परिवार में सुख शांति के लिए क्या करें? हिंदू धर्म। सनातन धर्म।

हिंदू धर्म परिवार में सुख शांति के लिए क्या करता है? पारिवारिक सुख शांति में आपसी प्रेम बहुत बड़ा अपना रोल अदा करता है । जब परिवार धीरे-धीरे बड़ा होने लगता है, जब परिवार के व्यक्ति एक उम्र से दूसरे उम्र में प्रवेश करते हैं तो धीरे-धीरे वे एक दूसरे से दूर होते चले जाते हैं।
एक समय प्रेमी और प्रेमिका एक दूसरे के लिए जान देने को तैयार होते हैं, परंतु आगे चलकर एक दूसरे के लिए एक छोटा-सा अपनी खुशी का भी त्याग नहीं कर पाते।

एक मां अपने बच्चे के लिए‌ ! अपनी हर प्रकार की खुशियों का त्याग करती है, और आगे चलकर वही पुत्र अपने मां के लिए एक छोटे से खुशी को भी त्याग नहीं कर पाता।

यहां देखा जाए तो दोषी‌ कौन है, गहनता से देखा जाए तो दोषी कोई नहीं। यह प्रकृति है प्रकृति में सब कुछ बदल रहा है। जब व्यक्ति जवान होता है, उस समय उसके अंदर, दुनिया को देखने का अलग ही नजर होता है।

वह बच्चा जैसे जैसे बड़ा होता है, जैसे-जैसे उम्र की ऊंचाई को बढ़ता है ,वैसे वैसे उसका नजर भी बदलता।

व्यक्ति के सोच का केंद्र बदलता है, व्यक्ति के सोच का आधार बदलता है। करीब से देखें तो यहां दोषी कोई नहीं है सभीं अपने प्रकृति के गुलाम हैं।

संसार में सूरज की अपनी एक दुनिया है, सूरज से बाहर भी हजारों लाखों की संख्या में दुनिया है।

अपनी धरती की भी अपनी एक दुनिया है, धरती की दुनिया में चांद है परंतु चांद की भी अपनी एक दुनिया है। ठीक इसी प्रकार संसार में जितने व्यक्ति हैं ,उनकी उतनी दुनिया है। इसे समझने के लिए एक बच्चे से सोचते हैं।



एक बच्चा अपनी मां की दुनिया में आया। धीरे धीरे उसने उम्र के अनुसार ,एक अपनी दुनिया बनाया।

उस बच्चे के दुनिया में प्रेमी अथवा प्रेमिका आया। यह बच्चा पहले मां की दुनिया में था, अब वह मां के दुनियां से निकलकर अपने दुनियां का निर्माण कर चुका है।

अब मां को अपनी दुनिया छोड़कर बच्चे की दुनिया में जाना होगा।

यहां पर बच्चे के नहीं चाहने पर भी, बच्चे का अपना एक दुनिया बन जाता है।
वही बच्चें आगे चलकर मां-बाप बनते हैं और उनके बच्चे अपनी नई दुनिया का निर्माण करते हैं।

यहां पर माता पिता को बच्चे की दुनिया में एडजस्ट करना पड़ता है, यह सत्य है की बच्चे का दुनियां बनाने के लिए मां बाप ने ही सहयोग किया था।

मां बाप यह सोच कर बच्चे का अलग दुनियां नहीं बनाते, कि वह दुनिया उनसे अलग है। माता पिता तो अपनी दुनिया समझ कर बच्चे की दुनियां का विस्तार करते हैं। परंतु बच्चे का दुनियां एक अलग दुनिया बन जाता है।



प्रेमी और प्रेमिका में भी अक्सर ऐसा ही होता है। सांसारिक दृष्टि से देखें तो प्रेमी और प्रेमिका
मिलकर अपने एक नई दुनियां का निर्माण करते हैं।

दोनों की दुनियां एक होने के बाद भी, उनके बीच यदि ऐसा हो! दोनों के एक होने के बाद भी यदि दोनों का दुनियां अलग-अलग है, तो फिर दो दुनियां का एक साथ रहना मुश्किल होता है। क्योंकि यहां पर दोनों का केंद्र अलग अलग होगा।

उदाहरण के लिए पृथ्वी की दुनियां में चांद है, चांद दूर रहकर भी पृथ्वी के साथ ही है।

परंतु यहां पर दोनों में एक निश्चित दूरी है। अक्सर प्रेमी और प्रेमिका इस प्रकार का दूरी बर्दाश्त नहीं करते हैं। दोनों के अंदर यदि दुनियां अलग अलग होगा, उस परिस्थिति में दोनों एक नहीं हो सकते।

दो दुनियां को साथ चलने के लिए यहां दोनों को सोचना होगा। एक को पृथ्वी बनना पड़ेगा और दूसरे को चांद बनना पड़ेगा।

तभी जाकर दोनों एक दूसरे की दुनिया में रह सकते हैं, दोनों ही एक दूसरे के संपर्क को कायम रख सकते। यहां पर यदि गलती से पृथ्वी अपना खिंचाव कम कर दे, तो चांद किसी और की दुनिया में प्रवेश कर जाएगा। यही परिस्थिति चांद के लिए भी है, यदि पृथ्वी ने अपना खिंचाव कम कर दिया तो चांद कहीं भटक जाएगा, फिर तो पृथ्वी के बस में भी नहीं होगा कि वह चांद को अपनी दुनिया में रख सके।

परिवार के सुख शांति के लिए सभी को अपने प्रेम को संतुलित रखना पड़ेगा।

क्योंकि सिर्फ आवश्यकता के ऊपर एक जगह रहना सदैव के लिए नहीं हो सकता। सिर्फ आवश्यकता के ऊपर टिका हुआ प्रेम आवश्यकता के साथ बदलते रहता है।

परिवारिक प्रेम बनाए रखने के लिए यदि एक दूसरे में त्याग की भावना ना हो, तो एक साथ सबको बने रहना असंभव है।

आपस में साथ रहने के लिए सभी को कुछ ना कुछ अपनी खुशियों का त्याग करते रहना पड़ेगा। आपस में खुशियों का त्याग ना हो तो परिवार में सदैव के लिए सुख शांति नहीं हो सकता।

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