क्या मानव का चाहत कभी पूरा होगा। इच्छा के ऊपर सनातन धर्म और हिंदू धर्म क्या कहता है।
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संसार में क्या मानव का चाहत कभी पूरा होता है? कहते हैं सोच की कोई सीमा नहीं होता, कुछ भी सोच लो। कुछ भी सोचने के लिए कोई रोकने वाला नहीं है, कल्पनाओं की दुनिया, सबकी अपनी अपनी एक अलग दुनिया। सोते हुए सपने कम ज्यादा सभीं देखते हैं, बहुत बार ऐसा होता है, अथवा व्यक्तियों के साथ होता है, जब व्यक्ति जागते हुए सपने देखता है। उस जागते हुए सपने को कहते हैं “चाहत” । चाहत व्यक्ति का कुछ भी हो सकता है, चाहत को आवश्यकता नहीं कहा जा सकता। यदि सिर्फ आवश्यकता की बात करें , आवश्यकता रोटी कपड़ा, मकान और दया-दवा हो सकता है।

चाहना तो अनंत हो सकता है कुछ भी चाहा लो।

यदि वास्तविकता की बात करेंगे तो यह चाहत ही है,व्यक्ति को सुख और दुख के चक्कर में फसाए रखता है। बचपन, युवावस्था, जवानी और बुढ़ापे में अनेक तरह से, अलग-अलग चाहते हुआ करता है, व्यक्ति अपनी चाहतों को पूरा करने के लिए ताउम्र संघर्ष करता है, और मानो खुशियां आते-आते हाथ से फिसल गया हो। चाहत अधूरा ही रह जाता है, और व्यक्ति अधूरी चाहत लिए, न पूरा होने वाला, चाहत के पूरा होने की उम्मीद में, व्यक्ति संसार छोड़ चला जाता है।

“चाहत” कमबख्त ज्यों का त्यों बना रहता है।

दोष किसको दें, चाहत पुरा न करने वाले व्यक्ति को, चाहत पैदा करने वाले दृश्य को, चाहना करने वाले व्यक्ति को, चाहत बनाने वाले परमेश्वर को, या फिर “चाहत” को!


सोए हुए व्यक्ति को अपने सपने पर अपना अधिकार नहीं होता।

परंतु जागते हुए जो व्यक्ति सपना देखता है, उसे तो निश्चित तौर पर, अपने सपने बुनने का अधिकार है, स्वयं व्यक्ति कौन सा सपना बन रहा है, कौन सा सपना उसे आसमान की बुलंदियों की तरफ लेकर जाएगा, या फिर कौन सा सपना उसे दुख के भंवर में लेकर जाएगा, उसे तो यह स्वयं ही सोचना होगा। चाहत पैदा करने का अधिकार मिलने का मतलब यह नहीं होता, कि व्यक्ति कुछ भी चाहना कर ले।
यदि कोई व्यक्ति अपने लिए किसी दूसरे व्यक्ति से अपेक्षा रखता है।

पहले उसे यह सोचना होगा, अपने जीवन में हमने क्या चाहत किया, और क्या पूरा हुआ।

हमने दूसरे व्यक्तियों के चाहत का, कितना सम्मान किया, कितना पूरा किया। चाहत एक भंवर जाल है, जिसे व्यक्ति स्वयं ही, रोज मेहनत करके बुनता है।

व्यक्ति के पास जाल को बुनने का अधिकार है, परंतु उसे तोड़ने का अधिकार, सिर्फ प्रकृति के पास है।

इसलिए भारत के प्राचीन महामानव, सनातन वेद साहित्य में बार-बार निर्देश देकर गए  “खुली आंखों से सांसारिकता के सपने मत देखो, यह तुम्हें गर्त में लेकर जाएगा।

नाशवान का सपना देखोगे, उस सपने का नाश हो जाएगा।

अविनाशी का सपना देखो, जब मरोगे, अंत समय भी वही सपना साथ होगा।”
इसलिए चाहत तो होना चाहिए, परंतु सिर्फ वह “चाहत” जो सिर्फ और सिर्फ आनंद दें।
    ‘सनातन भारत’ का मूल सांस्कृतिक सिद्धांत !  ”वसुधैव कुटुंबकम।” 

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