श्रीमद्भागवत गीता में कर्म ज्ञान भक्ति ज्ञान योग। सनातन धर्म में गीता दर्शन। हिंदू धर्म में श्रीमद भगवत गीता का महत्व।


कर्म ध्यान भक्ति ज्ञान योग का वास्तविक परिभाषा क्या है? श्रीमद्भागवत गीता में अनेकों योग बताए गए हैं, वास्तव में एक दृष्टि से देखें तो श्रीमद्भागवत गीता संपूर्ण तौर पर योग ही है। उन योग में मुख्य चार योग बताए गए हैं। भक्ति योग, ज्ञान योग, कर्म योग, तथा ध्यान योग।

अपने सनातन महान वेद शास्त्र ज्ञाताओं ने अपने-अपने अनुसार से गीता जी के साथ-साथ एक-एक श्लोक का व्याख्या किये हैं।

सभी अपने आप में महत्वपूर्ण है। कहीं-कहीं उल्लेख मिलता है की चारों योग अलग-अलग हैं। परंतु एक दृष्टि से देखा जाए तो चारों ही योग एक दूसरे से जुड़े हुए हैं, या यूं कहें कि चारों योग एक ही है। श्रीमद्भागवत गीता में एक बहुत ही चर्चित तथा खास श्लोक है।

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।।

अर्थात भगवान अर्जुन से कहते हैं-तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए तू कर्मों के फल हेतु मत हो तथा तेरी कर्म न करने में भी आसक्ति न हो॥


भगवान कहते हैं जीव के पास प्रकृति में सिर्फ कर्म करने का अधिकार है, फल समय को पता है। तेरा कर्म फल के लिए ना हो, और कर्म को करने में मजबूरी ना।

भक्ति योग, ज्ञान योग, कर्म योग, तथा ध्यान योग। भक्ति योग को सरल समझें तो, संसार में जो कुछ भी दृश्य मान है सभी परमेश्वर है।

सभी को उन परमेश्वर का स्वरूप समझ कर स्वीकार कर लेना और उनके समक्ष पूर्ण रूप से आत्मसमर्पण कर देना यह भक्ति योग है। इसमें अधिकांश तो भक्तों को अपना ध्यान नहीं रहता, भक्त परमेश्वर की भक्ति में अपने समस्त प्रकार की अहम को परमेश्वर के चरणो में समर्पित कर देता है।

ज्ञान योग में- व्यक्ति को संसार में समस्त शक्ति, तथा शक्ति के स्वरूपों को परम शक्ति परमेश्वर का अंश समझता है।

ज्ञान योग के समय साधक सब एक परम शक्ति की दृष्टि से ही हो रहा है, तथा संसार में जो कुछ भी है एक परम शक्ति ही है और कुछ नहीं। इसमें भक्तों का अपना कोई सत्ता नहीं रहता।



कर्म योग में अपने द्वारा जो कुछ भी किया जाए वह सब कुछ परमेश्वर के लिए ही किया जा रहा है।

वास्तव में हमारा शरीर कर्म के लिए एक माध्यम है, संसार में परम शक्ति परमेश्वर को छोड़कर हमारा अपना कोई नहीं ,इस प्रकार की दृष्टि से जो कर्म किया जाता है ,यह कर्म योग है। यहां भक्त सोचता है कि जो आज अपना है, पहले किसी और का था, और जब हम यहां से जाएंगे उस समय यह संसार किसी और का हो जाएगा।

परंतु परमेश्वर कल भी हमारा था, आज भी हमारा है और जहां जाएंगे वहां भी वही परमेश्वर साथ होगा।

यहां पर भी भक्तों का अपना कोई सत्ता नहीं है।



ध्यान योग में भक्त समस्त संसार को अपने अंदर विराजमान देखता है।

समस्त संसार को परमेश्वर के अंदर विराजमान देखना है, यहां पर भी भक्तों का अपना कोई सत्ता नहीं होता।

यदि ध्यान से देखें तो पता चलता है कि चारों एक ही योग है, अपने केंद्र से हटकर अपने आप को परमेश्वर के अंदर केंद्र कर देना।

भक्ति योग में पूजन के लिए ,भजन के लिए जो कुछ भी परमेश्वर के लिए करता है ,सभीं भक्ति है। कर्म योग में अपना सत्ता छोड़ कर परम शक्ति परमेश्वर के लिए कर्म करता है।

यहां पर भी व्यक्ति अपना केंद्र हटाकर परमेश्वर के अंदर केंद्र करता है। ज्ञान योग में अपना महत्त्व हटाकर, संसार में एक ही परमेश्वर है और उसी से समस्त संसार चलायमान है।

इस दृष्टि में भी केंद्र परमेश्वर है, और आधार भी परमेश्वर है। ध्यान योग में भी समस्त संसार को अपने अंदर देखना भी भक्ति है, और समस्त संसार को परमेश्वर के अंदर देखना भी भक्ति है।



सभी दृष्टि में कर्म हो रहा है, भक्ति, ध्यान, कर्म, ज्ञान हर जगह परम शक्ति परमेश्वर को लेकर एक प्रकार से व्यक्ति के द्वारा कर्म हीं हो रहा है।

अर्थात कहा जाए तो जगत का एकमात्र आधार कर्म ही है, जिसके लिए स्वयं गीता भी कहती है, कि संसार में कोई भी व्यक्ति बिना कर्म किए नहीं रह सकता। यहां पर एक बात बोलने वाला है।

परमेश्वर की भक्ति के लिए चाहे वह कोई भी योग हो, दृष्टि अर्थात उस परमेश्वर को महसूस करने का चिंतन अपना होना चाहिए।

प्रार्थना अपना होना चाहिए, समर्पण अपने द्वारा होना चाहिए, किसी भी प्रकार के योग में, पूर्ण रूप से मन का मिलन आवश्यक है।

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