हिंदू धर्म और सनातन धर्म दोनों एक ही है।

सनातन धर्म में एक ग्रंथ है, रामायण और रामायण में सर्वोपरि पुरुषोत्तम श्रीराम का चरित्र है।

हिंदू धर्म में भक्त भगवान को कहां खोजें? महानुभाव! श्री रामायण एक चरित्र विशेष ग्रंथ है, अनेक भाषाएं तथा टीका में मौजूद है। समाज में ग्रंथ के साथ-साथ इसमें मौजूद चरित्र की भी पूजा होता है।कुछ ऐसे भी हैं जो ग्रंथ और चैत्र के ऊपर आक्षेप किया करते हैं, श्रीराम किसी के देवता तो किसी के भगवान हैं, रामायण! किसी के लिए काव्य हैं तो किसी के लिए मात्र एक किरदार।

व्यक्ति समझ ही नहीं पाते 33 करोड़ देवताओं की पूजा क्यों? कैसे कैसे कहें, क्या कहें, सनातन धर्म में 33 करोड़ देवी देवताओं का जिक्र किया गया है। प्रश्न उठता है इतने सारे देवता क्यों, क्यों पूजते हैं हम इतने सारे देवताओं को! ऐसा लगता है मानो सुन लिया मान लिया और पूजने लग गये।क्या लगता है, ऐसा क्या है कि लोग आक्षेप करते हैं तो भी हम चुपचाप सुन लेते हैं।हमारे अंदर राम को मानने का मापदंड क्या है, हमारा भगवान ऐसा है कि उसके बारे में जो कहा जाए कोई भी आक्षेप किया जाए हम सुन ले, हमें अपना दिमाग लगाने की जरूरत नहीं है, समाज में यह भी कहा जाता है कि फलाना अमूका आदमी बहुत अच्छा भगत है बस! हमारे मन में तसल्ली हो जाता है, हम तो राम के बहुत करीब है। क्या यह सब सत्य है।परमेश्वर एक खोज! कहां हो खोजेंने जाएंगे उस परमेश्वर को ! कहां रहता है वह!

आदिकाल से महापुरुषों ने अनेक प्रकार से अपनी अपनी ताकत लगाई।कोशिश की उस परमात्मा के पास पहुंचने की, बहुत लोग इसमें सफल भी हुए, और अनेक महात्माओं को, अथवा महापुरुषों को जो ज्ञात हुआ। सबने अनेक प्रकार से भांति भांति से प्रकट की किए। परमात्मा के स्वरूप का विस्तार किए। अपना अनुभव आने वाले साधकों के लिए प्रस्तुत कर गए।वेद कहता है, शास्त्र कहता है, पुराण कहता है, ऋषि महर्षि कह गए।

33 करोड़ देवता क्यों? राम क्यों, यदि रामकृष्ण क्यों? लक्ष्मी क्यों, और यदि लक्ष्मी फिर दुर्गा क्यों?

श्रीमद्भागवत गीता कहतीं हैं। परमेश्वर बिना आकार वाला, उसका कोई रूप नहीं, वो सब में हैं और सब उसमें है। उन्हें स्त्री है ना पुरुष है, को स्वयं सब शक्तियों का शक्ति स्रोत है,और एक उसी की शक्ति से संपूर्ण जगत शक्तिमान है। वह जगत के कण-कण में विराजमान हैं और और ब्रह्मांड का हर कन उसमें स्थित है।अब बात आता है 33 करोड़ देवता क्यों? राम क्यों, यदि रामकृष्ण क्यों? लक्ष्मी क्यों, और यदि लक्ष्मी फिर दुर्गा क्यों? गंगा क्यों और यदि गंगा फिर यमुना क्यों?

कहां गया है , खोजोगे तो हीं पाओगे। सोचोगे विचार करोगे तभी समझ पाओगे। खट खट आओगे तो ही खुलेगा, और जब कुछ करने की कोशिश करोगे तभी होगा

मार्ग पर चलोगे कोशिश करोगे तभी मंजिल सामने आएगा और तभी पहुंचोगे। आगे क्या बात फिर वहीं आता है राम ! फिर और श्याम और क्यों।सनातन धर्म जगत का सबसे प्राचीन धर्म रहा है,।

वास्तव में सनातन धर्म कोई धर्म नहीं है। सनातन मार्ग को आज के समय धर्म की उपमा देंगे तो सनातन बहुत छोटा हो जाएगा। वास्तव में जिस धर्म की उपमा जहां धर्म की दी जाती है वह धर्म धर्म होता ही नहीं, धर्म के विषय पर आगे बात करेंगे।सनातन एक पद्धति है, एक प्राचीन मार्ग है, प्राचीन विज्ञान है, परमात्मा को प्राप्त करने का, उसकी भक्ति करने का, सबसे प्राचीन पद्धति है सनातन मार्ग। यह कहने से किसी को गुरेज नहीं होना चाहिए की सनातन शब्द ही सबसे प्राचीन शब्द है और सनातन का इतिहास सबसे पुराना रहा है।

सृष्टि के शुभारंभ से परमात्मा की भक्ति के लिए, वर्तमान तथा भूतकाल में महर्षि, महात्मा, देवदूतों द्वारा किया गया नाना प्रकार के प्रयासों का, उपलब्धियों का फल है सनातन मार्ग। दुर्भाग्यवश यह कहना पड़ता है कि इस प्राचीन सनातन पद्धति में लालच वश, मोह वश, राजनीति वश, दुर्भावना वश और क्रूरता वश बहुत से भ्रमण रूपी जाल बुना गया। विरोधियों ने इस पद्धति को जड़ से मिटाने की कोशिश की, परंतु कोई भी इस जड़ को मिटा नहीं सका, कहा जाए सनातन मार्ग परमात्मा को पाने का परमात्मा की भक्ति करने का एकमात्र सनातन पद्धति है। जब सनातन मार्ग में मिलावट की वजह से इस मार्ग का परिहास हो गया उस समय भी, सनातन मार्गी लोगों का, विश्वास बना रहा और भी सनातन पद्धति का अनुसरण करते रहें। परंतु वास्तव में पद्धति से निकलकर अनेक पद्धतियों ने अपना अपना रूप ले लिया। एक सनातन मार्ग से निकल कर अनेक पंत का निर्माण हो गया।

आज के समय में तुलना करने वाले तुलना करते रहें परंतु सबका मूल सनातन हीं है।राम ही क्यों कोई और क्यों नहीं?महानुभाव सनातन पद्धति में सनातन मार्ग मानने वाले जितने भी देवी देवता को जानते हैं वे यदि एक-एक कर उनके बारे में चिंतन करें, तो यह स्पष्ट पता चल जाएगा की सनातन मार्ग में 33 करोड़ देवताओं की पूजन में चरित्र विशेष है,

सब चरित्र के अनुसार से हीं मान देते हैं ,चरित्र के अनुसार से पूजते हैं और चरित्र के अनुसार से ही बड़ा छोटा है। जैसा चरित्र वैसा पूजन यजन वैसे ही उनके अनुयाई रहे हैं। एक बात सनातन पद्धति का जो मुख्य आधार रहा है यह है कि अपने इष्ट का चयन में स्वेच्छा। इसमें परमेश्वर को मानने का किसी प्रकार का बाध्यता नहीं है। उसका भी एक कारण है। वेद शास्त्र बार-बार यह कहते हैं, कि परमेश्वर बल से बुद्धि से योग से तप से प्राप्त नहीं होता। वो जिसे स्वीकार करता है वही योग्य है और वही प्राप्त करता है। अथवा परमेश्वर बल बुद्धि योग तप से पड़े हैं ।

सनातन मार्ग में बाध्यता नहीं होने की वजह से, बाध्यता संस्कार में नहीं है ।जिसके वजह से बाहर वाले तो आलोचना करते ही हैं , इसके अंदर वाले भी बहुत से आलोचक बन जाते हैं। यदि बात अपनी आलोचकों की करें तो वे दीमक की भांति है जो अंदर ही अंदर सब खोखला किए जाते हैं। पढ़ाई उन्हें तो धर्म का मजाक बनाया, यदि अपने ही धर्म का मजाक बनाते हैं तो वे अपने ही धर्म का जड़ काटा करते हैं।

जिसके लिए सनातन मार्ग में सनातन पद्धति में किसी प्रकार का सजा का प्रावधान नहीं है। जिसका विरोधी फायदा उठाते थे, उठाते हैं ,और उठाते रहेंगे।आलोचक भगवान को भगवान नहीं मानते।परमेश्वर को जन्मा हुआ अथवा रामायण का मात्र एक किरदार मानते हैं, उनके दृष्टि में राम और रामायण काल्पनिक है। उनका कथन है कि राम को मानने वाले रामायण को मानने वाले सब के सब मुर्ख हैं। अब बात आता है उस आलोचक का अपना चरित्र क्या है, उसका मूल क्या है, और यदि उसको अपने मूल के बारे में पता नहीं है, तो उसे अपने चरित्र के महत्व भी पता नहीं होगा,और जिसे अपने चरित्र का पता ना हो वह दूसरे के चरित्र का हनन करने में किसी प्रकार का संकोच नहीं करेगा।

वास्तव में समाज की दृष्टि से हम देखें तो पता चलता है की पति भी अपनी पत्नी को चरित्र के अनुसार से मान देता है।

एक पत्नी भी अपने पति को उसके चरित्र के अनुसार से मान देती है। यदि एक पिता को 5 पुत्र हैं तो सबको सब के चरित्र के अनुसार से मान देता है। यहां तक कि स्वयं के नजर में भी ,सामने मौजूद व्यक्ति के चरित्र के अनुसार ही मान सम्मान होता है।सामाजिक बाध्यता वश, मजबूरी बस सामने वाले को ना चाह कर भी थोड़ी देर के चरित्र से अधिक यदि मान सम्मान देता है, तो भी उसका औकात स्वयं के नजर में मौजूद होता है। इस तथ्य को कोई झुठला नहीं सकता यह वास्तविक सत्य है।सनातन पद्धति में अपने इष्ट का चयन सामाजिक मापदंड और बाध्यता से नहीं अपनी स्वेच्छा से किया जाता है।

इसी कारण भूतकाल में चरित्र को मापदंड बनाकर भक्तों अनुयायियों ने 33 करोड़ चरित्र को महत्व दिया और माना।सनातन पद्धति में किसी देवी देवता ने अपने चरित्र के साथ क्रूरता दिखाकर यह नहीं कहा कि मुझे तुम्हें मानना पड़ेगा, अथवा किसी बड़े अनुयाई ने किसी रूप अथवा नाम को किसी के ऊपर नहीं थोपा। और इतिहास में ऐसा भी नहीं हुआ कि भक्तों ने अनुयाईयों ने ऐसी बातों को स्वीकार कर लिया, अपना इष्ट मान लिया हो। यह सनातन मार्ग है सनातन पद्धति है, यही सनातन पद्धति का खूबसूरती है, इसका अच्छाई है।फिर आते हैं आलोचकों के बारे में तो मूर्खों को कौन समझाए।

आज के युग में भी ! कर्म और चरित्र के ऊपर ही महत्व दिया जाता है। यदि ऐसा नहीं होता तो समाज में- भारत रत्न, पद्मश्री, आक्रांत, महान, जालिम, वरिष्ठ, पूजा स्मारक, कुपुत्र, व्यभिचारी, अनाचारी, अत्याचारी, समाजसेवी इत्यादि शब्द जन्में ही नहीं होते। जो नहीं समझते हैं वे चाहकर भी नहीं समझ सकते, क्योंकि उन्हें अथवा उनके अपने को समाज ज्यादा महान क्यों नहीं कहता है वे सदैव इसी उलझन अपना जीवन गुजार देते हैं, और नित्य दूसरे को दोष दिया करते। उन्हें यह पता नहीं होता कि उत्तम चरित्र ही महान बनाता है। चरित्र की विशेषता महानतम की ऊंचाई तय करता है। कुछ ऐसे भी व्यक्ति होते हैं जो सामाजिक बाध्यता को ध्यान में रखकर किसी को मान देने को बाध्य करते हैं।

सनातन पद्धति वह मार्ग है जिसमें व्यक्ति चरित्र से प्रभावित होकर उस चरित्र का गुणगान करता है। जो व्यक्ति सनातन पद्धति को मानते हैं वे अपने इष्ट के चरित्र को छुपाते नहीं हैं, वे सदैव चरित्र का गुणगान किया करते, बहुत बार उस गुणगान में वे बहुत आगे भी निकल जाते। कारण वे चरित्र में डूब चुके होते हैं उनके प्रेम सम्मान का आधार ही ईस्ट का चरित्र होता है।श्री राम जन्में हो सकते हैं, काल्पनिक भी हो सकते हैं, परंतु उनका चरित्र सर्वोपरि है।

सनातन पद्धति वाले यदि उस परमेश्वर को, राम को ब्रह्म का स्वरूप मानते हो, तो ये उनकी सोच है, उससे किसी को आपत्ति नहीं होना चाहिए, आश्चर्य भी नहीं होना चाहिए। आखिर कोई किसी को इश्ट मानने के लिए मजबूर कैसे कर सकता है, और यदि कर भी ले, तो वह उस परमेश्वर का अनुयाई नहीं हो सकता, बाध्यता में समर्पण हो सकता। आश्चर्य की बात है, जो राम को नहीं मानने वाले हैं वह भी, राम जैसा पति का तमन्ना करते हैं, राम जैसे पुत्र का आशा करते हैं, राम जैसे भाई का सपना देखते हैं, राम जैसे राजा का व्याख्यान देते हैं।

राम चरित्र! वे राम जो दूसरों के लिए पूरे जीवन को जिया हो , अपने को केंद्र बनाकर अथवा अपनों को केंद्र मानकर कभी कोई फैसला अथवा इच्छा व्यक्त ना किया हो। जिसने पूरा जीवन समाज सेवा में लगाया हो, जो पिता के शब्दों के लिए 14 वर्ष का वनवास किया हो, जो एक राज्य को जीतने के बाद भी उसके ऊपर अपना आधिपत्य ना रखा हो, जिसने पूरे जीवन सबको मान दिया। राम एक राजा होकर भी समाज में विपरीत अवधारणा ना हो उसके लिए अपनी पत्नी तक का त्याग कर दिया हो, क्या उसके चरित्र से किसी का तुलना हो सकता है। राम ऐसे ही पुरुषों में पुरुषोत्तम नहीं कहलाते हैं।

चरित्र का पूजा अथवा चरित्र के अनुयाई, अनादि काल से रहे हैं और आगे भी रहेंगे। क्योंकि उत्तम चरित्र वाला व्यक्ति अनुयाई नहीं बनाता, वास्तव में उसका चरित्र ही अपना अनुयाई बना लेता है। राम वो राजा रहे, जिन्होंने अपने को मानने के लिए कभी किसी को बाध्य नहीं किया। सब ने स्वेच्छा से उस राम को अपना राजा मानें। रामराज्य जिसका तुलना स्वर्ग के अमरावती से किया जाता है।कोई किसी को कुछ समय के लिए गुमराह कर सकता है, भ्रम में डाल सकता है, मजबूर कर सकता है,पर उत्तम चरित्र का छाप किसी के दिल से मिटा नहीं सकता। हां यह हो सकता है, कि कोई विपरीत चरित्र वाला व्यक्ति, विपरीत चरित से प्रभावित होकर उसके पीछे चला जाए। तो यह बात अनादि काल से होते रहा है और आगे भी होता रहेगा इसे कोई बदल नहीं सकता है।

श्री राम का चरित्र हीं उन्हें भगवान, परमेश्वर और किसी का इष्ट बनाया, क्योंकि रामचरित्र सर्वोपरि है। उनका अनुयाई उनसे से डर कर उन्हें नहीं मानते उनका, उनके भक्त, अनुयाई राम चरित्र को मानते हैं। इसलिए राम! भगवान माने जाते हैं, परमेश्वर माने जाते हैं, साक्षात ब्रह्म के स्वरूप माने जाते हैं। इसीलिए उनके भक्त, उपासक, अनुयाई उनके लिए नाना क्रिया, पूजा, जप, तप, योग रूपी कर्म किया करते हैं।

कोई माने अथवा ना माने उत्तम चरित्र सदैव उत्तम होता है, चरित्र को लेकर ही कोर्ट कचहरी बनते हैं, जिसमें चरित्र का मापदंड किया जाता है, दुनिया बनने के साथ ही चरित्र भी बनता है, जब-जब पुरुषोत्तम चरित्र बनेगा, तब तब वह राम बनेगा, और उस राम के लिए युगों युगों में पूजा जप तप योग रूपी कर्म होते रहेंगे- यह श्री राम चरित्र की वास्तविकता है। आनंद।

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