क्या वास्तव में सुख का चाहत करना दुख का निमंत्रण है।सुख की चाहत ,दुखों को निमंत्रण है ,कारण सुख-दुख कोई वस्तु नहीं ,जो हमेशा पास रहने वाला है, सुख और दुख एक अनुभूति है l सुख को महसूस करना, दुख को महसूस करना ,और उसमें जीना, दुख जल्दी जाता नहीं और सुख कब निकल जाता है पता नहीं चलता ।

सुख में हम डूब जाते हैं इसलिए समय का पता नहीं चलता, और हम दुख में डूब नहीं पाते ,पसंद नहीं करते अंदर ही अंदर निकलने का छटपटाहट रहता है ,यदि वास्तव में दुख नहीं चाहिए तो दुख से भागो मत उस दुख में डूब जाओ, इस कदर डूब जाओ ,कि समय का भान ही ना रहे ,सुख आए तो भी उसमें जियो जरूर पर उसे सुख किस श्रेणी में ना डालो,

जिस दिन दुख में सुखी हो जाओगे, जिस दिन दुख को सुख में परिवर्तित कर दोगे उसी क्षण तुम मृत्युलोक से अमरता की ओर बढ़ जाओगे ,उसी दिन तुम स्वर्ग में प्रवेश कर जाओगे, उस सवर्ग पर तुम्हारा जन्म सिद्ध अधिकार है, सोचो मत प्रयास करो दुख के अंदर सुख को ढूंढने की कोशिश करो ,नित्य निरंतर हर क्षण प्रयास करो, मंजिल तुम्हारे अंदर है किसी की आवश्यकता नहीं ,उसके गुरु तुम स्वयं होगे, तुम ही अपने आप को स्वर्ग में लेकर जा सकते हो, सुख में रोज मत मरो, दुख में जियो !अमर हो जाओ! स्वर्ग की प्राप्ति करो!

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