“सनातन सत्य!” का विशेष उद्देश्य

सनातन पद्धति के हिंदू परिवार में उपदेशक अनगिनत है। उपदेशक का बहुत बड़ा साम्राज्य है, इतना बड़ा है कि कोई वास्तविक कल्पना नहीं कर सकता। विशाल होने के बावजूद आपस में कोई आपसी संघ नहीं है, कुछ संघ है ,तो आपस में अनेक मतभेद है। हिंदू अथवा सनातन शब्दों में यह तो कहते हैं ,कि हम सभीं एक हैं, परंतु वास्तव में अनेक बनकर विचरण करते हैं।

इसका दुष्परिणाम पूर्व काल से होते रहा है।

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परदेसी मत वाले हमेशा से हीं इसका फायदा उठाते रहे हैं। सनातन विचारधारा कहता है “पहले पात्र बनो उसके बाद हम उपदेश का विचार करेंगे। हम योग्यता के ऊपर इस निष्कर्ष पर पहुंचेंगे कि किसे कौन सा ज्ञान देना है।”

सनातन धर्म में परदेसियों को हमने महत्व न देकर भी उनकों बहुत कुछ करने के लिए सुयोग स्थान प्रदान कर दिया।

जिसका नतीजा समाज में प्रचलित है, सनातन में अयोग्य तथा अपात्र मानकर जिन्हें अनदेखा किया गया, उन्हें परदेसी विचारधारा ने अपने भावनाओं में सम्मिलित कर लिया। दूसरे को दोष देने से अपने भावनाओं में किसी प्रकार भी परिवर्तन नहीं होता।

इसका एकमात्र उपाय!
सभीं सनातन परिवार में संस्कृत का मंत्र आने वाले पीढ़ी को थोपा न जाए। सनातन पद्धति के सभीं विचारधारा वाले मिलकर आपस में एक निश्चित विचारधारा का निर्माण करें।

परदेसी विचारधारा ने सामान भाषा न रहते हुए भी यहां पर अपने विचारधारा का प्रचार प्रसार किया।

यह आज सभी को भली-भांति ज्ञात है।
(इस बात को समझने के लिए कुछ उदाहरण को समझने की आवश्यकता है। भारत भूमि के ऊपर परदेसियों का भाषा के ऊपर किसी प्रकार भी मेल नहीं था, फिर भी उन्होंने अपने विचारधारा को फैलाया। उनके विचारधारा में एक व्यक्ति का विचारधारा नहीं चलता, उनके विचारधारा में एक संगठन का विचारधारा चलता है। उनके विचारधारा में परलोक बाद में आता है, पहले लोक आता है।

मनुष्य को समाज में जीने के लिए आज की आवश्यकताओं का पूर्ण होना निश्चित आवश्यक है। परदेसी विचारधारा आज की आवश्यकताओं का पूर्ति कैसे हो इसका समाधान पहले करते हैं।

जिसके कारण भाषा से अज्ञान पुरुष भी उस विचारधारा के तरफ मोहित अथवा आकर्षित हो जाता है।)

अपने संस्कृत भाषा को छोड़ना नहीं है, संस्कृत भारत भूमि के सनातन साहित्य की माता है।

सनातन पद्धति के आने वाले नई पीढ़ी के लिए एक नए प्रकार के उपदेश का मापदंड बनाया जाए। जिसमें मंत्र की बाध्यता न हो। नई पीढ़ी को शुद्धता एवं अशुद्धता में रियायत दिया जाए। परलोक तभी सुधर सकता है जब व्यक्ति का पृथ्वी लोक में भावना सुयोग हो। जो अपना और अपने परिवार का भली-भांति भरण पोषण करने में पूर्ण रूप से सक्षम न हो, उसे परलोक की क्या चिंता।

आज समाज में वह दिया जाए, आज की पीढ़ी को और आने वाली पीढ़ी को वह दिया जाए जिसका सभीं को जरूरत है।

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आज वही मंत्र दिया जाए जो समाज की आज की आवश्यकता हो। श्री गीता जी का उपदेश बहुत होता है, गीता जी संसार में सर्वोपरि हैं यह प्रमाणित है। परंतु! “गीता को पढ़ने वाला संत बन जाता है, प्रवचन सुनने वाला सब कुछ छोड़कर साधु बन जाता है।” आज के उपदेशक इस भावना को समाज में बदल नहीं पाते। जिस कारण सनातन परिवार में सुयोग बच्चे को धर्म ग्रंथों के प्रति आकर्षित नहीं होने दिया जाता। समाज के अंदर यह गलत धारणा बन चुका है, कि धर्म शास्त्रों पर चलने वाला व्यक्ति कमजोर होता है।

इसका मुख्य कारण यही है ,कि सनातन एक होते हुए भी अनेक विचारधारा में विभक्त है। एक निश्चित मत न रहने के कारण पीढ़ी एक विशेष मत का अनुकरण नहीं कर पाता।

सनातन पद्धति के हिंदू परिवार में यदि इसका समाधान नहीं किया गया तो अब तक जो क्षति हुआ है, वैसा हीं आगे भी होता रहेगा। विरोध में चिल्लाने से कुछ नहीं होगा, इसके लिए जो आवश्यक उपाय होना चाहिए वह करना होगा। सनातन सत्य का सनातन पद्धति के सभीं बुद्धिजीवी महानुभावों से आग्रह है ,की ऐसे किसी एकमत का निर्माण करें , जो आने वाला पीढ़ी के लिए एक उत्तम साधन सिद्ध हो।

सनातन सत्य ऐसे उद्देश्य का कामना करता है। सिर्फ विचार करने से नहीं होगा,अपने विचार को वर्तमान के कसौटी पर चलाना होगा।

पूर्व में हुए को दोषी मानकर लकीर पीटने से कुछ नहीं होगा। आज सनातन परिवार में क्या चाहिए, यह सनातन के सभीं श्रेष्ठ महानुभाव को एक छत्र के नीचे आकर विचार करना होगा। एक निश्चित विचार के बाद आज वर्तमान‌ के अनुसार विचारधारा निश्चित करना होगा। अपने पीढ़ी को लड़ना नहीं सिखाना है। लड़ाई तो परिस्थिति अपने आप उत्पन्न करता है। आने वाला पीढ़ी! समाज के अंदर किस प्रकार से एक सफल तथा कामयाब व्यक्ति बने इसके लिए जो आवश्यक हो वह दिया जाए। सनातन सत्य! सनातन पद्धति में हिंदू परिवार के सभीं महानुभाव चिंतकों का हार्दिक अभिनंदन करता है।