भारत में अक्सर नए नए मुद्दे खड़े किए जाते हैं, एक ज्वलंत मुद्दा है कृषक बिल।

जरूरत के अनुसार नेता अपना शब्द सुनाने आ जाते हैं और जनता अपना दर्द कहां सुनाएं।मौसम विज्ञानिक नेताजी।


भारत की जनता आखिर अपने आप को कैसे समझाएं? मानने वाले और न मानने वाले वास्तविकता से दोनों परिचित हैं। आजादी के बाद से अब तक क्या क्या हुआ सबको पता है, चाइना अपने से बाद आजाद हुआ बावजूद अपने आप को विश्व का सबसे पावरफुल देश मांगता है।

आज अपने देश में उस चाइना को समर्थन कर कोई भी नेता बन जाता है और कुछ जनता भ्रमित होकर उन्हें नेता भी मान लेती है।

उस जनता को यह पता नहीं है कि वह जिसका पक्ष ले रहे हैं वहां अपना नेता चुनने का अधिकार जनता को नहीं है। राजनीतिक राज करने की एक नीति है, सभीं इसमें कैसे राज तक पहुंचे इसके लिए ही प्रयास करते हैं। आज वही किसानों का अपने लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। कौन किसान?

भारत का असली किसान तो वही है जो थोड़े से खेत को लेकर उसमें मजदूरी करके अपने परिवार का भरण पोषण करता है।

वह किसान का दर्द नहीं समझ सकता जो अपने खेत को मैनेज करने के लिए मैनेजर रख रखा हो। एक आम किसान का हित वह किसान नहीं सोच सकता जो आज तक मंडी वालों के साथ मिलकर बाजार का रेट तय किया करते थे।

एक नेता को क्या चाहिए वह सक्सेस नेता हो यह उसकी तमन्ना है। विपक्ष को क्या चाहिए आने वाला कल उसका सरकार हो।

किसान को संशय है, संशय में अच्छा भी हो सकता है,कोर्ट के आदेश के बाद भी सरकार से युद्ध!  ये दो साल बाद भी तो हो सकता है?

भारत में एक साधारण किसानों की संख्या कितना है, यह हर गांव मैं परिचित है, साधारण किसान की एक ही मजबूरी कि उनके पास खेती की जमीन कम है, वास्तविकता यही है कि वे साधारण किसान गांव में अपने लिए मजदूरी का रेट भी तय नहीं कर सकते।

उन साधारण आदमी को गांव का गंवार व्यक्ति का दर्जा दे दिया जाता है। साधारण किसान की एक ही बड़ी मजबूरी है, की उसके पास खेती के सिवा दूसरा कोई रास्ता नहीं है। साधारण किसान को सिर्फ रेट नहीं चाहिए, गांव में उसके लिए भरपूर रोजगार चाहिए, जिससे कि वह अपने परिवार का शिक्षा से लेकर दवाई तक हर प्रकार से भरण-पोषण कर सके। विरोध की राजनीति बहुत हो चुका, अब जनता सब समझती है, अब जनता को भरमाया नहीं जा सकता।

पहले बंधुआ मजदूर हुआ करते थे, अब नेता बंधुआ वोटर मानते हैं, परंतु ऐसा नहीं है ,अभी किसी का कोई बंधुआ वोटर नहीं है।

बंधुआ वोटर तो सिर्फ वही है, जो पार्टी के सेवक हैं, और जो पार्टी के ऊपर आश्रित है। यदि ऐसा नहीं होता तो यह पार्टियां जनता को जनता को बरगलाने की कोशिश नहीं करते। आज के नए युग में जो नेता यह सोचते हो की जनता हमारे लिए बंधुआ वोटर हो जाएगा वह भ्रम में जी रहे।


 
   

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