श्री राम की चर्चा तो राम से ही होना चाहिए “सभी को राम राम” ।

राम चरित्र मानस एक चौपाई है-ढोल गंवार सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी॥

ढोल गवार शुद्र पशु नारी यह चौपाई जातिवाद के लिए क्या कहता है। इस चौपाई वास्तविक अर्थ समझने के लिए हमें बहुत दूर दूर जाने की आवश्यकता नहीं है, यदि हम सब चिंतन करें तो बहुत ही आसानी से समझ में आ जाएगा। जितना हम दूर जायेंगे उतना ही चौपाई से भटक जाएंगे। इस चौपाई को सीधा समझना होगा।

जो लोग जाति धर्म को लेकर समाज में वर्षों से भ्रम फैलाते आए उन्हें अनभिज्ञ कहा जाए तो अनुचित नहीं होगा।

सनातन साहित्य जातिवाद को बढ़ावा नहीं देता।दृष्टि ढोल गवार शुद्र पशु नारी। – रामचरित्र मानस।श्री तुलसीदास जी ने एक शब्द भी गलत नहीं कहा। इसे समझने के लिए पहले, अतीत में जाति धर्म व्यवस्था पर रोशनी डालना होगा, उस समय के स्थिति को समझने की कोशिश करना होगा। श्री तुलसीदास जी ने इस चौपाई को उदाहरण के तौर पर लिखा है। जो एकदम सीधा और सरल है। हम इसे समझने के लिए कोई लाग लपेट से बात नहीं करेंगे।यदि कहा जाए इस चौपाई को अपने अनुसार से इस्तेमाल करने वाले पक्ष और विपक्ष दोनों ही वास्तविकता से कोसों दूर है।

एक नारी के लिए जो आज समाज में व्यवस्था है अतीत में ऐसा नहीं था।

उस समय नारी को उपहार के रूप में किसी को दे दिया जाता था, उस समय नारी सिर्फ और सिर्फ भोग की एक वस्तु हुआ करती थी, परंतु आज ऐसा नहीं है, कुछ अल्प वाक्य को छोड़ दें, तो आज की नारी पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही है। इस चौपाई में जो विशेष है वह ढोल गंवार सूद्र पसु ,सकल ताड़ना अधिकारी।

गीता प्रेस गोरखपुर आवरण पृष्ठ

इस चौपाई को लेकर, कोई तुलसीदास जी को गलत कहता है।

कोई रामायण को ही गलत कहता है, कोई इसको लेकर श्रीराम के ऊपर ही आक्षेप करता है। सबको पता है श्री विभीषण धर्म की राह पर चलें, धर्म का साथ दिया, वह किया जो करने के लिए वह आए थे, उसके बावजूद समाज में श्री विभीषण का नाम हर जगह गलत समय के वक्त लिया जाता है। दोष इसमें न श्री विभीषण का है, और उनको प्रस्तुत करने वाले रामायण का।बहुत दूर ना चलकर वापस मुद्दे की बात करते हैं।

“ढोल गंवार सूद्र पसु ,सकल ताड़ना अधिकारी।”

उदाहरण में सभी को एक तरीके से समाज के सबसे नीचे तबके को, अथवा सबसे अल्पज्ञ को दर्शाने की कोशिश किया गया है। इतिहास सबको पता है, काल के अनुसार सामाजिक व्यवस्थाएं बदलता है। वास्तव में प्राचीन सनातन वेद साहित्य जातिवाद धर्मवाद की बात करता ही नहीं, और यदि कहीं कोई उल्लेख मिलता है, जातिवाद का गंध फैलाने के लिए शास्त्र, लेखक अथवा वक्ता सब गलत है ‌।

श्रीमद्भागवत गीता को किसी के प्रमाण की आवश्यकता नहीं है।

इसमें वर्णाश्रम की बहुत ही गहराई से वर्णन किया गया है। धर्म की भी बात की गई है।जब संसार में समाज का निर्माण हो रहा था, उस समय से पहले कोई भी वर्णाश्रम का उपनाम नहीं था। शास्त्र व्यक्ति के आचरण के आधार आधार पर वर्णाश्रम की संज्ञा देता है। शास्त्रों में जो चार वर्णों का जो जिक्र किया गया है वह आचरण के आधार पर किया गया। इसलिए नहीं किया गया कि उस उपनाम के आधारित एक विशेष वर्ग को अलग कर दिया जाए।

श्री रामचरित्र मानस

विद्यां ददाति विनयं,विनयाद् याति पात्रताम्।

प्राचीन इतिहास से हीं सनातन वेद साहित्य विद्या का सागर रहा है, और इस सागर में धरती के लगभग सभी महामानवों ने गोता लगाया है। विद्या विनय देता है, व्यक्ति को सभ्य बनाता है। विनय और सभ्य व्यक्ति को किसी प्राप्ति का हकदार बनाता है।यह अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि अतीत में, कुछ अल्पज्ञ, जोकि अपने आप को महान मानते हो।

शास्त्रों में लिखे हुए वर्णाश्रम को अपने लिए हथियार के रूप में इस्तेमाल किया।

एक पिता की चार पुत्र हो और सबका अपना अपना अलग-अलग विचार हो, चरित्र हो तो पिता को भी सबका एक उपनाम लेना पड़ता है। यदि पिता समाज हो तो नया नाम बना सकता है, परंतु पिता समाज नहीं होता इसलिए वह समाज में फैले एक उपनाम को उपयोग करता है।व्यक्ति समझने के बजाय, इतिहास को, अथवा इतिहासकार को दोष देता है।

सनातन वेद साहित्य वर्णाश्रम की व्याख्या को प्रस्तुत कर, आचरण को दर्शाता है।

आचरण किसी शास्त्र में, अथवा किसी पंडित ने किसी का निर्माण नहीं किया, और न कर सकता है ‌। आचरण का निर्माण व्यक्ति स्वयं करता है।

एक लेखक लिखते वक्त अपनी वक्तव्य को पेश करने के लिए, अपने पास मौजूद सभी शब्दों को तोलता है।

उसे जो सबसे उत्तम लगता है उदाहरण के रूप में इस्तेमाल करता है।एक वक्ता भी बोलते वक्त अपने संग्रह से सबसे उत्तम शब्द का चयन करता है।वास्तव में देखा जाए तो उदाहरण तो सिर्फ और सिर्फ समझाने के लिए दिए जाते हैं। हो सकता है की उदाहरण सब को ना समझ में आए, अथवा लेखक या वक्ता अपने उदाहरण को अच्छे ढंग से प्रस्तुत ना कर पाए। लेकिन वर्तमान में उदाहरण को नहीं मूल को समझना आवश्यक है। वास्तव में कहा जाए तो श्री राम आए, उनके भक्त आए सब ने अपना अपना चरित्र पेश किया। तुलसी बाबा आए, उनके साथ और भी महामानव आए जिन्होंने रामचरित्र को अपने तरीके से प्रस्तुत किया। किसने किस तरीके से प्रस्तुत किया, उसे हटाकर सिर्फ श्री राम अपने शब्दों के जरिए समाज को क्या देकर गए, अपने चरित्र के जरिए क्या देकर गए आज सिर्फ इसका चिंतन और चर्चा होना चाहिए।

इतिहास के ऊपर आज कोई भी उंगली उठा सकता है, प्रश्न कभी खत्म नहीं होते, हजारों लाखों की संख्या में प्रश्न पैदा किए जा सकते हैं।

जितना प्रश्न उठेगा , भ्रम उतना ही बढ़ेगा। इसे आसानी से समझने के लिए एक छोटा सा उदाहरण। अभी इसे पढ़ रहे हैं सभी व्यक्ति, पक्ष और विपक्ष दोनों ही अपने आप को उत्तम मानते हैं। ऐसा नहीं है कि सब के सब उत्तम है। अपने लिए तो सब उत्तम है।

वास्तविक उत्तम तो वही है जिसे समाज में अधिकतर लोग उत्तम कहे।

एक को उत्तम करने के लिए दूसरे को मध्यम उत्तम, अथवा निम्न उत्तम कहना पड़ेगा। दिन है तो रात है, देव है तो दानव है, मानव है तो अमानव है। शास्त्र में वर्णाश्रम, जाति व्यवस्था अथवा धर्म व्यवस्था यह समाज की व्यवस्था को जो दर्शाया जाता है, इसलिए नहीं कि व्यक्ति एक दूसरे पे हथियार के रूप में इस्तेमाल करें। कोई एक व्यक्ति शास्त्र का सहारा लेकर किसी दूसरे के ऊपर आक्षेप करें, अथवा किसी को तिरस्कृत करें। कौन किस श्रेणी में है, हर व्यक्ति स्वयं को समझता है।

जन्म से कोई जाति नहीं होता, जन्म से व्यक्ति सिर्फ और सिर्फ मानव होता है।

एक अबोध बालक को उस वक्त तक चोर नहीं कह सकते जब तक की वह चोरी ना करें। इतना बोलने वाला चलने वाला अबोधबालक जब चोरी करेगा तब चोर कह लाएगा। भारतीय सनातन साहित्य वर्णाश्रम जाति धर्म की बात तो करता है परंतु यह किसी को तारना अथवा तिरस्कृत करने के लिए नहीं करता। सनातन भारत में एक व्यक्ति अपने आप को समझ सके, की उसके अपने कर्म का मापदंड क्या है और वह अपने आप को मानवता के इस श्रेणी में रखता है।

यदि कोई आचरण से श्रेष्ठ है तो निसंदेह वह श्रेष्ठ है।

संपूर्ण समाज को इस बात को स्वीकार करना होगा। नेशन एक्स भारत अपने शब्दों में यह कहता है, कि आज समयानुसार चरित्र के आधार पर वर्तमान में वर्णाश्रम जाति व्यवस्था का पुनः समीक्षा होना चाहिए। भारतीय सनातन साहित्य किसी को यह अधिकार नहीं देता की शास्त्र के आर कोई व्यक्ति किसी व्यक्ति के ऊपर आक्षेप करें। अनेक शास्त्र अनेक प्रकार से अनेक शब्द कहता है, उसमें से क्या लेना है और क्या नहीं लेना है यह पाठक का काम है, श्रोता का काम है।

सनातन वेद साहित्य व्यक्ति के स्वयं के उत्थान की बात करता है।

ढोल गवार शुद्र पशु नारी।चौपाई में जिक्र किया गया है क्योंकि उस समय, अतीत में इन्हें, सभ्य समाज से अलग रखा गया था, अथवा यह समाज में हे दृष्टि से देखे जाते थे। आज धार्मिक जातिवाद के ऊपर आक्षेप करने वाले व्यक्ति भूल जाते हैं, कि वह समय था जब ” भारत में पुरुष के मरने पर स्त्री को, पति के साथ सती कर दिया जाता था।”आज वह राज नहीं है, और ना ही समाज है। श्रेष्ठ मानव श्रेष्ठता की बात तो करेगा, परंतु अपने आप को श्रेष्ठ बनाने के लिए, किसी का तिरस्कार नहीं करेगा, किसी को अश्रेष्ठ नहीं बनाएगा। समाज में हमेशा से ही कुछ ऐसे भी तत्व रहे हैं, जो अपने आप को योग बनाने के लिए दूसरे को कुयोग साबित करते रहे हैं।

आज समाज में व्यक्ति किसी भी जाति धर्म अथवा संप्रदाय का हो, सब मानव है।

आज समाज में जिसका चरित्र ऊंचा है, वह वास्तव में ऊंचा है, उसे नीचा कहने वाला इंसान मूर्ख है।सनातन में श्री राम की पूजा यूं ही नहीं हुआ करता, क्योंकि श्री राम अपने चरित्र से महान रहे।‌‌

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