ओम श्री परमात्मने नमः

श्रीमद्भागवत गीता से सभी परिचित हैं, गीता जी के बारे में कितना भी कहा जाए कम होगा।

महानुभाव! श्रीमद्भागवत गीता वास्तव में क्या है? श्रीमद्भागवत गीता के बारे में कितना भी कुछ कहा जाए, कम होगा। राम को पसंद करने वाले राम की भक्ति करते हैं। कृष्ण को पसंद करने वाले कृष्ण की भक्ति करते हैं। शिव को प्रसन्न करने वाले शिव की भक्ति करते हैं।इसमें यह कहते हुए किसी प्रकार भी किसी को भी दुविधा नहीं होना चाहिए कि जिसे जो पसंद है वो उनके करीब जाता है और उनका चिंतन करता है। राम भक्त रामायण को महान मानते हैं, कृष्ण भगवान भक्त भागवत को महान मानते हैं और शिव भक्त शिव महापुराण को महान मानते हैं। ऐसे ही जो जिस के अनुयाई हैं वह उनसे जुड़े हुए ग्रंथ को महान और बड़ा मांगते हैं। यह सत्य है और ऐसा ही होना चाहिए। धार्मिक रीति रिवाज ज्ञान नहीं हो सकता, वह जीने का शैली हो सकता है। जीवन शैली हजारों प्रकार के हो सकते हैं। सनातन धर्म में 33 करोड़ देवी देवता हैं। उनको मानने का तरीका 33 करोड़ हो सकता है। पूजन की एक निश्चित पद्धति हो सकता है। पूजन का एक निश्चित नियम कानून हो सकता है। जो पूज्य देवता के अनुसार मानना भी चाहिए।

परंतु ज्ञान रीति-रिवाजों से कहीं ऊपर होता है। रीति रिवाज समयानुसार हमेशा बदलते रहा है। ज्ञान कभी नहीं बदलता। ज्ञान का अर्थ हो गया शुद्ध ज्ञान। वह ज्ञान जो एक जीव रूपी इंसान को इंसान बनाता है। किसी व्यक्ति के पास यदि इंसानियत का ज्ञान नहीं है ,मानव धर्म का ज्ञान नहीं है तो वहां पूर्ण मानव नहीं हो सकता। शुद्ध ज्ञान रीति-रिवाजों से, संघ संप्रदायों से नहीं निकलता।शुद्ध ज्ञान हमेशा इतिहास के पन्नों से छनकर निकलता है। शुद्ध ज्ञान को कहने के तरीके अलग-अलग हो सकते हैं, एक वक्ता के लिए, लेखक के लिए, इतिहासकार के लिए, भक्त के लिए। ज्ञान को पेश करने के सबके अपने-अपने उदाहरण होते हैं। अफसोस की बात है उदाहरण की तो चर्चा होता है, पर किस संदर्भ में उदाहरण दिया गया, उस पर आजकल चर्चे कम होते हैं। कहने वाले बहुत प्रकार से बहुत कुछ कहते हैं, इतिहास में भी कहते रहे,अभी भी कहते हैं ,और भविष्य में भी कहेंगे। राम वास्तव में थे नहीं थे। राम ने ऐसा क्यों किया। कृष्ण थे नहीं थे, कृष्ण ने ऐसा क्यों किया। भगवान शंकर स्वरूप से हैं कि निराकार रूप से हैं। यदि इस प्रकार से आलोचकों की बात सुनी जाए और मान ली जाए। तो इसका मतलब होगा की सभी इतिहासकार मूर्ख थे, ग्रंथाकार मूर्ख थे। यह आश्चर्य होगा, और यह अपने पूर्वजों को गाली देने के बराबर होगा।

एक जज जब फैसले करता है, तो उसके सामने उस मुद्दे से संबंधित सभीं उदाहरणों को देखकर करता है। उदाहरण से अलग एक लिखित कानूनी मापदंड होता है जिससे कोई भी जज बाहर नहीं निकल सकता। उदाहरण समझने और समझाने के लिए होता है। उसी प्रकार ग्रंथों में पुराणों में, उदाहरण नाना प्रकार के हो सकते हैं परंतु ज्ञान सब में एक ही होता है। सभी ज्ञानी कहता है बेवजह किसी को तकलीफ मत दो। सभी ज्ञान कहता है परिवार में संबंधों का एक मापदंड और दायरा होता है। तभी एक परिवार चलता है, गांव चलता है, शहर चलता है ,देश चलता। मानवता का नियम है तो एक ही होता है, अथवा हो सकता है। और यह नियम को आज नहीं बना है, यह नियम सदियों से चला आ रहा है। कोई मानवता रूपी नियम को ना माने और कुछ और मान ले। यह उसके ऊपर निर्भर करता है।

सनातन धर्म में कोई भी वेद पुराण ग्रंथ हो। उसमें कथाओं में अंतर हो सकता है,सबका मूल ज्ञान तो एक ही कहता है। मानवता! ज्ञान व्यक्ति को मानवता के शिखर पर लेकर जाता है। ज्ञान किसी मानव को जाहिल का नहीं सिखा सकता। अनेक बार, अनेक प्रकार से व्यक्ति आपस में, ग्रंथ, वेद पुराण, साहित्य को बड़े छोटे के लेबल पर मापने की कोशिश करते हैं। जबकि वास्तव में सभी अपने आप में बड़ा है। कोई छोटा नहीं है सबका अपना विशेष महत्व है और सभी हमें मानव बनाना सिखाता है, सभी हमें महान बनाना सिखाता है।

सनातन धर्म इतिहास अपने शब्दों के जरिए बार-बार एक ही बात कहता है!

विद्यां ददाति विनयं विनयाद् याति पात्रताम् ।

पात्रत्वात् धनमाप्नोति धनात् धर्मं ततः सुखम् ॥

विद्या विनय देती है; विनय से पात्रता, पात्रता से धन, धन से धर्म, और धर्म से सुख प्राप्त होता है ।

श्रीमद्भागवत गीता महाभारत ग्रंथ का एक हिस्सा है। एक छोटा सा हिस्सा। परंतु एक छोटा होने के बाद भी गीता का इतना बड़ा विस्तार, धरती पर इतिहास में कोई दूसरा ग्रंथ का नहीं है। महाभारत के रचयिता महर्षि वेदव्यास बताए जाते हैं, व्यास जी के एक नहीं अनेकों काव्य ग्रंथ सनातन धर्म में उपस्थित है। महाभारत की महत्ता अपने आप में कम नहीं परंतु महाभारत से निकलकर गीता महाभारत से कहीं गुना ज्यादा प्रचलित हो जाना यह भागवत गीता की अपने आप की विलक्षणता का प्रमाण है।

श्रीमद्भागवत गीता के बारे में अनेक धर्म संप्रदायों ने अपने अपने तरीके से कहां है। गीता जी के माहात्म्य का कोई अंत नहीं, गीता जी के बारे में अनेक महापुरुषों ने अनेक प्रकार से अपनी अनुभव व्यक्त की उनमें-

ब्रह्म स्वरूप भगवान श्री कृष्ण श्री कृष्ण गीता जी के लिए स्वयं कहा है-

गीता मे हृदयं पार्थ गीता मे सारमुत्तमम्।

गीता मे ज्ञानमत्युग्रं गीता मे ज्ञानमव्ययम्।।

गीता मे चोत्तमं स्थानं गीता मे परमं पदम्।

गीता मे परमं गुह्यं गीता मे परमो गुरुः।।

गीता मेरा हृदय है। गीता मेरा उत्तम सार है। गीता मेरा अति उग्र ज्ञान है। गीता मेरा अविनाशी ज्ञान है। गीता मेरा श्रेष्ठ निवासस्थान है। गीता मेरा परम पद है। गीता मेरा परम रहस्य है। गीता मेरा परम गुरु है।

महर्षि वेदव्यास जी गीता जी के लिए कहते हैं-

गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्रविस्तरैः।

या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनिःसृता।।

जो अपने आप श्रीविष्णु भगवान के मुखकमल से निकली हुई है वह गीता अच्छी तरह कण्ठस्थ करना चाहिए। अन्य शास्त्रों के विस्तार से क्या लाभ?

श्रीमद् आद्य शंकराचार्य जी का कथन है-

गेयं गीतानामसहस्रं ध्येयं श्रीपतिरूपमजस्रम्।

नेयं सज्जनसंगे चित्तं देयं दीनजनाय च वित्तम।।

गाने योग्य गीता तो श्रीगीता का और श्रीविष्णुसहस्रनाम का गान है। धरने योग्य तो श्री विष्णु भगवान का ध्यान है। चित्त तो सज्जनों के संग पिरोने योग्य है और वित्त तो दीन-दुखियों को देने योग्य है।

संत शिरोमणि ज्ञानेश्वर जी कहते हैं-

गीता में वेदों के तीनों काण्ड स्पष्ट किये गये हैं अतः वह मूर्तिमान वेदरूप हैं और उदारता में तो वह वेद से भी अधिक है। अगर कोई दूसरों को गीताग्रंथ देता है तो जानो कि उसने लोगों के लिए मोक्षसुख का सदाव्रत खोला है। गीतारूपी माता से मनुष्यरूपी बच्चे वियुक्त होकर भटक रहे हैं। अतः उनका मिलन कराना यह तो सर्व सज्जनों का मुख्य धर्म है।

महान संत स्वामी विवेकानन्द क्या कहते हैं गीता जी के बारे में-

‘श्रीमद् भगवदगीता’ उपनिषदरूपी बगीचों में से चुने हुए आध्यात्मिक सत्यरूपी पुष्पों से गुँथा हुआ पुष्पगुच्छ है।

महामना मालवीय जी ने कहा है-

इस अदभुत ग्रन्थ के 18 छोटे अध्यायों में इतना सारा सत्य, इतना सारा ज्ञान और इतने सारे उच्च, गम्भीर और सात्त्विक विचार भरे हुए हैं कि वे मनुष्य को निम्न-से-निम्न दशा में से उठा कर देवता के स्थान पर बिठाने की शक्ति रखते हैं। वे पुरुष तथा स्त्रियाँ बहुत भाग्यशाली हैं जिनको इस संसार के अन्धकार से भरे हुए सँकरे मार्गों में प्रकाश देने वाला यह छोटा-सा लेकिन अखूट तेल से भरा हुआ धर्मप्रदीप प्राप्त हुआ है।

श्रद्धेय स्वामी श्री रामसुखदास जी महाराज जी गीता जी के मर्मज्ञ माने जाते रहे, और उन्होंने बार-बार कहा-

भगवद्गीता एक बहुत ही अलौकिक, विचित्र ग्रन्थ है। इसमें साधकके लिये उपयोगी पूरी सामग्री मिलती है, चाहे वह किसी भी देशका, किसी भी वेशका, किसी भी समुदायका, किसी भी सम्प्रदायका, किसी भी वर्णका, किसी भी आश्रमका कोई व्यक्ति क्यों न हो। इसका कारण यह है कि इसमें किसी समुदाय-विशेषकी निन्दा या प्रशंसा नहीं है, प्रत्युत वास्तविक तत्त्वका ही वर्णन है। वास्तविक तत्त्व (परमात्मा) वह है, जो परिवर्तनशील प्रकृति और प्रकृतिजन्य पदार्थोंसे सर्वथा अतीत और सम्पूर्ण देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति आदिमें नित्य-निरन्तर एकरस-एकरूप रहनेवाला है। जो मनुष्य जहाँ है और जैसा है, वास्तविक तत्त्व वहाँ वैसा ही पूर्णरूपसे विद्यमान है। परन्तु परिवर्तनशील प्रकृतिजन्य वस्तु, व्यक्तियोंमें राग-द्वेषके कारण उसका अनुभव नहीं होता। सर्वथा राग-द्वेषरहित होनेपर उसका स्वत: अनुभव हो जाता है।

भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गांधीजी गीता जी के काफी करीब रहे-

एक बार मैंने अपना अंतिम समय नजदीक आया हुआ महसूस किया तब गीता मेरे लिए अत्यन्त आश्वासनरूप बनी थी। मैं जब-जब बहुत भारी मुसीबतों से घिर जाता हूँ तब-तब मैं गीता माता के पास दौड़कर पहुँच जाता हूँ और गीता माता में से मुझे समाधान न मिला हो ऐसा कभी नहीं हुआ है।

अमेरिकन महात्मा थॉरो जी का कथन है-

प्राचीन युग की सर्व रमणीय वस्तुओं में गीता से श्रेष्ठ कोई वस्तु नहीं है। गीता में ऐसा उत्तम और सर्वव्यापी ज्ञान है कि उसके रचयिता देवता को असंख्य वर्ष हो गये फिर भी ऐसा दूसरा एक भी ग्रन्थ नहीं लिखा गया है।

एफ.एच.मोलेम ने कहा है (इंग्लैन्ड)

बाईबल का मैंने यथार्थ अभ्यास किया है। उसमें जो दिव्यज्ञान लिखा है वह केवल गीता के उद्धरण के रूप में है। मैं ईसाई होते हुए भी गीता के प्रति इतना सारा आदरभाव इसलिए रखता हूँ कि जिन गूढ़ प्रश्नों का समाधान पाश्चात्य लोग अभी तक नहीं खोज पाये हैं, उनका समाधान गीता ग्रंथ ने शुद्ध और सरल रीति से दिया है। उसमें कई सूत्र अलौकिक उपदेशों से भरूपूर लगे इसीलिए गीता जी मेरे लिए साक्षात् योगेश्वरी माता बन रही हैं। वह तो विश्व के तमाम धन से भी नहीं खरीदा जा सके ऐसा भारतवर्ष का अमूल्य खजाना है।

गीता जी का अनन्य भक्त-श्री एकादश सेवक महाराज कहते हैं-

श्रीमद्भागवत गीता किसी व्यक्ति विशेष का वचन नहीं है, श्री कृष्ण का वाणी कहना, इसे छोटे रूप में बांधना हो जाएगा। क्योंकि गीता में भगवान स्वयं कहते हैं । हे अर्जुन ! मेरा और तेरा कितने जन्म हो चुके हैं, और इस ज्ञान को मैंने ही सूर्य से कहा था। गीता के लिए कृष्ण को छोटा नहीं कहा जा सकता, परंतु कृष्ण वैष्णव वंश के रहें, सनातन धर्म के रहें। लेकिन श्रीमद्भागवत गीता किसी व्यक्ति विशेष के लिए नहीं है। किसी जाति धर्म वंश स्थान के लिए नहीं है। यह श्रीमद्भागवत गीता संपूर्ण मानव के लिए। संक्षेप में कहें तो यह संसार बनने और चलने का आधार है। देश चलाने के लिए हर देश का अपना एक संविधान होता है। वैसा ही संसार चलाने के लिए एक संविधान है।गीता प्रकृति का संविधान है जिसके आधार पर सब कुछ निश्चित होता है।यदि प्रकृति के संविधान की बात करें तो प्रकृति का एकमात्र संविधान श्रीमद्भगवद्गीता है।

यदि सभी महापुरुषों की बात करें तो गीता जी के बारे में किसी को प्रमाण देने की आवश्यकता नहीं है। श्रीमद्भागवत गीता वास्तव में ब्रह्म की बानी है। उस परमेश्वर का वचन है जो रूप,जाति ,धर्म, वंश ,संप्रदाय और स्थान से कहीं ऊपर है। यदि गीता जी को कृष्ण की वाणी कहेंगे, तो श्री कृष्ण संप्रदाय, वंश और जन्मे हुए पुरुष माने जाते हैं। भगवान श्री कृष्ण गीता जी को कहते समय अपने ब्रह्म रूप का दर्शन करवाया था। वह भी दर्शन अर्जुन दिव्य दृष्टि प्राप्त करने के बाद कर पाए थे। भगवान ने तो यह जिक्र ही नहीं किया, कि मैं जन्मा हुआ हूं और अपने गुरु से शिक्षा लेकर तुझे उपदेश दे रहा हूं।श्रीमद्भागवत गीता जी के बारे में जो कुछ भी जितना भी कहा जाए सब कम होगा।

कोई भी परमेश्वर भक्तों, किसी भी मत संप्रदाय विशेष का व्यक्ति ही क्यों ना हो, यदि अपने इष्ट की वाणी समझकर, श्रीमद्भागवत गीता जी का स्वाध्याय करें, तो परमेश्वर की कृपा से गीता जी का कुछ अंश निश्चित तौर पर समझ पाएगा। श्रीमद्भागवत गीता में वर्ण का उल्लेख भी, मानवता के आधार पर किया गया है। चरित्र-आचरण अपने आप भविष्य में अपना वर्ण तैयार कर लेता है। वर्ण का निर्माण चरित्र ने किया है। वर्ण ज्ञान के अंदर है, ज्ञान वर्ण के अंदर नहीं होता। गीता जी में आचरण के अनुसार सेवन बताया गया है। वर्ण के अनुसार से आचरण नहीं बताया गया है।

आचरण का निर्माण पहले हुआ और वर्ण का निर्माण बाद में हुआ। इसलिए श्रीमद्भागवत गीता वर्णाश्रम का व्याख्या तो करता है, पर चरित्र- आचरण के आधार पर करता है।

वो चरित्र का मापदंड हो सकता है। इसलिए गीता जी में व्यक्ति को चरित्र सुधारने की बात कही गई है। और उसके लिए नाना प्रकार के, योग बताए गए। कोई अपने कुलदेवता, संप्रदाय देवता को छोड़कर किसी दूसरे की भक्ति में लग जाए, यह पाप कर्म कहा गया है।

कोई भी भक्त किसी की भी भक्ति करता हो। वह चाहे किसी को भी अपना परमेश्वर मानता हो। वह उसे हीं अपना परमेश्वर माने, परंतु पूर्णतया माने। जगत का एकमात्र रचयिता माने। वास्तव में परमेश्वर रूप जाति धर्म अथवा संप्रदाय से कहीं ऊपर है। गीता को श्रीकृष्ण की दृष्टि से न देखकर अपने इष्ट की दृष्टि से देखें, गीता जी का निश्चित तौर पर आशीर्वाद प्राप्त होगा।

श्रीमद्भागवत गीता ज्ञान का एक समंदर है, जो डूब गया वह तृप्त हो गया।

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