प्राचीन भारत का दर्द दास्तां। सनातन संस्कृति का विशेषता। सनातन संस्कृति क्या था।
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हिंदू धर्म में प्राचीन भारत की दर्दे दास्तां। हिंदुस्तान के महामानव ने यह सभी कल्पनाएं हजारों साल पहले कर चुके हैं। सनातन भारत की सबसे बड़ी अपनी खास जो संपत्ति है, वह अपना वेद है। सनातन वेद साहित्य ही है जिसके कारण आज भी, भारत में सभी संस्कृतियां दूर दूर रहकर भी, साथ में रहती है।

प्राचीन भारत या यूं कहें सनातन भारत! आधुनिक संसार में वैज्ञानिकों ने अनेक प्रकार से अनेक खोज किए, कहते हैं वैज्ञानिकों का खोज ही आधुनिक संसार का लाया है। यह बात कुछ हद तक ठीक है, कारण हर व्यक्ति हर क्षेत्र में, आगे बढ़ने के लिए कुछ ना कुछ प्रयास करता है।

समाज आज यहां तक पहुंचा है तो निश्चित तौर पर, पूरे समाज का अपना प्रयास रहा है।

परंतु वैज्ञानिक आज, जिन खोज की कल्पना करते हैं, अथवा जिन जिन कल्पनाओं को करके खोज को प्राप्त किया, यदि हम सनातन साहित्य को देखें, तो हिंदुस्तान के महामानव ने यह सभी कल्पनाएं हजारों साल पहले कर चुके हैं। सनातन भारत की सबसे बड़ी अपनी खास जो संपत्ति है, वह अपना वेद है।

सनातन वेद साहित्य ही है जिसके कारण आज भी, भारत में सभी संस्कृतियां दूर दूर रहकर भी, साथ में रहती है।

सनातन वेद साहित्य ही है जिसके ऊपर आज भी भारतीय संस्कृति धरती पर खास है। संसार में मानवता की बात हो, शिष्टाचार की बात हो, स्वास्थ्य की बात हो, परमेश्वर प्राप्ति की बात हो, आधुनिक कल्पनाओं की बात हो, आपसी भाईचारे की बात हो।

वसुधैव कुटुंबकम की बात हो, यह सभी यदि भारत में है तो इसका आधार एकमात्र, सनातन पद्धति है, भारतीय सनातन साहित्य है।

भारत में रहने वाला आज, क्यों ना वह किसी भी धर्म का अनुयाई हो, किसी भी जाति संप्रदाय का व्यक्ति हो, सबके सोच का, सबके जीवन शैली का, आधार भारतीय सनातन साहित्य है।

विदेशी शासकों के आने के बाद सनातन संस्कृति जिसे आज हिंदू धर्म कहा जाता है मानो एक तरीके से छिन्न-भिन्न हो गया हो।

प्राचीन इतिहास में, यह सब कोई जानता है, उस समय आक्रांताओ ने अपने अनुसार से, भारतीय संस्कृति को पूर्णतया नष्ट करने की कोशिश की। अंग्रेज आए और उन्होंने, भारतीय संस्कृति को अपने व्यापार के लिए, मानो बदल कर रख दिया। चुकी उनके बस में, भारतीय सनातन साहित्य को नष्ट करना, पूरी तरह बस में नहीं था, इसलिए सनातन व्यक्तियों को भ्रमित करने के लिए, अनेक मन ग्रंथ कथाएं प्रचलित करवाई। जिससे कि भारतीय सनातन साहित्य गौण हो जाए।

प्राचीन इतिहास में भारत एक सोने का चिड़िया था, यहां आर्थिक तौर पर सभी मजबूत थे।

भारत के सामने धरती पर सभी देश कमजोर थे आर्थिक लेबल पर। सभी की नजरें सोने की चिड़िया पर पड़ी। जो भी यहां पर आया, लूटने के लिए आया, और सभी लूट कर ले गए।

जिस भारत को लूट कर दूसरे पैसे वाले बने, आज वही भारत उनके सामने आर्थिक दृष्टि से नीचे है।


इसमें दोष किसका था, इसमें दोष यदि कहें, तो दोष हमारे सनातन साहित्य में, अथवा साहित्य के अनुसार सिर्फ और सिर्फ हमारे पूर्वजों के सिद्धांत ”अतिथि को भगवान मानना।” ही था।

अतिथि को भगवान मानना आज भी भारतीय संस्कृति में सर्वोच्च स्थान रखता है।

शहरों में तो यह बहुत कम है परंतु गांव में आज भी देखने को मिलता है।
मध्य समय में क्या हुआ? कौन आया और हमारे अधिकारों पर कब्जा कर लिया? यह सोचना अब मूर्खता होगा। क्योंकि अब वह समय नहीं है, वैसा स्थिति हम उत्पन्न नहीं कर सकते।

यह बात संपूर्ण सनातन से जुड़े व्यक्तियों को सोचना होगा, कि भारत सोने का चिड़िया कैसे था।

इसमें बात आज धर्म की न करें, आज जो भी भारत में है, सभी भारत धर्म के हैं। जो अपने आप को भारत धर्म का नहीं मानता, उनकी बात कौन करें। क्या हम पाकिस्तान जैसे सोच वाले व्यक्ति पर चिंतन कर सकते हैं, जो भारत के साथ अंग्रेजों से मुक्त तो हुआ, उसी पाकिस्तान की लाखों व्यक्तियों ने आजादी के लिए अपनी जान गवाई। उसी पाकिस्तान में उन सभी एक धर्म समूह के लोगों को, इसलिए तिलांजलि दे दी गई, कि वे सिर्फ और सिर्फ मुसलमान की बात करते हैं। वैसा सोच श्रेष्ठ भारत में नहीं चाहिए, यदि वैसा किसी को सोच है, तो अपना सोच बदलना होगा।

भारतीय सनातन साहित्य हर जाति धर्म के लोगों का, उसकी अपने पूर्वजों का संपत्ति है।

उस पर सभी का अधिकार है, उसे किसी गैर देश के धर्म को बहुत ज्यादा महत्व देने की आवश्यकता नहीं है। आज वह क्यों ना किसी भी धर्म समूह को फॉलो करता हो, सब के सब एक भारत धर्म के हैं, भारतीय संस्कृति के हैं।

परमेश्वर बदलने की किसी को आवश्यकता नहीं है, मेरा परमेश्वर मेरे लिए अच्छा है, आपका परमेश्वर आपके लिए अच्छा है।

इस नियम के अनुसार परमेश्वर को मानने के तरीके भी सबका अपना हो सकता है।
अब सोचना होगा भारत सोने का चिड़िया कैसे था, क्योंकि एक भारत श्रेष्ठ भारत तो है। अब इसे वापस श्रेष्ठतम भारत बनना पड़ेगा। इसके लिए आज सभी भारतीयों को, धार्मिक पद्धति से अलग अपने को भारत धर्म का मानना होगा। यह सभी को सोचना होगा कि भारत सोने का चिड़िया कैसे था और वापस सोने का चिड़िया कैसे बन सकता है।


इसके लिए सनातन साहित्य को ऊपर उठाना होगा, धर्म की कट्टरता से नहीं, मानवता को लेकर।

भारतीय सनातन साहित्य के ऊपर बहुत बड़े शोध की आवश्यकता है।

आज सरकार के द्वारा अनेक प्रकार से, अलग-अलग शोध किए जाते हैं, उसी प्रकार भारतीय सनातन साहित्य के लिए भी एक अलग शोध की आवश्यकता है। इसके लिए दृष्टि एक ही होना चाहिए, कि भारत सोने का चिड़िया कैसे था, वापस सोने का चिड़िया कैसे बन सकता है।

भारत देश में अक्रांताओं ने एक भारत से अनेक भारत बना दिया था।

उसी कड़ी में एक सनातन धर्म को, जातिवाद की ईर्ष्या में अनेक बना दिया। इतिहास कुछ और था ,और इतिहास कुछ और बना दिया गया। ब्राह्मण बुरे थे, छत्रिय अत्याचारी थे, ऐसी नाना प्रकार के भ्रम पैदा किए गए।

यदि वास्तव में देखें, तो पूरे के पूरे समाज कभी अत्याचारी नहीं होता। समाज का ठेकेदार अत्याचारी हो सकता है।

दृष्टि से यदि आज समाज को देखें, तो आज भी गरीबों पर अमीर राज कर रहे हैं। समाज में कुछ व्यक्तियों के आधार पर पूरे समाज को गलत नहीं कहा जा सकता। जैसे जातिवाद के आधार पर किसी व्यक्ति को अच्छा अथवा बुरा नहीं कहा जा सकता।

भारतीय सनातन साहित्य में मानव जीवन की शुरुआत वहीं से होता रहा।

एक अबोधबालक, अपने माता पिता को छोड़कर, गुरुकुल में पढ़ने जाता है, और वहां उसे किस प्रकार का शिक्षा दिया जाता था। इसके ऊपर शोध होना चाहिए। मानवता रिश्ते को मजबूत बनाता है, और यदि मानवता खत्म, तो रिश्ता खत्म। सनातन साहित्य भाईचारा सिखाता है, भारत में सनातन साहित्य है, तो ही भाईचारा है, भारतीय भाईचारा का आधार है सनातन साहित्य।

भारतीय सनातन साहित्य की मूल सिद्धांतों के ऊपर शोध होना चाहिए, यह एक के लिए नहीं सबके लिए कल्याणकारी होगा।
    

‘सनातन भारत’ का मूल सांस्कृतिक सिद्धांत !  ”वसुधैव कुटुंबकम।”  सनातन सत्य में सभीं  चिंतकों का शुभ आभार!

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