महाभारत के पात्रों से वीरता और साहस का तुलना कोई नहीं कर सकता।

विशाल भारत के इतिहास में सनातन पद्धति में धर्म ग्रंथ का एक बहुत बड़ा समूह है। वेद चार  – ॠग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद; तेरह-उपनिषद, अठारह -पुराण तथा प्रमुख धार्मिक ग्रंथ रामायण, महाभारत, गीता, रामचरितमानस। इनके अलावा सनातन धर्म में महामानव रूपी महापुरुषों की अनगिनत की संख्या में धर्म ग्रंथ मौजूद है और सभी पूर्ण है। एक वक्ता अथवा कभी कोई उदाहरण तो दे देते हैं, परंतु उदाहरण का मतलब यह नहीं होता, कि वह छोटा हो गया। अतुल्य भारत में सभी धर्म ग्रंथ अतुलनीय हैं।


सनातन साहित्य में महाभारत एक ऐसा धर्म ग्रंथ है, जिसमें जीवन को जीने के लिए संघर्ष के आखिरी प्रयास किया जाए वह उदाहरण मौजूद है।

महाभारत को लेकर समाज में कुछ भ्रांतियां भी फैली हुई है, परंतु भ्रांतियों को कोई दूर नहीं कर सकता, कहते हैं वहम का कोई इलाज नहीं। पुराण ग्रंथ में श्रीमद्भागवत गीता, जो श्री अर्जुन को कर्म करने के लिए बाध्य करता है, समाज में कुछ ऐसी भ्रांतियां है की गीता को पढ़ने वाला इंसान, अथवा गीता को आत्मसात करने वाला इंसान योगी बन जाता है।

वास्तव में निर्दोष जीवन जीने का जो संघर्ष है वह योगी बनने के बाद ही हो सकता है।

कितने व्यक्ति महाभारत में डूबने से पहले हीं, भ्रांतियों से डरे रहते हैं। अंतःकरण में भावना कोई और नहीं लिखता, व्यक्ति अपने भावनाओं का सूजन खुद करता है।

समाज में एक और भ्रांतियां है, कि जहां महाभारत है वहां लड़ाई है, परंतु व्यक्ति महाभारत को अपनी शक्ति देने वाले श्री कृष्ण को भूल जाते हैं।

श्री कृष्ण जो अपने हर शब्दों के जरिए कर्म की बात करते हैं।



वास्तव में यदि व्यक्ति महाभारत को गहराई से अध्ययन करें, महाभारत को आत्मसात करें, तू पता चलता है, की महाभारत में लड़ाई कभी किसी ने नहीं कराई, सभी अपने प्रकृति वश कर्म किए और इतिहास के सबसे विशाल युद्ध का रूप लिया।

समाज अपनी समझ के अनुसार किसी न किसी को दोष देता है, कोई धृतराष्ट्र को दोष देता है, कोई कृष्ण को दोष देता है, कोई युधिष्ठिर को दोष देता है, कोई द्रोपदी को दोष देता है, कोई दुर्योधन को दोष देता है।

जब यदि समझ जाएं तो पता चलेगा, की सभीं अपना-अपना कर्म ही तो कर रहे थे। जब जब दुर्योधन को दोषी ठहराया गया तो दुर्योधन ने बार-बार एक ही बात कहा जिसका उत्तर किसी के पास ना था, पिता के अंधेपन का दोष मेरे ऊपर क्यों लगे, पिता अंधे थे तो राज्य नहीं मिला, मैं अंधा नहीं हूं।

पितामह भीष्म अपने वचन की बेड़ियों में फस कर कर्म ही कर रहे थे। मां गंगा अपने बच्चे को जल में प्रवाह कर अपना कर्म ही कर रही थी।

धृतराष्ट्र अपनी अधूरी इच्छाओं की, तथा अपने पुत्र के प्रति अपना कर्म को याद कर कर्म ही कर रहा था। पांचों पांडवों ने मिलकर हर समय अपना कर्म ही किया है। दुशासन दुर्योधन का साथ देकर अपना कर्म ही कर रहा था।

विदुर अपनी उम्र पर्यंत कर्म हीं करते रहे। श्री कृष्णा सभी समय, हर लम्हा कर्म की ही बात करते रहे। द्रोणाचार्य तथा कृपाचार्य अपना अपना कर्म ही करते रहे।

एक बात अफसोस के साथ कहता हूं,कि महाभारत में ऐसा कुछ नहीं है जिसे इसे नजरअंदाज किया जाए। हां इसमें एक बात जरूर है, की महाभारत पूर्णतया क्षत्रियों का जीवनी अथवा जीवन शैली है। शायद इसीलिए इतिहास में इस ग्रंथ को वह स्थान नहीं मिला, जो मिलना चाहिए था।



ऐसा नहीं है कि दूसरे जाति धर्म में प्रभावशाली व्यक्ति नहीं हुआ करते हैं। हर घर में हर जाति धर्म में हर गांव में प्रभावशाली व्यक्ति होते हैं।

हां इसमें एक बात जरूर है कि धर्म का था उसी की लिखी जाती है जो समाज प्रभाव में होता है। महाभारत से निकालकर श्रीकृष्ण को स्वीकार कर लिया गया, श्री कृष्ण की वाणी श्रीमद् भागवत गीता को स्वीकार कर लिया गया, परंतु महाभारत के सभी पात्रों को, अथवा इस पुराण ग्रंथ को पूर्णतया स्वीकार नहीं किया गया।

यह समाज में होता आया है और हमेशा होता रहेगा, एक ग्रंथ का प्रभाव कम करने के लिए वैसा ही एक दूसरा ग्रंथ तैयार किया जाता है, ताकि पीछे वाला ग्रंथ गौण हो जाए।

यदि मैं अपने सरल शब्दों में कहूं तो महाभारत से बढ़कर कोई भी ऐसा उदाहरण मौजूद नहीं है जो हर छन हर लम्हा कर्म योग की शिक्षा देता हो। महाभारत हरिवंश पुराण एक ऐसा गाथा है जो सुनने वाली व्यक्ति के रगों में नवीनतम रक्त का संचार करता है।

करीब से देखें तो इसमें एक जाति विशेष की बात नहीं है। करण के द्वारा हाशिए पर रहे हुए व्यक्तियों के उत्थान की बात करी गई है।

द्रोणाचार्य के द्वारा ब्राह्मण यश की बात करी गई है। राजा भरत के द्वारा एक शुद्ध राजा की बात करी गई। श्री सुदामा के द्वारा एक गरीब और भक्तों की बात करी गई है।

संजय के द्वारा एक सेवक के महत्व की बात करी गई है।

महाभारत को ऊंचा करने के लिए मैंने जो शब्दों का प्रयोग किया है, इसमें किसी जाति धर्म अथवा धर्म ग्रंथ का किसी प्रकार उपहास नहीं है, मेरे अनुसार से सभी के सभी अपने आप में उत्तम है और पूर्ण हैं।

जो व्यक्ति अपने जीवन से आस  छोड़ चुके हैं, जो वास्तव में अपने उलझन  से लड़ना चाहते हैं, जो अपने कर्म को नहीं समझ पा रहे हो।

जिनके दिल में ऐसा लगता हो कि हमें अलग से एनर्जी की आवश्यकता है, जिसे शुद्ध रूप से कर्म योगी बनना हो, जो कुछ करके अपने आप को प्रमाणित करना चाहता हो, उसे निश्चित तौर पर महाभारत श्री हरिवंश पुराण के करीब आना चाहिए, उसे श्रीमद्भागवत गीता के करीब आना चाहिए।

इस भ्रम में ना पड़े की महाभारत में दोष है, श्रीमद्भागवत गीता जिस प्रकार निर्दोष है, वैसे ही श्री हरिवंश पुराण भी निर्दोष है। महाभारत श्री हरिवंश पुराण अतुल्य भारत का अतुल्य पुराण है।

सभी को हृदय से ” जय श्री कृष्ण।” करता है। अपना बहुमूल्य समय देने के लिए तथा सनातन पर चिंतन करने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद!

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