सनातन धर्म में रोग कैसा है? हिंदू धर्म अपने सिद्धांत के लिए क्या कहता है।

सनातन धर्म में किस प्रकार का रोग है। सनातन की बात तो अनगिनत महापुरुष करते हैं, परंतु वास्तव में सनातन को क्या चाहिए, इसकी बात कोई नहीं करता। सनातन पद्धति लड़ाई की बात नहीं करता, सनातन साहित्य अपने अंदर कुविचारों से लड़ने को प्रेरित करता है। अंततः की लड़ाई सार्थक ना होते हुए भी बेवजह नहीं होता। सनातन पद्धति अपनी कल्याण की मांग करता है, परंतु व्यक्ति सनातन को लेकर अपनी कल्याण में लग जाता है।

यदि विचार करें तो यह आभास होगा की सनातन का अहित करने वाले, बाहर से कहीं गुना ज्यादा अंदर है।

इस बात को हर सनातनी को सोचना होगा, हमारे अंदर रोग कौन सा है। निश्चित तौर पर यह जिम्मेवारी सभी सनातन के ठेकेदारों पर जाता है। कहते हैं एक म्यान में एक ही तलवारे रहा करती है, परंतु यहां तो हजारों की संख्या में तलवारें मौजूद है। सभी को अपने लिए अपना म्यान चाहिए। अपने म्यान के लिए वे कुछ भी करेंगे, यदि जरूरत पड़ा तो निश्चित तौर पर, विरोधी के दुश्मनों से भी जा मिलेंगे, इसमें शंका नहीं है। इस प्रकार की घटनाएं अनेकों हो चुके हैं।

सनातन में रोग की बात करें – व्यक्ति के अंदर आस्था का कोई मापदंड नहीं है।

आस्था व्यक्ति के अपने ऊपर निर्भर करता है, किसी की आस्था का परिहास होना, आस्था की लकीर को कमजोर करता है। भारतीय सनातन पद्धति भूतकाल में तो एक ही रहा, परंतु आज अनेक हो गया यह भी बहुत बड़ा रोग है।आज समाज मैं एक व्यक्ति आजादी की तो बात करता है, अभिव्यक्ति की आजादी, नेता चुनने की आजादी, अभीनेता चुनने की आजादी। परंतु धर्म में आजादी उसी को पसंद नहीं।

कहीं परमेश्वर भी अपनी मर्जी से नहीं चुन सकते।

परंतु सनातन गलत, परमेश्वर भी अपनी मर्जी से चुन सकते हो, उस परमेश्वर को, जिस परमेश्वर को आज तक किसी ने नहीं देखा, बड़े-बड़े महामानव हुए जिन्होंने उस परमेश्वर के खोज का अनुसंधान किया, अपनी कल्पनाओं को साकार करने की कोशिश किया, बहुत! बहुत हद तक सफल भी हुए। जिन्होंने उस परमेश्वर को देखा, अपने शब्दों से, क्रियाकलापों से व्यक्त तो कर गए। उस परमेश्वर को किसी ने माना किसी ने नहीं माना। किसी की बातों को माना जाए अथवा न माना जाए, यह हर व्यक्ति का अधिकार है।कहावत है परमेश्वर आसानी से नहीं मिलता, अफसोस इसलिए परमेश्वर का खोज छोड़ दिए। हमने उस परमेश्वर को किसी और की आंखों से देख लिया, और यह मान बैठे कि वह परमेश्वर मेरी आंखों से नहीं दिखेगा। बस! अब तो हम उस देखने वाले महामानव को ही भगवान मानकर तसल्ली कर लेंगे।

क्या कोई ऐसा सोच सकता है की भारतीय सनातन वेद साहित्य में हमारे परमेश्वर खोज की अनुसंधानकर्ताओं द्वारा बार-बार यह कहा गया है ।

परमेश्वर का वास्तविक स्वरूप क्या है, और परमेश्वर कैसे प्राप्त हुआ करता है। जिन्हें उन महामानव के ऊपर भरोसा है, तो भी और नहीं भरोसा है तो भी। परमेश्वर खोज के लिए हर व्यक्ति को अपना एक अनुसंधान करना होगा। हर व्यक्ति का प्रकृति अलग होता है। सिर्फ और सिर्फ उत्तराधिकारी बनकर, सनातन सनातन चिल्लाने से नहीं होगा। परमेश्वर मेरा तुम्हारा, अपना या आपका इस प्रकार से नहीं होता। परमेश्वर सब का है, भूत भविष्य वर्तमान वह सब का है, दूसरे के भोजन कर लेने से, अपना पेट कभी नहीं भरता। दूसरे के देखे को मान लेने से, क्षणिक संतुष्टि तो हो सकता है, परंतु परमेश्वर की प्राप्ति नहीं हो सकता।

सनातन के रोग को हर सनातनी को सोचना होगा, खोजना होगा ।

सभीं परमेश्वर की प्राप्ति करें अथवा न करें, यह तो परमेश्वर के ऊपर ही छोड़ देना चाहिए, उसकी मर्जी वह सामने आए अथवा ना आए। परंतु कोशिश तो हर व्यक्ति को करना चाहिए।एक सत्य बात है, अधिकांश पूजन क्रिया, व्रत क्रिया, संकल्पित होता है, संकल्प संसार के लिए है, संकल्प किसी उद्देश्य के लिए है। यह सभी परमेश्वर को प्राप्ति करने के लिए नहीं है। यह सभी तो सांसारिक सुखों की प्राप्ति के लिए है। कहते हैं परमेश्वर तो भक्ति से मिलता है, और भक्ति के लिए कुछ नहीं चाहिए। महामानव के शब्द तो आधार है महामानव को सबको आधार है, सद्गुरु को प्राप्त कर, आगे बढ़ना है। यह हर सनातनी को सोचना होगा, कि भविष्य में सनातन परिहास का विषय न बने। सनातन के अंदर मौजूद भेदभाव को मिटाना होगा।

सनातन तो एक ही है, परंतु आज अनेक बना हुआ है।

यही सबसे बड़ा रोग है। अंदर घुसे हुए इस रोग को मिटाने की हर व्यक्ति को कोशिश करना। एक सनातनी कभी भी बेवजह किसी का आहित नहीं कर सकता ‌।

यदि हम वास्तव में इस जगत को सनातन का मूल मानते हैं तो हम सबको यह समझना होगा, अपने लिए न सही सनातन के लिए, सनातन को समझना होगा, सनातन धर्म व्यवस्था को समझना होगा।

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