करना, आवश्यकताओं की पूर्ति करना आवश्यक है ,यह दोनों पक्ष का जिम्मेवारी बनता है।



संसार में पुराने समय से एक बात चली आ रही है, प्रेम का हथियार सबसे बड़ा होता है।

इसी प्रेम में परमेश्वर को भी झुकना पड़ता है। अपने दोस्तों को तो प्रेम में लोगों ने बांध रखा है, यदि व्यक्ति के अंदर वास्तव में प्रेम करने की कला है, तो वह अपने दुश्मनों को भी अपने प्रेम में बांध सकता है।

वास्तविक प्रेम! सामने वाले से आवश्यकता के अनुसार से प्रेम नहीं करता। यहां एक बात है, वास्तविक प्रेम बहुत ही कम देखने को मिलेगा।

वास्तविक प्रेम तो वही है, जो व्यक्ति प्रेम में अंधा हो, प्रेमी यदि गला भी काट रहा हो तो भी प्रेमिका अपने प्रेम का ही प्रदर्शन करती है।

धरती पर जीव के अंदर प्रेम बहुत ही महत्वपूर्ण तत्व है। एक क्रूर से क्रूर व्यक्ति भी किसी न किसी व्यक्ति से, वस्तु से, भावना से, सिद्धांत से, आवश्यकता से अथवा अपने आप से प्रेम जरूर करता।

यदि प्रेम को सामाजिक दृष्टि के अनुसार से देखें, एक प्रेमी अपने प्रेमिका के आचरण को देखें, और अपने आचरण को नजरअंदाज करें।

इस दृष्टि से आपसी प्रेम को अनुमान लगाए तो यह अपने प्रेमिका के ऊपर एक तरीके से जुल्म होगा। प्रेम में यदि सामने वाले को झुकाना है, इस बात को एक बार फिर से कहना पड़ेगा।

प्रेम में यदि सामने वाले को झुकाना है, तो सर्वप्रथम अपने प्रेमिका के प्रति अपने अंदर प्रेमभाव को जगाना होगा, उसके प्रेम में सर्वप्रथम अपने को झुकाना होगा।

यदि प्रेमी महज सुंदरता और आवश्यकता की दृष्टि से प्रेम करता है तो यह दोनों ही नियमित नहीं है। क्योंकि सुंदरता प्रकृति में सत्य नहीं है, आवश्यकता नित्य क्षण बदलता रहता है।



किसी के साथ प्रेम बलपूर्वक नहीं हो सकता, यदि बलपूर्वक है तो वह प्रेम नहीं है। प्रेम वहां से शुरू होता है, जहां बुद्धि अपना कार्य छोड़ देता है।

इसीलिए इतिहास में अनेक महामानव यह बात दर्शा कर गए, प्रेम तो संसार में परम पवित्र तत्व है। सांसारिक दृष्टि से देखें तो प्रेम वह तत्व है, जिसमें जीने में भी मजा है और मरने में भी।

जब प्रेम होता है तो मानो दिल बार बार रोता है। प्रेम में गिरा हुआ एक-एक आंसू भी संसार में किसी अमृत से कम नहीं मालूम पड़ता।

वास्तविक प्रेम बयां करना बहुत मुश्किल लगता है। यह बात तो वास्तव में प्रेमिका बिना प्रेमी के अकेले में अपने प्रेमिका के लिए करती है। यहां प्रेमिका का अर्थ सिर्फ स्त्री अथवा लड़की नहीं है, प्रेम करने वाला प्रेमिका है और प्रेम पाने वाला प्रेमी है।

प्रेम तो वह तत्व है जिसमें प्रेमिका को एक-एक आंसू मानो जन्नत का आनंद देता हो।

इसीलिए हमारा सदैव कथन रहता है, जीवन को जीने में तकलीफ है, मरने के बाद तो आनंद ही आनंद है।

इस प्रकार का प्रेम यदि कुछ क्षण के लिए हो, तो इसका मजा तो प्रेमिका ही समझती है।

प्रेम में जीवन जीने वाला हर समय, हर क्षण, पल-पल प्रेम में ही जीता है। यदि वास्तविक प्रेम पाना है, तो सर्वप्रथम वास्तविकता तो अपने प्रेम में लाना होगा। बिना हमारे समर्पण के हम सिर्फ सामने वाले का समर्पण का इच्छा करें, तो यह गलत होगा।

किसी का प्रेम पाने के लिए, अपना बुद्धि नही लगाएं, प्रेमी के लिए अपने अंदर प्रेम को जागृत करें, आजीवन के लिए उसका प्रेमीका बन जाए।

वास्तविक प्रेम में इच्छा , द्वेष, बदला,  आवश्यकता तथा नफरत जैसे तत्व का कोई स्थान नहीं होता।

संसार में इस प्रकार का प्रेम बहुत कम देखने को मिलता है। इसका मुख्य कारण है प्रकृति में सब कुछ बदल रहा है। हम सब नित्य दिन बदल रहे हैं, जो हम कल थे वह आज नहीं हैं और जो आज हैं ,आने वाले समय में वैसा नहीं रहेंगे।

इसीलिए सनातन साहित्य बार-बार कहता है, प्रेम करना है तो अविनाशी परमेश्वर से करो।

क्योंकि इस संसार में एक परमेश्वर ही है जो कल जैसा था, आज भी वैसा ही है और आने वाले समय में भी एक जैसा ही रहेगा। परमेश्वर संसार में सिर्फ और सिर्फ सत्य है, परमेश्वर नित्य है, अपने इष्ट से प्रेम करें ,आपका इष्ट वह प्रेमी है जो आप जहां भी रहोगे वह आपके साथ-साथ रहेगा।

सांसारिक दृष्टि से अपना पुत्र पत्नी का हो सकता है, अपना प्रेमी किसी और का हो सकता है, अपने पास रहा हुआ वस्तु जा सकता है।

एक परमेश्वर है जो कभी नहीं जाएगा, वह तो इस ब्रह्मांड के समाप्त होने के बाद भी, एक जैसा रहेगा।

प्रेम करना है, तो सर्वप्रथम प्रेमी के भाव में अपने आप को समर्पण करना पड़ेगा।

बात यहां किसी जाति धर्म और संप्रदाय से नहीं है। अथवा नहीं किसी व्यक्ति विशेष से हैं।

प्रेम की आवश्यकता किसे नहीं है, सभी सिर्फ अपने लिए प्रेम ही खोजते हैं।

यदि वे अपने अंदर झांक कर देखें तो पता चलेगा, कि उनके अंदर वास्तविक में कौन सा प्रेम है।

One thought on “प्रेम किससे और क्यों? Vastvik Prem kaise ho.

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