रिश्ता क्यों जरूरी है? दुनिया में रिश्ता किसने बनाया ,क्यों बनाया ,किस लिए बनाया ? जिंदगी में रिश्ता क्या महत्व रखता है?

मानवता में रिश्ता का क्या महत्व है?मानवता के लिए आपसी रिश्ते की क्यों जरूरत है?व्यक्ति के अंदर एक महत्वपूर्ण तत्व है और वह है भावना। इतिहास कहता है कि इंसान के अंदर यदि भावना ना रहे तो वह पशु के सदृश्य है। पशु अर्थात जिसके अंदर अपना पराया का बोध ना हो। भावना ही है जिसके ऊपर व्यक्ति किसी का सम्मान करता है अथवा किसी का अपमान करता है। भाव के बिना ना कोई किसी का दुश्मन है और ना ही किसी का दोस्त। और यदि कोई ऐसा है जो बिना किसी दोस्त और दुश्मनी की जीवित है और सिर्फ दूसरों का अहित करने का काम करता है वह शैतान के सदृश्य है।

कोई यदि नरभक्षी हो तो उसे सिर्फ नर का भक्षण करने से मतलब है उसे कोई दुनियादारी से कोई मतलब नहीं।

भावना अर्थात मोह माया! सब कोई जानता है कि संसार में खाने की एक सीमा है फिर भी व्यक्ति अपने लिए बहुत सारा धन एकत्रित करता है। यह भी एक भावना है अपने अपनों के लिए, अपने सपनों के लिए। यही भावना एक दिन मरते वक्त व्यक्ति को नाना प्रकार के तकलीफ दे जाता है।

कारण और इसी भावना को लेकर जिया, इसी भावना में रमन किया, और जिस दिन इस भावना को छोड़ना चाहेगा यह भावना उसे नहीं छोड़ता है।

व्यक्ति जन्म के समय भावना मुक्त होता है, धीरे धीरे उसने मां बनाया, पिता बनाया, भाई बहन बनाया, और नाना प्रकार के अनेकों रिश्ते बनाएं।इसी सिलसिला में उसने आगे चलकर दोस्त और दुश्मन भी बना ली।

एक दिन मरते हो बहुत हद तक यही रिश्ते तकलीफ देते है, चाहे वह जिस रूप में हो, व्यक्ति अपने रिश्ते पर अफसोस करता है, परंतु वह अपनी भावना को बदल नहीं सकता, और इसी भावना के साथ वह संसार छोड़कर चला जाता है।

इसीलिए शास्त्रों ने अनेक बार कहा है कि यमन ही संसार है और मन ही बंधन है। जन्म के वक्त मन होता नहीं धीरे धीरे व्यक्ति मन के बस में होते जाता है और एक दिन यह मन ही तकलीफ दे जाता।

किसी से प्रेम करो तो गुनाह और यदि प्रेम ना करो तो गुनाह।

प्रेम करो तो गुनाह कैसे- क्योंकि आप के अनुपात में यदि सामने वाला प्रेम नहीं करता है तो आपका प्रेम खंडित हो जाता है, और खंडित प्रेम तकलीफ देता है। कोई यदि आप से प्रेम ना करें तो गुनाह, कारण आपका मन खंडित हो गया।बहुत बार ऐसा देखा गया है की इसी भावना के आधीन व्यक्ति किसी पराए को अपना से बढ़कर मानता है, अथवा यूं कहें कि एक पड़ा या अपनों से ज्यादा करीब हो जाता है। इसका निष्कर्ष यह निकलता है की रिश्ता संसार ने नहीं बनाया, सांसारिक व्यक्तियों की भावनाओं ने बनाया।रिश्ते क्यों जरूरी है। क्योंकि व्यक्ति के लिए संसार जरूरी है।

संसार के लिए समाज जरूरी है और समाज के लिए भावना जरूरी है। किसी व्यक्ति को निर्जन प्रदेश का राजा घोषित कर दिया जाए, अथवा उसे निर्जन प्रदेश में भेजकर राजा बना दिया जाए तो क्या उस व्यक्ति का राजा होना अच्छी बात है।

कदापि नहीं क्योंकि निर्जल प्रदेश का राजा बनाने का मतलब यह हो गया कि मानो उस व्यक्ति को देश निकाला दे दिया गया। क्योंकि बिना प्रजा की राजा का कोई औचित्य नहीं है।इसी प्रकार यदि हम आगे विचार करें तो पुत्र के बिना पिता शब्द का कोई औचित्य नहीं है।

भाई के बिना बहन, बहन के बिना भाई, पति के बिना पत्नी, पत्नी के बिना पति, प्रेमिका के बिना प्रेमी, प्रेमी के बिना प्रेमिका इन सभी शब्दों का फिर कोई अर्थ नहीं रह जाता।

एक प्रकार से देखें तो ऐसा नहीं हो सकता कि हम सिर्फ सम्मान पाने का अधिकारी हैं सम्मान देने का कोई कर्तव्य नहीं है। क्योंकि सम्मान देना और लेना दोनों एक सिक्के के दो पहलू हैं।

जैसे रात और दिन। झूठ और सच। एक ही व्यक्ति कहीं समाज को सम्मान देता है और कहीं समाज से सम्मान पाता है।

एक ही व्यक्ति इस समाज में कहीं उपयोगी बनता है तो कहीं उपयोगकर्ता बन जाता है। समाज के अंदर जो सबसे बड़ी भावना है, समाज के अंदर जो आपसी प्रेम हैं, वही रिश्ता कहलाता है।

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